Barvai (19-Mora Eastern Hindi Folk Meter) — लक्षण, मात्रा गणना व उदाहरणबरवै छंद
बरवै अर्धसम मात्रिक छंद है। इसमें 4 चरण (दो दल) होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम और तृतीय चरण) में 12-12 मात्राएँ तथा सम चरणों (द्वितीय और चतुर्थ चरण) में 7-7 मात्राएँ होती हैं। प्रत्येक पंक्ति में 12 + 7 = 19 मात्राएँ होती हैं। यति 12 और 7 मात्राओं पर होती है। सम चरणों (२, ४) के अंत में जगण (।ऽ।) का होना अत्यंत कर्णप्रिय माना जाता है तथा सम चरणों में परस्पर तुक मिलता है। यह अवधी भाषा का अत्यंत सुकोमल और लोकप्रसिद्ध छंद है।
४ चरण (२ पंक्तियाँ) (अर्धसम मात्रिक)
१२ और ७ मात्राओं पर यति
सम चरणों (२ और ४) के अंत में तुक
मात्राओं की संख्या का नियम (गणों का बंधन नहीं)
"चम्पक हरवा अंग मिलि, अधिक सुहाय। जानि परै सिय हियरे, जब कुभिलाय॥"
काव्यशास्त्रीय मात्रा संगति एवं स्पष्टीकरण (Metrical Analysis):
प्रथम चरण "चम्पक हरवा अंग मिलि" में १२ मात्राएँ हैं और द्वितीय चरण "अधिक सुहाय" में अ(१)+धि(१)+क(१)+सु(१)+हा(२)+य(१) = ७ मात्राएँ हैं (१२ + ७ = १९ मात्राएँ)। द्वितीय पंक्ति में भी १२ और ७ मात्राएँ हैं। सुहाय और कुभिलाय में तुक है।
English Analysis: Line 1 contains 12 matras in the first segment and 7 matras in the second (total 19). Line 2 follows the exact 12+7 structure with rhyme between Suhaay and Kubhilaay.
अन्य प्रामाणिक काव्य उदाहरण
"तुलसी आरति राम की, हरति कुपीर। सिय-समेत हिय राखहिं, धनुष-सधीर॥"
विषम में १२ मात्राएँ, सम में ७ मात्राएँ। तुलसीदास जी ने रहीम के आग्रह पर बरवै रामायण की रचना की थी।
Tulsidas composed the entire Barvai Ramayana in this 12+7 meter upon Rahim’s inspiration.
अन्य प्रमुख काव्य छंद (Related Poetic Meters)
सभी छंद देखें →दोहा
विषम (१, ३) = १३ मात्राएँDoha (Rhymed Couplet Meter)
दोहा अर्धसम मात्रिक छंद है। इसमें 4 चरण (दो दल / पंक्तियाँ) होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम और तृतीय चरण) में 13-13 मात्राएँ तथा सम चरणों (द्वितीय और चतुर्थ चरण) में 11-11 मात्राएँ होती हैं। प्रत्येक पंक्ति में 13 + 11 = 24 मात्राएँ होती हैं (कुल 48 मात्राएँ)। सम चरणों (2, 4) के अंत में एक लघु (।) वर्ण अनिवार्य होता है और परस्पर तुक मिलता है। विषम चरणों के आदि में जगण (।ऽ।) का होना वर्जित है।
"मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोइ। जा तन की झाँई परैं, स्याम हरित दुति होइ॥"
— महाकवि बिहारी (बिहारी सतसई (मंगलाचरण))चौपाई
प्रत्येक चरण = १६ मात्राएँ (४ चरण, कुल ६४ मात्राएँ)Chaupai (Four-Quarter 16-Mora Meter)
चौपाई सम मात्रिक छंद है। इसमें 4 चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राएँ होती हैं। चरण के अंत में जगण (।ऽ।) और तगण (ऽऽ।) का आना पूर्णतः वर्जित माना गया है। चरण के अंत में प्रायः दो गुरु (ऽऽ) वर्ण आते हैं जो अत्यंत शुभ और कर्णप्रिय माने जाते हैं। प्रथम चरण की तुक द्वितीय चरण से तथा तृतीय चरण की तुक चतुर्थ चरण से मिलती है।
"जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥ रामदूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥"
— गोस्वामी तुलसीदास (हनुमान चालीसा / रामचरितमानस)सोरठा
विषम (१, ३) = ११ मात्राएँSortha (Inverted Doha Meter)
सोरठा अर्धसम मात्रिक छंद है और यह दोहा छंद का ठीक उल्टा (विपरीत) होता है। इसमें भी 4 चरण (दो दल) होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम और तृतीय चरण) में 11-11 मात्राएँ तथा सम चरणों (द्वितीय और चतुर्थ चरण) में 13-13 मात्राएँ होती हैं। विशेष नियम: सोरठा में तुक विषम चरणों (१ और ३) के अंत में मिलता है, जबकि दोहा में तुक सम चरणों में मिलता है। विषम चरणों के अंत में एक गुरु और एक लघु (ऽ।) का विधान रहता है।
"मूक होइ बाचाल, पंगु चढ़इ गिरिवर गहन। जासु कृपाँ सो दयाल, द्रवउ सकल कलिमल दहन॥"
— गोस्वामी तुलसीदास (रामचरितमानस (मंगलाचरण))