Aakash ↔ पाताल
सच्चे साधक की कीर्ति आकाश से लेकर पाताल तक सभी दिशाओं में गूंजती है।
राजा बलि ने अपना सर्वस्व अर्पित कर आकाश और पाताल दोनों लोकों में यश अर्जित किया।
अक्षर 'प' से प्रारंभ होने वाले विपरीतार्थक शब्द युग्म (प्रदर्शित: 51–100 / कुल: 277):
Aakash ↔ पाताल
सच्चे साधक की कीर्ति आकाश से लेकर पाताल तक सभी दिशाओं में गूंजती है।
राजा बलि ने अपना सर्वस्व अर्पित कर आकाश और पाताल दोनों लोकों में यश अर्जित किया।
Poornima ↔ अमावस्या
पूर्णिमा की रात जहां आलोकित होती है, वहीं अमावस्या की रात्रि घोर अंधकारमय रहती है।
अमावस्या के घने अंधेरे में दीवाली के दीप जलाकर प्रकाश पर्व मनाया जाता है।
Prabhat ↔ संध्या
प्रभात की ताजी किरणें उमंग लाती हैं और संध्या का शांत वातावरण विश्राम का संदेश देता है।
संध्या होते ही पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौट आते हैं जिन्हें वे प्रभात में छोड़ गए थे।
Poorva ↔ पश्चिम
सूर्य पूर्व दिशा से उदित होकर पश्चिम दिशा में अस्त होता है।
प्राचीन काल से व्यापारिक जहाजों का आवागमन पूर्व और पश्चिम के मध्य निरंतर रहा है।
Praachi ↔ प्रतीची
प्राची के भाल पर सिंदूरी सूर्य की छटा देखते ही प्रतीची का अंधकार स्वतः लुप्त हो गया।
संध्याकाल में प्रतीची में ढलता सूर्य प्राची के प्रभात का संदेश अग्रिम रूप से देता है।
Vasant ↔ पतझड़
पतझड़ में पेड़ पत्ते गिरा देते हैं, किंतु वसंत आते ही वे नवपल्लवों से सुशोभित हो उठते हैं।
जीवन का नियम है कि पतझड़ के उदास दिनों के बाद वसंत की सुनहरी बहार अवश्य आती है।
Pravah ↔ ठहराव
नदी का निरंतर प्रवाह जीवन की गतिशीलता सिखाता है, जबकि ठहराव सड़न उत्पन्न करता है।
जल में यदि प्रवाह न रहे और ठहराव आ जाए, तो वह अपनी ताजगी और निर्मलता खो देता है।
Paarthiv ↔ अपार्थिव
मनुष्य का शरीर पार्थिव तत्वों से निर्मित है, जबकि उसकी आत्मा अपार्थिव और अमर है।
संतों के चेहरे पर अपार्थिव तेज झलकता है जो पार्थिव प्रलोभनों से परे होता है।
Paala ↔ धूप
शीत लहर में पाला पड़ने से सब्जियों की फसल नष्ट हो जाती है, जिसे धूप ही बचा सकती है।
कड़कड़ाती धूप के बाद घने वृक्ष की शीतल छांव पथिक को नवजीवन प्रदान करती है।
Parvat ↔ मैदान
पर्वत पर चढ़ाई जितनी दुष्कर होती है, समतल मैदान में चलना उतना ही सुगम होता है।
विशाल मैदान कृषि और बस्तियों के लिए आदर्श होते हैं, जबकि पर्वत वनों और खनिजों से संपन्न हैं।
Pawan ↔ निर्वात
धरती के वायुमंडल में जीवनदायिनी पवन बहती है, जबकि अंतरिक्ष में निर्वात की स्थिति होती है।
प्रकाश की किरणें निर्वात में भी गमन कर सकती हैं, किंतु ध्वनि को संचरण हेतु वायु चाहिए।
Rateela ↔ पथरीला
थार मरुस्थल का विस्तार रेतीला है, जबकि अरावली पर्वतमाला का मार्ग पथरीला और दुर्गम है।
पथरीला रास्ता चलने में कष्टप्रद होता है, किंतु रेतीले धोरों पर पैर तेजी से फिसलते हैं।
Prasphutan ↔ मुरझाहट
वसंत में कलियों का प्रस्फुटन होता है और ज्येष्ठ की दोपहरी में फूलों की मुरझाहट देखी जाती है।
पानी मिलते ही मुरझाहट त्यागकर मुरझाए पौधे पुनः लहलहा उठे।
Parvatiya ↔ मैदानी
पर्वतीय क्षेत्रों की जीवनशैली कठोर होती है, जबकि मैदानी इलाकों में सुविधाएं अधिक सुलभ हैं।
मैदानी भाग में नदियों का बहाव धीमा और चौड़ा होता है, जबकि पर्वतीय क्षेत्रों में वह तीव्र होता है।
Salil ↔ पावक
कवि ने प्रकृति के संतुलन को दर्शाते हुए शीतल सलिल और प्रज्वलित पावक का वर्णन किया है।
पावक सब कुछ भस्म कर पवित्र कर देती है, और सलिल उस तपन को शांत कर तृप्ति देता है।
Praval ↔ शैवाल
समुद्र के पारिस्थितिकी तंत्र में कठोर प्रवाल और सूक्ष्म शैवाल का परस्पर सहजीवन अद्वितीय है।
तालाब की सतह पर हरी शैवाल फैलने से धूप नीचे नहीं पहुंच पाती।
Sadabahaar Van ↔ पर्णपाती वन
पश्चिमी घाट के सदाबहार वन जैव विविधता के विपुल भंडार हैं जो कभी पत्ते विहीन नहीं होते।
पर्णपाती वन शुष्क मौसम में पत्ते गिरा देते हैं, जबकि सदाबहार वन सालभर घने हरे-भरे रहते हैं।
Pallav ↔ पतझर
ऋतुराज वसंत के आते ही वृक्षों की शाखाएं कोमल पल्लव से लद जाती हैं।
पतझर में पत्तियां त्यागने के बाद ही वृक्षों पर वसंत में कोमल पल्लव लहलहाते हैं।
Shuddhata ↔ प्रदूषण
हिमालयी वातावरण की शुद्धता में सांस लेने से असाध्य रोग भी शांत होने लगते हैं।
औद्योगिक कारखानों का धुआं वायु में प्रदूषण बढ़ाता है, जिसे वृक्षारोपण से शुद्धता में बदला जा सकता है।
Taraai ↔ पहाड़
तराई के दलदली और नम क्षेत्र में घने जंगल उगते हैं, जो ऊंचे पहाड़ की शुष्कता से भिन्न हैं।
तराई के नम जंगलों से गुजरकर ही यात्री ऊंचे पहाड़ की बर्फीली चोटियों तक पहुंचते हैं।
Chakravaat ↔ प्रतिचक्रवात
चक्रवात आने पर भारी बारिश और तबाही होती है, जबकि प्रतिचक्रवात में मौसम साफ और शांत रहता है।
प्रतिचक्रवात वायुमंडलीय उच्च दबाव का क्षेत्र होता है जिसमें हवाएं बाहर की ओर प्रवाहित होती हैं।
Prem ↔ घृणा
सच्चा प्रेम वैर और शत्रुता की भावना को भी स्नेह में बदल देता है।
हृदय में घृणा पालने से स्वयं की मानसिक शांति नष्ट हो जाती है।
Prasannata ↔ खिन्नता
मित्रों से मिलकर उसके चेहरे पर स्वाभाविक प्रसन्नता झलकने लगी।
असफलता की सूचना पाकर उसके मन में गहरी खिन्नता छा गई।
Peeda ↔ राहत
चोट की तीव्र पीड़ा से घायल व्यक्ति कराह उठा।
औषधि का लेप लगते ही रोगी को भारी पीड़ा से राहत मिली।
Preeti ↔ द्वेष
परस्पर प्रीति और सौहार्द से ही परिवार का वातावरण सुखद रहता है।
हृदय में द्वेष रखने वाला मनुष्य कभी किसी का भला नहीं सोच सकता।
Aatmiyata ↔ परायापन
अतिथि का स्वागत ऐसी आत्मीयता से किया गया कि वह अभिभूत हो गया।
परिवार में मतभेद बढ़ने से सदस्यों के बीच परायापन पनपने लगता है।
Pulkit ↔ संतप्त
प्रियतम के आगमन का समाचार पाकर उसका रोम-रोम पुलकित हो गया।
कठोर विरह की ज्वाला में संतप्त हृदय को कहीं चैन नहीं था।
Pramatta ↔ अमत्त
धन और सत्ता के नशे में प्रमत्त व्यक्ति किसी के अधिकार का सम्मान नहीं करता।
अमत्त और संयमी मनुष्य हर विषम परिस्थिति में संतुलित रहता है।
Prafullit ↔ खिन्न
वर्षा की फुहारें पड़ते ही कृषक का हृदय प्रफुल्लित हो उठा।
फसल खराब होने की आशंका से किसान का मन खिन्न हो गया।
Uttejana ↔ प्रशांति
झूठी अफवाहों से समाज में अवांछित उत्तेजना फैल गई।
प्राकृतिक वातावरण में आत्मा को असीम प्रशांति मिलती है।
Prafullata ↔ म्लानता
प्रातःकालीन सैर से चेहरे पर अनूठी प्रफुल्लता आ जाती है।
बीमारी और चिंता के कारण चेहरे की म्लानता स्पष्ट दिखाई दे रही थी।
Udwignata ↔ प्रसन्नचित्तता
परीक्षा परिणाम से पूर्व छात्रों के मन में उद्विग्नता स्वाभाविक है।
ध्यान के अभ्यास से जीवन में प्रसन्नचित्तता बनी रहती है।
Hatotsah ↔ प्रोत्साहन
लगातार विफलता से खिलाड़ी का हतोत्साह बढ़ गया था।
कोच के प्रोत्साहन से उसने पुनः नए जोश से अभ्यास आरंभ किया।
Priyavadi ↔ अप्रियवादी
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्—सत्य बोलो और प्रियवादी बनो।
अप्रियवादी व्यक्ति सच को भी इतने कड़वे ढंग से कहता है कि वह सबको चुभता है।
Shirsh ↔ पाद
मानव शरीर में शीर्ष सबसे संवेदनशील और विचारशील अंग माना जाता है।
शारीरिक संतुलन बनाए रखने में पाद अर्थात पैरों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
Agra ↔ पश्च
मस्तिष्क का अग्र भाग तार्किक निर्णय लेने और चिंतन का केंद्र होता है।
कशेरुक दंड का पश्च भाग पूरे शरीर को सीधा और सुदृढ़ आधार प्रदान करता है।
Mukh ↔ पृष्ठ
मुख पर खिली सहज मुस्कान व्यक्ति के शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य को दर्शाती है।
पृष्ठ अर्थात पीठ के व्यायाम से रीढ़ की हड्डी लचीली और मजबूत बनी रहती है।
Krish ↔ पुष्ट
लंबी बीमारी के कारण उसका शरीर कृश और दुर्बल दिखाई देने लगा था।
संतुलित आहार और नियमित व्यायाम से पहलवान का शरीर गठीला और पुष्ट बन गया।
Pangu ↔ गतिशील
दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर पंगु पर्वतारोही ने भी ऊँचे शिखर पर तिरंगा फहराया।
गतिशील धावक ने अपनी शारीरिक क्षमता के बल पर मैराथन दौड़ में प्रथम स्थान पाया।
Vaksha ↔ पीठ
प्राणायाम के गहन अभ्यास से वक्ष का फैलाव बढ़ता है और फेफड़े पूर्ण क्षमता से कार्य करते हैं।
दैनिक योगासनों से पीठ की कशेरुकाएं लचीली रहती हैं और रीढ़ की हड्डी सुदृढ़ बनी रहती है।
Udara ↔ पृष्ठ
संतुलित और सुपाच्य आहार लेने से उदर की पाचन क्रिया सुचारू और रोगमुक्त बनी रहती है।
लंबे समय तक गलत मुद्रा में बैठने से पृष्ठ और कटि प्रदेश में पीड़ा होने लगती है।
Karatala ↔ पादतल
उत्साहवर्धन और शास्त्रीय ताल वादन में करतल ध्वनि अर्थात तालियों की गूंज सुनाई देती है।
प्राकृतिक एक्यूप्रेशर चिकित्सा में पादतल के विशेष बिंदुओं पर दबाव डालकर उपचार किया जाता है।
Shirobhaaga ↔ पादभाग
शारीरिक संरचना के अध्ययन में शिरोभाग मस्तिष्क और प्रमुख ज्ञानेंद्रियों का आवास माना गया है।
मानव शरीर का पादभाग पूरे शरीर का भार वहन करने तथा गतिशीलता प्रदान करने का आधार है।
Urobhaaga ↔ पृष्ठभाग
तैराकी करते समय उरोभाग की मांसपेशियां जल के प्रतिरोध को चीरते हुए आगे बढ़ती हैं।
शरीर को सीधा और संतुलित रखने के लिए पृष्ठभाग की रीढ़ की मांसपेशियां निरंतर सक्रिय रहती हैं।
Agrakaaya ↔ पश्चकाय
शरीर रचना विज्ञान में अग्रकाय के अंतर्गत वक्ष, उदर और प्रमुख सम्मुख अंग सम्मिलित होते हैं।
रीढ़ की हड्डी और नितंब पश्चकाय के मुख्य संरचनात्मक आधार बिंदु होते हैं।
Pushtaanga ↔ कृशांग
नियमित व्यायाम और पौष्टिक आहार के सेवन से पहलवान का शरीर पुष्टांग और गठीला बन गया।
दीर्घकालिक कुपोषण और बीमारी के कारण रोगी अत्यंत कृशांग और अशक्त दिखाई देने लगा।
Shvaasa ↔ प्रश्वास
प्राणायाम की क्रिया में गहरी श्वास भीतर खींचकर फेफड़ों को प्राणवायु से भरा जाता है।
मन को शांत करने के लिए प्रश्वास के माध्यम से शरीर से धीरे-धीरे वायु बाहर छोड़ी जाती है।
Punya ↔ पाप
दीन-दुखियों की निःस्वार्थ सेवा करने से हृदय में पुण्य और आत्मिक शांति का संचय होता है।
किसी निर्दोष जीव को व्यर्थ पीड़ा पहुँचाना घोर पाप माना जाता है।
Paropkaar ↔ अपकार
वृक्ष और नदियाँ परोपकार के लिए ही फल और जल प्रदान करते हैं।
सज्जन व्यक्ति कभी किसी के साथ अपकार या अहित करने का विचार मन में नहीं लाते।
Dharmaatma ↔ पापात्मा
धर्मात्मा पुरुष सदैव दूसरों के सुख-दुख में सहभागी बनकर उनकी सेवा करते हैं।
पापात्मा मनुष्य दूसरों का धन हड़पने और निर्दोषों को सताने में ही सुख खोजता है।