Geetika (26-Mora Melodic Even Meter) — लक्षण, मात्रा गणना व उदाहरणगीतिका छंद
गीतिका सम मात्रिक छंद है। इसमें 4 चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 26-26 मात्राएँ होती हैं। प्रत्येक चरण में 14 और 12 मात्राओं पर यति (विराम) होती है। चरण के अंत में अनिवार्यतः एक लघु और एक गुरु (।ऽ) वर्ण का विधान होता है। यह अत्यंत गेय, मधुर और प्रार्थना-प्रसंगों में प्रयुक्त होने वाला छंद है।
४ चरण (सम मात्रिक)
१४ और १२ मात्राओं पर यति
प्रत्येक दो चरणों में परस्पर तुक
मात्राओं की संख्या का नियम (गणों का बंधन नहीं)
"हे प्रभो आनंददाता ज्ञान हमको दीजिए। शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए॥ लीजिए हमको शरण में, हम सदाचारी बनें। ब्रह्मचारी, धर्मरक्षक, वीर व्रतधारी बनें॥"
काव्यशास्त्रीय मात्रा संगति एवं स्पष्टीकरण (Metrical Analysis):
प्रथम पंक्ति "हे प्रभो आनंददाता" (१४ मात्राएँ) + "ज्ञान हमको दीजिए" (१२ मात्राएँ) = २६ मात्राएँ। अंत में "दीजिए" में ज(१)+ए(२) = लघु-गुरु (।ऽ) है। इसी प्रकार प्रत्येक चरण में २६ मात्राएँ हैं और अंत में लघु-गुरु का नियम पूर्ण होता है। यह गीतिका छंद का सर्वमान्य प्रार्थना-उदाहरण है।
English Analysis: Each line tallies to 26 matras with caesura falling at 14 and 12 matras, terminating strictly in a short-long foot (।ऽ at Dee-ji-ye and Ba-nen).
अन्य प्रमुख काव्य छंद (Related Poetic Meters)
सभी छंद देखें →दोहा
विषम (१, ३) = १३ मात्राएँDoha (Rhymed Couplet Meter)
दोहा अर्धसम मात्रिक छंद है। इसमें 4 चरण (दो दल / पंक्तियाँ) होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम और तृतीय चरण) में 13-13 मात्राएँ तथा सम चरणों (द्वितीय और चतुर्थ चरण) में 11-11 मात्राएँ होती हैं। प्रत्येक पंक्ति में 13 + 11 = 24 मात्राएँ होती हैं (कुल 48 मात्राएँ)। सम चरणों (2, 4) के अंत में एक लघु (।) वर्ण अनिवार्य होता है और परस्पर तुक मिलता है। विषम चरणों के आदि में जगण (।ऽ।) का होना वर्जित है।
"मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोइ। जा तन की झाँई परैं, स्याम हरित दुति होइ॥"
— महाकवि बिहारी (बिहारी सतसई (मंगलाचरण))चौपाई
प्रत्येक चरण = १६ मात्राएँ (४ चरण, कुल ६४ मात्राएँ)Chaupai (Four-Quarter 16-Mora Meter)
चौपाई सम मात्रिक छंद है। इसमें 4 चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राएँ होती हैं। चरण के अंत में जगण (।ऽ।) और तगण (ऽऽ।) का आना पूर्णतः वर्जित माना गया है। चरण के अंत में प्रायः दो गुरु (ऽऽ) वर्ण आते हैं जो अत्यंत शुभ और कर्णप्रिय माने जाते हैं। प्रथम चरण की तुक द्वितीय चरण से तथा तृतीय चरण की तुक चतुर्थ चरण से मिलती है।
"जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥ रामदूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥"
— गोस्वामी तुलसीदास (हनुमान चालीसा / रामचरितमानस)सोरठा
विषम (१, ३) = ११ मात्राएँSortha (Inverted Doha Meter)
सोरठा अर्धसम मात्रिक छंद है और यह दोहा छंद का ठीक उल्टा (विपरीत) होता है। इसमें भी 4 चरण (दो दल) होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम और तृतीय चरण) में 11-11 मात्राएँ तथा सम चरणों (द्वितीय और चतुर्थ चरण) में 13-13 मात्राएँ होती हैं। विशेष नियम: सोरठा में तुक विषम चरणों (१ और ३) के अंत में मिलता है, जबकि दोहा में तुक सम चरणों में मिलता है। विषम चरणों के अंत में एक गुरु और एक लघु (ऽ।) का विधान रहता है।
"मूक होइ बाचाल, पंगु चढ़इ गिरिवर गहन। जासु कृपाँ सो दयाल, द्रवउ सकल कलिमल दहन॥"
— गोस्वामी तुलसीदास (रामचरितमानस (मंगलाचरण))