📜HINDI PROSODY & METRICS • CHHAND KOSH

Hindi Chhand & Prosody (Chhand Parichay Kosh) (छंद लक्षण एवं पिंगल शास्त्र (छंद परिचय कोष))

Matrik and Varnik meters in Hindi literature with matra formulas, yati, tuk, and authentic poetic verses

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11 मात्रिक छंद
Core Classifications
🪶
4 वर्णिक छंद
कवित्त, सवैया, द्रुतविलंबित व मंदाक्रांता
📐
15 मानक छंद
Total Standard Meters

छंद के मुख्य वर्गीकरण (Classifications)

2 मुख्य वर्ग
📏11 छंद प्रविष्टियाँ

मात्रिक छंद

Matrik Chhand (Moraic / Syllable-Weight Meters)

वे छंद जिनमें चरणों की रचना मात्राओं (लघु = १, गुरु = २) की निश्चित संख्या और यति-गति के नियमों के आधार पर होती है।

📐 प्रमुख नियम व पहचान:
दोहा, चौपाई, रोला, सोरठासभी 11 छंद देखें→
🔤4 छंद प्रविष्टियाँ

वर्णिक छंद

Varnik Chhand (Syllabic / Varna-Count Meters)

वे छंद जिनमें चरणों की रचना वर्णों (अक्षरों) की निश्चित संख्या और आठ गणों (यगण, मगण, तगण आदि) के शास्त्रीय क्रम पर आधारित होती है।

📐 प्रमुख नियम व पहचान:
सवैया, कवित्त, द्रुतविलंबितसभी 4 छंद देखें→

⚡त्वरित छंद निर्देशिका (Quick Directory)

कुल 15 छंद
📜

1. मात्रिक छंद (Matrik Meters — Syllable-Weight Based)

मात्राओं (लघु = 1, गुरु = 2) की निश्चित गणना पर आधारित छंद: सम, अर्धसम एवं विषम मात्रिक।

मात्रिक छंद का विस्तृत पृष्ठ देखें (11) →
मात्रिक छंदअर्धसम मात्रिकClass 9-10
#doha

दोहा

विषम (१, ३) = १३ मात्राएँ

Doha (Rhymed Couplet Meter)

दोहा अर्धसम मात्रिक छंद है। इसमें 4 चरण (दो दल / पंक्तियाँ) होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम और तृतीय चरण) में 13-13 मात्राएँ तथा सम चरणों (द्वितीय और चतुर्थ चरण) में 11-11 मात्राएँ होती हैं। प्रत्येक पंक्ति में 13 + 11 = 24 मात्राएँ होती हैं (कुल 48 मात्राएँ)। सम चरणों (2, 4) के अंत में एक लघु (।) वर्ण अनिवार्य होता है और परस्पर तुक मिलता है। विषम चरणों के आदि में जगण (।ऽ।) का होना वर्जित है।

काव्य उदाहरण (Verse Example):

"मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोइ। जा तन की झाँई परैं, स्याम हरित दुति होइ॥"

— महाकवि बिहारी (बिहारी सतसई (मंगलाचरण))
यति (Pause):प्रत्येक चरण के अंत में (१३ और ११ मात्राओं पर यति)
तुक (Rhyme):सम चरणों (२ और ४) में परस्पर तुक मिलता है
💡 पहचान:पहली पंक्ति के पहले हिस्से में १३ मात्राएँ और दूसरे में ११ मात्राएँ गिनें; अंत में तुक और लघु वर्ण (।) मिले तो वह निश्चित ही दोहा है।
४ चरण (२ पंक्तियाँ / दल)मात्रा गणना व नियम→
मात्रिक छंदसम मात्रिकClass 9-10
#chaupai

चौपाई

प्रत्येक चरण = १६ मात्राएँ (४ चरण, कुल ६४ मात्राएँ)

Chaupai (Four-Quarter 16-Mora Meter)

चौपाई सम मात्रिक छंद है। इसमें 4 चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राएँ होती हैं। चरण के अंत में जगण (।ऽ।) और तगण (ऽऽ।) का आना पूर्णतः वर्जित माना गया है। चरण के अंत में प्रायः दो गुरु (ऽऽ) वर्ण आते हैं जो अत्यंत शुभ और कर्णप्रिय माने जाते हैं। प्रथम चरण की तुक द्वितीय चरण से तथा तृतीय चरण की तुक चतुर्थ चरण से मिलती है।

काव्य उदाहरण (Verse Example):

"जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥ रामदूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥"

— गोस्वामी तुलसीदास (हनुमान चालीसा / रामचरितमानस)
यति (Pause):प्रत्येक चरण के अंत में (१६ मात्राओं पर)
तुक (Rhyme):१-२ चरण में तथा ३-४ चरण में परस्पर तुक
💡 पहचान:चारों चरणों में बराबर १६-१६ मात्राएँ गिनें; अंत में जगण (।ऽ।) न हो और प्रायः दो गुरु (ऽऽ) आएँ तो वह चौपाई है।
मात्रिक छंदअर्धसम मात्रिकClass 9-10
#sortha

सोरठा

विषम (१, ३) = ११ मात्राएँ

Sortha (Inverted Doha Meter)

सोरठा अर्धसम मात्रिक छंद है और यह दोहा छंद का ठीक उल्टा (विपरीत) होता है। इसमें भी 4 चरण (दो दल) होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम और तृतीय चरण) में 11-11 मात्राएँ तथा सम चरणों (द्वितीय और चतुर्थ चरण) में 13-13 मात्राएँ होती हैं। विशेष नियम: सोरठा में तुक विषम चरणों (१ और ३) के अंत में मिलता है, जबकि दोहा में तुक सम चरणों में मिलता है। विषम चरणों के अंत में एक गुरु और एक लघु (ऽ।) का विधान रहता है।

काव्य उदाहरण (Verse Example):

"मूक होइ बाचाल, पंगु चढ़इ गिरिवर गहन। जासु कृपाँ सो दयाल, द्रवउ सकल कलिमल दहन॥"

— गोस्वामी तुलसीदास (रामचरितमानस (मंगलाचरण))
यति (Pause):११ और १३ मात्राओं पर यति
तुक (Rhyme):विषम चरणों (१ और ३) के अंत में तुक मिलता है
💡 पहचान:यदि पहले चरण में ११ और दूसरे में १३ मात्राएँ हों और बीच वाले हिस्से (१ और ३ चरण) में तुक मिले तो वह दोहे का उल्टा "सोरठा" है।
४ चरण (२ पंक्तियाँ)मात्रा गणना व नियम→
मात्रिक छंदसम मात्रिकClass 9-10
#rola

रोला

प्रत्येक चरण = २४ मात्राएँ (११ और १३ मात्राओं पर यति)

Rola (24-Mora Even Meter with 11-13 Yati)

रोला सम मात्रिक छंद है। इसमें 4 चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं। प्रत्येक चरण में 11 और 13 मात्राओं पर यति (विराम) होती है। चरण के अंत में प्रायः दो गुरु (ऽऽ) या दो लघु (।।) वर्ण होते हैं। (दोहा और रोला में अंतर: दोहे में १३ पर यति फिर ११ पर यति होती है, जबकि रोले में पहले ११ मात्राओं पर यति फिर १३ मात्राओं पर यति होती है)।

काव्य उदाहरण (Verse Example):

"नील परिधान बीच सुकुमार, खुल रहा मृदुल अधखुला अंग। खिला हो ज्यों बिजली का फूल, मेघबन बीच गुलाबी रंग॥"

— जयशंकर प्रसाद (कामायनी (श्रद्धा सर्ग))
यति (Pause):११ और १३ मात्राओं पर यति (विराम)
तुक (Rhyme):दो-दो चरणों में परस्पर अंत्यानुप्रास (तुक)
💡 पहचान:यदि पंक्ति में कुल २४ मात्राएँ हों और पहली यति ११ पर तथा दूसरी १३ पर आए, तो वह रोला छंद है।
मात्रिक छंदविषम मात्रिकClass 9-10
#kundaliya

कुंडलिया

६ चरण (२ चरण दोहा + ४ चरण रोला, प्रत्येक चरण २४ मात्राएँ)

Kundaliya (Compound Doha-Rola Hexastich Meter)

कुंडलिया विषम मात्रिक संयुक्त छंद है। यह 6 चरणों का छंद होता है, जो 1 दोहा (२ चरण) और 1 रोला (४ चरण) को मिलाकर बनता है (२ + ४ = ६ पंक्तियाँ)। प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं। कुंडलिया के दो अनिवार्य नियम हैं: १. जिस शब्द से छंद का प्रारंभ होता है, उसी शब्द पर इसकी समाप्ति होती है। २. दोहे का चौथा चरण (द्वितीय दल का अंतिम भाग) रोले के प्रथम चरण का प्रारंभ बनता है। यह कुंडली (साँप की कुंडली) की तरह घूमकर वहीं आ जाता है, इसलिए इसे कुंडलिया कहते हैं।

काव्य उदाहरण (Verse Example):

"दौलत पाय न कीजिए, सपनेहूँ अभिमान। चंचल जल दिन चारि को, ठाउँ न रहत निदान॥ ठाउँ न रहत निदान, जियत जग में जस लीजै। मीठे बचन सुनाय, बिनय सबही की कीजै॥ कह गिरधर कबिराय, अरे यह सब घट तौलत। पाहुन निसि-दिन चारि, रहत सबही के दौलत॥"

— गिरधर कविराय (गिरधर कविराय की कुंडलियाँ)
यति (Pause):दोहे में १३-११ पर, रोले में ११-१३ पर यति
तुक (Rhyme):प्रारंभिक शब्द और अंतिम शब्द एक समान
💡 पहचान:जिस ६ पंक्तियों के छंद का पहला शब्द और अंतिम शब्द बिल्कुल एक समान हो, और दूसरी पंक्ति का अंत तीसरी पंक्ति के शुरू में दोहराया गया हो, वह १००% कुंडलिया है।
मात्रिक छंदअर्धसम मात्रिकClass 11-12
#barvai

बरवै

विषम (१, ३) = १२ मात्राएँ

Barvai (19-Mora Eastern Hindi Folk Meter)

बरवै अर्धसम मात्रिक छंद है। इसमें 4 चरण (दो दल) होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम और तृतीय चरण) में 12-12 मात्राएँ तथा सम चरणों (द्वितीय और चतुर्थ चरण) में 7-7 मात्राएँ होती हैं। प्रत्येक पंक्ति में 12 + 7 = 19 मात्राएँ होती हैं। यति 12 और 7 मात्राओं पर होती है। सम चरणों (२, ४) के अंत में जगण (।ऽ।) का होना अत्यंत कर्णप्रिय माना जाता है तथा सम चरणों में परस्पर तुक मिलता है। यह अवधी भाषा का अत्यंत सुकोमल और लोकप्रसिद्ध छंद है।

काव्य उदाहरण (Verse Example):

"चम्पक हरवा अंग मिलि, अधिक सुहाय। जानि परै सिय हियरे, जब कुभिलाय॥"

— अब्दुर्रहीम खानखाना (बरवै नायिका भेद)
यति (Pause):१२ और ७ मात्राओं पर यति
तुक (Rhyme):सम चरणों (२ और ४) के अंत में तुक
💡 पहचान:यदि पंक्ति में १२ और ७ मात्राओं पर यति हो (कुल १९ मात्राएँ) और अवधी या शृंगार का सुकोमल भाव हो, तो वह बरवै छंद है।
४ चरण (२ पंक्तियाँ)मात्रा गणना व नियम→
मात्रिक छंदविषम मात्रिकClass 11-12
#chhappay

छप्पय

प्रथम ४ चरण रोला (२४ मात्राएँ) + अंतिम २ चरण उल्लाला (२८ मात्राएँ)

Chhappay (Compound Rola-Ullala Hexastich Meter)

छप्पय विषम मात्रिक संयुक्त छंद है। इसमें 6 चरण (पंक्तियाँ) होते हैं। इसके प्रथम 4 चरण रोला छंद के होते हैं तथा अंतिम 2 चरण उल्लाला छंद के होते हैं (४ रोला + २ उल्लाला = ६ चरण)। प्रथम चार चरणों (रोला) में 24-24 मात्राएँ होती हैं (११ और १३ पर यति)। अंतिम दो चरणों (उल्लाला) में 28-28 मात्राएँ होती हैं (१५ और १३ पर यति)। वीर रस और स्तुति-काव्य के लिए यह अत्यंत ओजस्वी छंद माना जाता है।

काव्य उदाहरण (Verse Example):

"जिसकी रज में लोट-पोट कर बड़े हुए हैं। घुटनों के बल सरक-सरक कर खड़े हुए हैं॥ परमहंस सम बाल्यकाल में सब सुख पाए। जिसके कारण "धूलि-भरे हीरे" कहलाए॥ हम खेले-कूदे हर्षयुत, जिसकी प्यारी गोद में। हे मातृभूमि! तुझको निरख, मग्न क्यों न हों मोद में॥"

— मैथिलीशरण गुप्त (मातृभूमि (भारत-भारती))
यति (Pause):रोला में ११-१३ पर; उल्लाला में १५-१३ पर यति
तुक (Rhyme):रोला के चरणों में तथा उल्लाला के दो चरणों में परस्पर तुक
💡 पहचान:६ पंक्तियों का छंद हो, जिसमें पहली ४ पंक्तियाँ २४ मात्राओं (रोला) की और अंतिम २ पंक्तियाँ २८ मात्राओं (उल्लाला) की हों, वह छप्पय है।
मात्रिक छंदसम मात्रिकClass 9-10
#geetika

गीतिका

प्रत्येक चरण = २६ मात्राएँ (१४ और १२ मात्राओं पर यति, अंत में ।ऽ)

Geetika (26-Mora Melodic Even Meter)

गीतिका सम मात्रिक छंद है। इसमें 4 चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 26-26 मात्राएँ होती हैं। प्रत्येक चरण में 14 और 12 मात्राओं पर यति (विराम) होती है। चरण के अंत में अनिवार्यतः एक लघु और एक गुरु (।ऽ) वर्ण का विधान होता है। यह अत्यंत गेय, मधुर और प्रार्थना-प्रसंगों में प्रयुक्त होने वाला छंद है।

काव्य उदाहरण (Verse Example):

"हे प्रभो आनंददाता ज्ञान हमको दीजिए। शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए॥ लीजिए हमको शरण में, हम सदाचारी बनें। ब्रह्मचारी, धर्मरक्षक, वीर व्रतधारी बनें॥"

— रामनरेश त्रिपाठी (प्रार्थना गीत)
यति (Pause):१४ और १२ मात्राओं पर यति
तुक (Rhyme):प्रत्येक दो चरणों में परस्पर तुक
💡 पहचान:यदि पंक्ति में २६ मात्राएँ हों, १४ और १२ पर यति हो, तथा पंक्ति का अंत लघु-गुरु (।ऽ) से हो, तो वह गीतिका छंद है।
मात्रिक छंदसम मात्रिकClass 9-10
#harigeetika

हरिगीतिका

प्रत्येक चरण = २८ मात्राएँ (१६ और १२ मात्राओं पर यति, अंत में ।ऽ)

Harigeetika (28-Mora Royal Melodic Meter)

हरिगीतिका सम मात्रिक छंद है। इसमें 4 चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 28-28 मात्राएँ होती हैं। प्रत्येक चरण में 16 और 12 मात्राओं पर यति (विराम) होती है। चरण के अंत में अनिवार्य रूप से लघु-गुरु (।ऽ) का नियम होता है। (स्मरण ट्रिक: "गीतिका" में २६ मात्राएँ होती हैं, इसमें "हरि" (२ मात्राएँ) जोड़ देने पर "हरिगीतिका" (२८ मात्राएँ) बन जाता है)। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का यह सर्वाधिक प्रिय छंद है।

काव्य उदाहरण (Verse Example):

"कहती हुई यों उत्तरा के, नेत्र जल से भर गए। हिम के कणों से पूर्ण मानो, हो गए पंकज नए॥"

— मैथिलीशरण गुप्त (जयद्रथ वध)
यति (Pause):१६ और १२ मात्राओं पर यति
तुक (Rhyme):दो-दो चरणों में परस्पर तुक
💡 पहचान:२८ मात्राएँ प्रति चरण, १६ और १२ पर यति, तथा अंत में लघु-गुरु (।ऽ) का होना हरिगीतिका की पक्की पहचान है।
मात्रिक छंदअर्धसम मात्रिकClass 11-12
#ullala

उल्लाला

विषम (१, ३) = १५ मात्राएँ

Ullala (28-Mora Semi-Even 15-13 Meter)

उल्लाला अर्धसम मात्रिक छंद है। इसमें 4 चरण होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम और तृतीय चरण) में 15-15 मात्राएँ तथा सम चरणों (द्वितीय और चतुर्थ चरण) में 13-13 मात्राएँ होती हैं। प्रत्येक पंक्ति में 15 + 13 = 28 मात्राएँ होती हैं। यति 15 और 13 मात्राओं पर होती है। (हरिगीतिका में भी २८ मात्राएँ होती हैं किंतु उसमें १६-१२ पर यति होती है, जबकि उल्लाला में १५-१३ पर यति होती है)।

काव्य उदाहरण (Verse Example):

"हे शरणदायिनी देवि तू, करती सब का त्राण है। तू मातृभूमि संतान हम, तू जननी तू प्राण है॥"

— मैथिलीशरण गुप्त (भारत-भारती)
यति (Pause):१५ और १३ मात्राओं पर यति
तुक (Rhyme):सम चरणों में परस्पर तुक
💡 पहचान:कुल २८ मात्राएँ हों और यति १५ तथा १३ पर लगे (१६-१२ पर नहीं), तो वह उल्लाला छंद होता है।
४ चरण (२ पंक्तियाँ)मात्रा गणना व नियम→
मात्रिक छंदसम मात्रिकCompetitive Exams
#aalha

आल्हा (वीर छंद)

प्रत्येक चरण = ३१ मात्राएँ (१६ और १५ मात्राओं पर यति, अंत में ऽ।)

Aalha / Veer Chhand (31-Mora Martial Folk Epic Meter)

आल्हा (जिसे वीर छंद भी कहा जाता है) सम मात्रिक छंद है। इसमें प्रत्येक चरण में 31 मात्राएँ होती हैं। यति 16 और 15 मात्राओं पर होती है। चरण के अंत में प्रायः गुरु और लघु (ऽ।) वर्ण का विधान होता है। बुंदेलखंड के प्रसिद्ध लोक-महाकाव्य "आल्हा-खंड" (परमाल रासो — जगनिक) की रचना इसी छंद में हुई है। यह युद्ध और वीरता के गायन का सर्वाधिक ओजस्वी छंद है।

काव्य उदाहरण (Verse Example):

"बारह बरिस ले कूकर जीवे, अरु तेरह लौ जिये सियार। बरिस अठारह छत्री जीवे, आगे जीवन को धिक्कार॥"

— महाकवि जगनिक (आल्हा-खंड (परमाल रासो))
यति (Pause):१६ और १५ मात्राओं पर यति
तुक (Rhyme):पंक्तियों के अंत में ओजस्वी तुक
💡 पहचान:३१ मात्राओं की लंबी ओजस्वी पंक्ति, १६ और १५ पर यति, तथा युद्ध/शौर्य का लोक-आल्हाद हो तो वह आल्हा (वीर छंद) है।
४ चरण (२ दीर्घ पंक्तियाँ)मात्रा गणना व नियम→
🪶

2. वर्णिक छंद (Varnik Meters — Syllable-Count & Gana Based)

निश्चित वर्ण संख्या तथा 8 गणों ('यमाता राजभानसलगा') के व्यवस्थित लघु-गुरु क्रम पर आधारित छंद।

वर्णिक छंद का विस्तृत पृष्ठ देखें (4) →
वर्णिक छंदवर्णिक वृत्तClass 11-12
#kavitta

कवित्त (मनहरण)

प्रत्येक चरण = ३१ वर्ण (१६ और १५ वर्णों पर यति, अंतिम वर्ण गुरु ऽ)

Kavitta / Manharan (31-Syllable Classical Varnik Meter)

कवित्त (जिसे मनहरण कवित्त या घनाक्षरी भी कहा जाता है) एक प्रमुख वर्णिक छंद है। इसमें मात्राओं की नहीं, बल्कि वर्णों (अक्षरों) की गिनती होती है। इसके प्रत्येक चरण में 31 वर्ण (अक्षर) होते हैं। यति 16 और 15 वर्णों पर होती है। प्रत्येक चरण का अंतिम वर्ण अनिवार्यतः गुरु (दीर्घ ऽ) होता है। रीतिकाल के प्रसिद्ध वीर रस कवि भूषण, पद्माकर एवं सेनापति ने अपने अमर काव्यों में इसका सर्वाधिक प्रयोग किया है।

काव्य उदाहरण (Verse Example):

"इंद्र जिमि जंभ पर, बाडव सुअंभ पर, रावन सदंभ पर, रघुकुल राज है। पौन बारिबाह पर, संभु रतिनाह पर, ज्यों सहसबाह पर, राम द्विजराज है॥"

— महाकवि भूषण (शिवराज भूषण / शिवा बावनी)
यति (Pause):१६ और १५ वर्णों पर यति
तुक (Rhyme):चरणों के अंत में परस्पर तुक
💡 पहचान:यदि पंक्ति में मात्राओं की जगह अक्षरों की गिनती ३१ हो, १६ और १५ अक्षरों पर यति हो और अंत में गुरु वर्ण आए, तो वह मनहरण कवित्त है।
वर्णिक छंदवर्णिक वृत्तClass 9-10
#savaiya

सवैया

प्रत्येक चरण = २२ से २६ वर्ण (मत्तगयंद = २३ वर्ण: ७ भगण + २ गुरु)

Savaiya (22 to 26 Syllable Classical Varnik Meter)

सवैया वर्णिक छंदों का एक अत्यंत लोकप्रिय वर्ग है। जिन वर्णिक वृत्तों के प्रत्येक चरण में 22 से लेकर 26 वर्ण (अक्षर) होते हैं, उन्हें सामूहिक रूप से "सवैया" कहा जाता है। इसमें सबसे अधिक प्रसिद्ध "मत्तगयंद सवैया" है, जिसमें 23 वर्ण होते हैं (7 भगण ऽ।। + 2 गुरु ऽऽ = २३ वर्ण)। इसके अतिरिक्त दुर्मिल (२४ वर्ण), किरीट (२४ वर्ण), मदिरा आदि इसके अनेक भेद हैं। रसखान के कृष्ण-प्रेम के सवैये हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि हैं।

काव्य उदाहरण (Verse Example):

"मानुष हों तो वही रसखानि, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन। जो पसु हों तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥ पाहन हों तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर धारन। जो खग हों तो बसेरो करौं, मिलि कालिंदी कूल कदंब की डारन॥"

— रसखान (सुजान रसखान)
यति (Pause):प्रायः मध्य में या चरण के अंत में
तुक (Rhyme):चारों चरणों में सुंदर अंत्यानुप्रास
💡 पहचान:यदि पंक्ति में २२ से २६ अक्षर (विशेषतः २३ अक्षर) हों और ब्रजभाषा अथवा कृष्ण-प्रेम का अत्यंत मधुर प्रवाह हो, तो वह सवैया छंद है।
वर्णिक छंदवर्णिक वृत्तClass 11-12
#drutavilambit

द्रुतविलंबित

प्रत्येक चरण = १२ वर्ण (गण क्रम: नगण, भगण, भगण, रगण — न-भ-भ-र)

Drutavilambit (12-Syllable Classical Varnik Meter)

द्रुतविलंबित एक सुप्रसिद्ध सम वर्णिक छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 12 वर्ण (अक्षर) होते हैं। इसके गणों का निश्चित क्रम है: नगण (।।।), भगण (ऽ।।), भगण (ऽ।।), और रगण (ऽ।ऽ)। इसे स्मरण रखने का सूत्र है: "द्रुतविलंबितमाह नभौ भरौ" (न, भ, भ, र)। अयोध्यासिंह उपाध्याय "हरिऔध" ने अपने खड़ी बोली के प्रथम महाकाव्य "प्रियप्रवास" का अधिकांश भाग इसी छंद में रचा है।

काव्य उदाहरण (Verse Example):

"दिवस का अवसान समीप था, गगन था कुछ लोहित हो चला। तरु-शिखा पर थी अब राजती, कमलिनी-कुल-वल्लभ की प्रभा॥"

— अयोध्या सिंह उपाध्याय "हरिऔध" (प्रियप्रवास)
यति (Pause):चरण के अंत में यति (१२ वर्णों पर)
तुक (Rhyme):शास्त्रीय संस्कृत वृत्तों की भाँति अतुकांत या सतुकांत
💡 पहचान:यदि पंक्ति में ठीक १२ अक्षर हों और शुरुआत ३ लघु अक्षरों (नगण ।।।) से हो, तो वह द्रुतविलंबित छंद है।
वर्णिक छंदवर्णिक वृत्तCompetitive Exams
#mandakranta

मंदाक्रांता

प्रत्येक चरण = १७ वर्ण (गण क्रम: म-भ-न-त-त-गा-गा

Mandakranta (17-Syllable Classical Varnik Meter)

मंदाक्रांता एक गंभीर और भव्य सम वर्णिक छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 17 वर्ण (अक्षर) होते हैं। इसके गणों का शास्त्रीय क्रम है: मगण (ऽऽऽ), भगण (ऽ।।), नगण (।।।), तगण (ऽऽ।), तगण (ऽऽ।), और अंत में दो गुरु (ऽऽ) वर्ण — सूत्र: "मभनततगागा"। इसमें यति 4, 6 और 7 वर्णों पर (४ + ६ + ७ = १७) होती है। महाकवि कालिदास के "मेघदूत" तथा हरिऔध के "प्रियप्रवास" के विरह प्रसंगों में इसका अद्भुत प्रयोग हुआ है।

काव्य उदाहरण (Verse Example):

"बैठी खिन्ना एक दिवस वे गेह में थीं अकेली, आके आँसू दृग-युगल में थे धरा को भिगोते। आई धीरे इस सदन में पुष्प-सद्गंध ले वै, प्रातःवाली सुपवन इसी काल वातायनों से॥"

— अयोध्या सिंह उपाध्याय "हरिऔध" (प्रियप्रवास (पवन-दूती प्रसंग))
यति (Pause):४, ६ और ७ वर्णों पर यति (४ + ६ + ७ = १७)
तुक (Rhyme):शास्त्रीय छंद विधान
💡 पहचान:यदि पंक्ति में १७ अक्षर हों, शुरुआत ३ गुरु अक्षरों (मगण ऽऽऽ) से हो और ४, ६, ७ पर यति लगे, तो वह मंदाक्रांता छंद है।
PINGAL SHASTRA GUIDE • पिंगल शास्त्र गाइड

मात्रा एवं वर्ण गणना के मूलभूत शास्त्रीय नियम

बोर्ड परीक्षा (Class 9-12) एवं प्रतियोगी परीक्षाओं (TGT, PGT, UGC NET, B.Ed) में छंद पहचान के अचूक सिद्धांत।

१.मात्रा गणना नियम (लघु व गुरु)
  • लघु (।) = 1 मात्रा: ह्रस्व स्वर — अ, इ, उ, ऋ तथा चन्द्रबिन्दु (ँ) वाले अक्षर (जैसे: कमल = ।।। = 3 मात्रा)।
  • गुरु (ऽ) = 2 मात्राएँ: दीर्घ स्वर — आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अनुस्वार (ं) तथा विसर्ग (ः) युक्त वर्ण (जैसे: संसार = ऽऽ। = 5)।
  • संयुक्ताक्षर का नियम: यदि किसी शब्द में आधा अक्षर आए, तो उसके ठीक पहले वाला लघु वर्ण गुरु (2 मात्रा) बन जाता है (जैसे: 'भक्त' में 'भ' = ऽ, 'क्त' = ।)।
२.वर्णिक गण सूत्र ('यमाता राजभानसलगा')

तीन वर्णों के समूह को 'गण' कहते हैं। 8 गणों के लघु-गुरु क्रम को इस सूत्र से सरलता से निकाला जाता है:

य मा ता रा ज भा न स ल गा
• यगण (यमाता): । ऽ ऽ
• मगण (मातारा): ऽ ऽ ऽ
• तगण (ताराज): ऽ ऽ ।
• रगण (राजभा): ऽ । ऽ
• जगण (जभान): । ऽ ।
• भगण (भानस): ऽ । ।
• नगण (नसल): । । ।
• सगण (सलगा): । । ऽ
FAQ & SCHOLARLY EXPLANATIONS

छंद एवं पिंगल शास्त्र: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

काव्यशास्त्र, परीक्षा नियमों एवं पिंगल सूत्रों पर आधारित विस्तृत व प्रामाणिक समाधान।

Q1.छंद किसे कहते हैं और काव्य में इसका क्या महत्व है? (What is Chhand in Hindi Prosody?)▼
अक्षरों की संख्या एवं क्रम, मात्रा गणना, यति (विराम), गति (लय), तथा तुक के सुव्यवस्थित नियमों से आबद्ध काव्य-रचना को 'छंद' (Chhand / Poetic Meter) कहते हैं। छंद शब्द संस्कृत की 'छद्' (प्रसन्न करना या आच्छादित करना) धातु से बना है। पिंगल ऋषि द्वारा प्रणीत 'छंदशास्त्र' (पिंगल शास्त्र) इसका मूल ग्रंथ है। छंद काव्य को गेयता, लयबद्धता, अनुशासन और चिरस्थायी सौंदर्य प्रदान करता है।
Q2.मात्रिक छंद और वर्णिक छंद में क्या मूलभूत अंतर है? (Difference between Matrik and Varnik Chhand)▼
मात्रिक छंद में केवल स्वरों के उच्चारण काल (मात्राओं) की संख्या का नियम होता है, वर्णों (अक्षरों) के लघु-गुरु क्रम का बंधन नहीं होता (जैसे दोहा, चौपाई, रोला, सोरठा आदि)। इसके विपरीत, वर्णिक छंद में केवल वर्णों (अक्षरों) की निश्चित संख्या तथा लघु-गुरु के विशिष्ट क्रम (गणों जैसे यगण, मगण आदि) का कड़ाई से पालन किया जाता है (जैसे सवैया, कवित्त, द्रुतविलंबित, मंदाक्रांता आदि)।
Q3.मात्रा की गणना (लघु और गुरु) कैसे की जाती है? (How are Matras Counted?)▼
छंदशास्त्र में मात्रा के दो भेद होते हैं: 1. लघु (ह्रस्व) — संकेत चिह्न '।' (खड़ी पाई), मान = 1 मात्रा। इसमें अ, इ, उ, ऋ तथा चन्द्रबिन्दु (ँ) वाले अक्षर आते हैं। 2. गुरु (दीर्घ) — संकेत चिह्न 'ऽ' (अवग्रह चिह्न), मान = 2 मात्राएँ। इसमें आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अनुस्वार (ं), विसर्ग (ः) तथा संयुक्ताक्षर से ठीक पूर्व आने वाले लघु वर्ण (जैसे 'भक्त' में 'भ') गुरु हो जाते हैं।
Q4.दोहा और सोरठा में क्या परस्पर संबंध और अंतर है? (Relationship between Doha and Soratha)▼
सोरठा छंद को दोहा का 'उल्टा' माना जाता है। दोहा अर्धसम मात्रिक छंद है जिसके विषम (प्रथम व तृतीय) चरणों में 13-13 मात्राएँ तथा सम (द्वितीय व चतुर्थ) चरणों में 11-11 मात्राएँ होती हैं, और तुक सम चरणों में मिलती है। जबकि सोरठा में विषम चरणों में 11-11 मात्राएँ तथा सम चरणों में 13-13 मात्राएँ होती हैं, और तुक विषम चरणों के अंत में मिलती है।
Q5.कुंडलिया छंद की संरचना क्या है और इसे पहचानने की क्या ट्रिक है? (Structure of Kundaliya Chhand)▼
कुंडलिया एक संयुक्त/विषम मात्रिक छंद है जो 'दोहा' और 'रोला' के सम्मिश्रण से बनता है। इसमें कुल 6 चरण (2 चरण दोहा के + 4 चरण रोला के) और 24-24 मात्राएँ होती हैं। इसकी सबसे बड़ी पहचान ट्रिक यह है कि जिस शब्द से यह छंद शुरू होता है, उसी शब्द पर समाप्त होता है; तथा दोहे का चौथा चरण रोले के प्रथम चरण के रूप में दोहराया जाता है।
Q6.वर्णिक छंदों में 'गण' क्या होते हैं और इन्हें याद रखने का सूत्र क्या है? (What are Ganas in Varnik Chhand?)▼
वर्णिक छंदों में तीन-तीन वर्णों के समूह को 'गण' कहा जाता है। गणों की कुल संख्या 8 होती है (यगण, मगण, तगण, रगण, जगण, भगण, नगण, सगण)। इन्हें याद रखने का अमर सूत्र है: 'यमाता राजभानसलगा'। इसके अनुसार यगण = ।ऽऽ, मगण = ऽऽऽ, तगण = ऽऽ।, रगण = ऽ।ऽ, जगण = ।ऽ।, भगण = ऽ।।, नगण = ।।।, सगण = ।।ऽ, ल = लघु (।), गा = गुरु (ऽ)।