Chhappay (Compound Rola-Ullala Hexastich Meter) — लक्षण, मात्रा गणना व उदाहरणछप्पय छंद
छप्पय विषम मात्रिक संयुक्त छंद है। इसमें 6 चरण (पंक्तियाँ) होते हैं। इसके प्रथम 4 चरण रोला छंद के होते हैं तथा अंतिम 2 चरण उल्लाला छंद के होते हैं (४ रोला + २ उल्लाला = ६ चरण)। प्रथम चार चरणों (रोला) में 24-24 मात्राएँ होती हैं (११ और १३ पर यति)। अंतिम दो चरणों (उल्लाला) में 28-28 मात्राएँ होती हैं (१५ और १३ पर यति)। वीर रस और स्तुति-काव्य के लिए यह अत्यंत ओजस्वी छंद माना जाता है।
६ चरण (विषम मात्रिक)
रोला में ११-१३ पर; उल्लाला में १५-१३ पर यति
रोला के चरणों में तथा उल्लाला के दो चरणों में परस्पर तुक
मात्राओं की संख्या का नियम (गणों का बंधन नहीं)
"जिसकी रज में लोट-पोट कर बड़े हुए हैं। घुटनों के बल सरक-सरक कर खड़े हुए हैं॥ परमहंस सम बाल्यकाल में सब सुख पाए। जिसके कारण "धूलि-भरे हीरे" कहलाए॥ हम खेले-कूदे हर्षयुत, जिसकी प्यारी गोद में। हे मातृभूमि! तुझको निरख, मग्न क्यों न हों मोद में॥"
काव्यशास्त्रीय मात्रा संगति एवं स्पष्टीकरण (Metrical Analysis):
प्रथम ४ पंक्तियाँ रोला छंद की हैं, जिनमें ११ और १३ मात्राओं पर यति के साथ २४-२४ मात्राएँ हैं। अंतिम २ पंक्तियाँ उल्लाला छंद की हैं जिनमें १५ और १३ की यति से २८-२८ मात्राएँ हैं (गोद में / मोद में)। यह राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की अमर देशभक्ति कविता है जो छप्पय छंद का आदर्श रूप है।
English Analysis: The first 4 lines follow Rola meter (24 matras each). The final 2 lines transition to Ullala meter (28 matras each, rhyming at God mein / Mod mein). This patriotic classic by Maithili Sharan Gupt demonstrates the masterly Chhappay structure.
अन्य प्रमुख काव्य छंद (Related Poetic Meters)
सभी छंद देखें →दोहा
विषम (१, ३) = १३ मात्राएँDoha (Rhymed Couplet Meter)
दोहा अर्धसम मात्रिक छंद है। इसमें 4 चरण (दो दल / पंक्तियाँ) होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम और तृतीय चरण) में 13-13 मात्राएँ तथा सम चरणों (द्वितीय और चतुर्थ चरण) में 11-11 मात्राएँ होती हैं। प्रत्येक पंक्ति में 13 + 11 = 24 मात्राएँ होती हैं (कुल 48 मात्राएँ)। सम चरणों (2, 4) के अंत में एक लघु (।) वर्ण अनिवार्य होता है और परस्पर तुक मिलता है। विषम चरणों के आदि में जगण (।ऽ।) का होना वर्जित है।
"मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोइ। जा तन की झाँई परैं, स्याम हरित दुति होइ॥"
— महाकवि बिहारी (बिहारी सतसई (मंगलाचरण))चौपाई
प्रत्येक चरण = १६ मात्राएँ (४ चरण, कुल ६४ मात्राएँ)Chaupai (Four-Quarter 16-Mora Meter)
चौपाई सम मात्रिक छंद है। इसमें 4 चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राएँ होती हैं। चरण के अंत में जगण (।ऽ।) और तगण (ऽऽ।) का आना पूर्णतः वर्जित माना गया है। चरण के अंत में प्रायः दो गुरु (ऽऽ) वर्ण आते हैं जो अत्यंत शुभ और कर्णप्रिय माने जाते हैं। प्रथम चरण की तुक द्वितीय चरण से तथा तृतीय चरण की तुक चतुर्थ चरण से मिलती है।
"जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥ रामदूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥"
— गोस्वामी तुलसीदास (हनुमान चालीसा / रामचरितमानस)सोरठा
विषम (१, ३) = ११ मात्राएँSortha (Inverted Doha Meter)
सोरठा अर्धसम मात्रिक छंद है और यह दोहा छंद का ठीक उल्टा (विपरीत) होता है। इसमें भी 4 चरण (दो दल) होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम और तृतीय चरण) में 11-11 मात्राएँ तथा सम चरणों (द्वितीय और चतुर्थ चरण) में 13-13 मात्राएँ होती हैं। विशेष नियम: सोरठा में तुक विषम चरणों (१ और ३) के अंत में मिलता है, जबकि दोहा में तुक सम चरणों में मिलता है। विषम चरणों के अंत में एक गुरु और एक लघु (ऽ।) का विधान रहता है।
"मूक होइ बाचाल, पंगु चढ़इ गिरिवर गहन। जासु कृपाँ सो दयाल, द्रवउ सकल कलिमल दहन॥"
— गोस्वामी तुलसीदास (रामचरितमानस (मंगलाचरण))