Harigeetika (28-Mora Royal Melodic Meter) — लक्षण, मात्रा गणना व उदाहरणहरिगीतिका छंद
हरिगीतिका सम मात्रिक छंद है। इसमें 4 चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 28-28 मात्राएँ होती हैं। प्रत्येक चरण में 16 और 12 मात्राओं पर यति (विराम) होती है। चरण के अंत में अनिवार्य रूप से लघु-गुरु (।ऽ) का नियम होता है। (स्मरण ट्रिक: "गीतिका" में २६ मात्राएँ होती हैं, इसमें "हरि" (२ मात्राएँ) जोड़ देने पर "हरिगीतिका" (२८ मात्राएँ) बन जाता है)। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का यह सर्वाधिक प्रिय छंद है।
४ चरण (सम मात्रिक)
१६ और १२ मात्राओं पर यति
दो-दो चरणों में परस्पर तुक
मात्राओं की संख्या का नियम (गणों का बंधन नहीं)
"कहती हुई यों उत्तरा के, नेत्र जल से भर गए। हिम के कणों से पूर्ण मानो, हो गए पंकज नए॥"
काव्यशास्त्रीय मात्रा संगति एवं स्पष्टीकरण (Metrical Analysis):
प्रथम पंक्ति "कहती हुई यों उत्तरा के" (१६ मात्राएँ) पर यति है और "नेत्र जल से भर गए" (१२ मात्राएँ) पर चरण पूर्ण होता है (१६ + १२ = २८ मात्राएँ)। अंत में "गए" में ग(१)+ए(२) = लघु-गुरु (।ऽ) है। द्वितीय पंक्ति में भी ठीक २८ मात्राएँ हैं और अंत में "नए" (।ऽ) है। यह हरिगीतिका छंद का प्रामाणिक पाठ्य-उदाहरण है।
English Analysis: Line 1 divides into 16 matras at Uttara ke and 12 matras at Bhar gaye (total 28), concluding in short-long (।ऽ). Line 2 repeats the 16+12 scansion ending in Naye (।ऽ), fulfilling Harigeetika.
अन्य प्रामाणिक काव्य उदाहरण
"खल दल दलन मंजन करन, दुष्टन दमन सुखकर सदा। जय जानकीपति दीनबंधु, विहंसि हरहु दुख-आपदा॥"
प्रत्येक पंक्ति में २८ मात्राएँ (१६ और १२ पर यति)। अंत में सदा/आपदा (।ऽ) की संगति।
Stately devotional hymn structured in 16+12 mora per line.
अन्य प्रमुख काव्य छंद (Related Poetic Meters)
सभी छंद देखें →दोहा
विषम (१, ३) = १३ मात्राएँDoha (Rhymed Couplet Meter)
दोहा अर्धसम मात्रिक छंद है। इसमें 4 चरण (दो दल / पंक्तियाँ) होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम और तृतीय चरण) में 13-13 मात्राएँ तथा सम चरणों (द्वितीय और चतुर्थ चरण) में 11-11 मात्राएँ होती हैं। प्रत्येक पंक्ति में 13 + 11 = 24 मात्राएँ होती हैं (कुल 48 मात्राएँ)। सम चरणों (2, 4) के अंत में एक लघु (।) वर्ण अनिवार्य होता है और परस्पर तुक मिलता है। विषम चरणों के आदि में जगण (।ऽ।) का होना वर्जित है।
"मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोइ। जा तन की झाँई परैं, स्याम हरित दुति होइ॥"
— महाकवि बिहारी (बिहारी सतसई (मंगलाचरण))चौपाई
प्रत्येक चरण = १६ मात्राएँ (४ चरण, कुल ६४ मात्राएँ)Chaupai (Four-Quarter 16-Mora Meter)
चौपाई सम मात्रिक छंद है। इसमें 4 चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राएँ होती हैं। चरण के अंत में जगण (।ऽ।) और तगण (ऽऽ।) का आना पूर्णतः वर्जित माना गया है। चरण के अंत में प्रायः दो गुरु (ऽऽ) वर्ण आते हैं जो अत्यंत शुभ और कर्णप्रिय माने जाते हैं। प्रथम चरण की तुक द्वितीय चरण से तथा तृतीय चरण की तुक चतुर्थ चरण से मिलती है।
"जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥ रामदूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥"
— गोस्वामी तुलसीदास (हनुमान चालीसा / रामचरितमानस)सोरठा
विषम (१, ३) = ११ मात्राएँSortha (Inverted Doha Meter)
सोरठा अर्धसम मात्रिक छंद है और यह दोहा छंद का ठीक उल्टा (विपरीत) होता है। इसमें भी 4 चरण (दो दल) होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम और तृतीय चरण) में 11-11 मात्राएँ तथा सम चरणों (द्वितीय और चतुर्थ चरण) में 13-13 मात्राएँ होती हैं। विशेष नियम: सोरठा में तुक विषम चरणों (१ और ३) के अंत में मिलता है, जबकि दोहा में तुक सम चरणों में मिलता है। विषम चरणों के अंत में एक गुरु और एक लघु (ऽ।) का विधान रहता है।
"मूक होइ बाचाल, पंगु चढ़इ गिरिवर गहन। जासु कृपाँ सो दयाल, द्रवउ सकल कलिमल दहन॥"
— गोस्वामी तुलसीदास (रामचरितमानस (मंगलाचरण))