Mandakranta (17-Syllable Classical Varnik Meter) — लक्षण, मात्रा गणना व उदाहरणमंदाक्रांता छंद
मंदाक्रांता एक गंभीर और भव्य सम वर्णिक छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 17 वर्ण (अक्षर) होते हैं। इसके गणों का शास्त्रीय क्रम है: मगण (ऽऽऽ), भगण (ऽ।।), नगण (।।।), तगण (ऽऽ।), तगण (ऽऽ।), और अंत में दो गुरु (ऽऽ) वर्ण — सूत्र: "मभनततगागा"। इसमें यति 4, 6 और 7 वर्णों पर (४ + ६ + ७ = १७) होती है। महाकवि कालिदास के "मेघदूत" तथा हरिऔध के "प्रियप्रवास" के विरह प्रसंगों में इसका अद्भुत प्रयोग हुआ है।
४ चरण (वर्णिक वृत्त)
४, ६ और ७ वर्णों पर यति (४ + ६ + ७ = १७)
शास्त्रीय छंद विधान
मात्राओं की संख्या का नियम (गणों का बंधन नहीं)
"बैठी खिन्ना एक दिवस वे गेह में थीं अकेली, आके आँसू दृग-युगल में थे धरा को भिगोते। आई धीरे इस सदन में पुष्प-सद्गंध ले वै, प्रातःवाली सुपवन इसी काल वातायनों से॥"
काव्यशास्त्रीय मात्रा संगति एवं स्पष्टीकरण (Metrical Analysis):
प्रत्येक पंक्ति में ठीक १७ वर्ण हैं। पहली यति ४ वर्णों पर (बैठी खिन्ना), दूसरी ६ वर्णों पर (एक दिवस वे), और तीसरी ७ वर्णों पर (गेह में थीं अकेली) लगती है। यह हरिऔध द्वारा प्रियप्रवास में राधा की विरह-व्यथा का मंदाक्रांता छंद में किया गया अमर चित्रण है।
English Analysis: Each line counts precisely 17 syllables with pauses distributed at 4, 6, and 7 syllables (4+6+7=17), starting with three long syllables (Magana). Immortalized in Radha’s lament in Priyapravas.
अन्य प्रमुख काव्य छंद (Related Poetic Meters)
सभी छंद देखें →दोहा
विषम (१, ३) = १३ मात्राएँDoha (Rhymed Couplet Meter)
दोहा अर्धसम मात्रिक छंद है। इसमें 4 चरण (दो दल / पंक्तियाँ) होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम और तृतीय चरण) में 13-13 मात्राएँ तथा सम चरणों (द्वितीय और चतुर्थ चरण) में 11-11 मात्राएँ होती हैं। प्रत्येक पंक्ति में 13 + 11 = 24 मात्राएँ होती हैं (कुल 48 मात्राएँ)। सम चरणों (2, 4) के अंत में एक लघु (।) वर्ण अनिवार्य होता है और परस्पर तुक मिलता है। विषम चरणों के आदि में जगण (।ऽ।) का होना वर्जित है।
"मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोइ। जा तन की झाँई परैं, स्याम हरित दुति होइ॥"
— महाकवि बिहारी (बिहारी सतसई (मंगलाचरण))चौपाई
प्रत्येक चरण = १६ मात्राएँ (४ चरण, कुल ६४ मात्राएँ)Chaupai (Four-Quarter 16-Mora Meter)
चौपाई सम मात्रिक छंद है। इसमें 4 चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राएँ होती हैं। चरण के अंत में जगण (।ऽ।) और तगण (ऽऽ।) का आना पूर्णतः वर्जित माना गया है। चरण के अंत में प्रायः दो गुरु (ऽऽ) वर्ण आते हैं जो अत्यंत शुभ और कर्णप्रिय माने जाते हैं। प्रथम चरण की तुक द्वितीय चरण से तथा तृतीय चरण की तुक चतुर्थ चरण से मिलती है।
"जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥ रामदूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥"
— गोस्वामी तुलसीदास (हनुमान चालीसा / रामचरितमानस)सोरठा
विषम (१, ३) = ११ मात्राएँSortha (Inverted Doha Meter)
सोरठा अर्धसम मात्रिक छंद है और यह दोहा छंद का ठीक उल्टा (विपरीत) होता है। इसमें भी 4 चरण (दो दल) होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम और तृतीय चरण) में 11-11 मात्राएँ तथा सम चरणों (द्वितीय और चतुर्थ चरण) में 13-13 मात्राएँ होती हैं। विशेष नियम: सोरठा में तुक विषम चरणों (१ और ३) के अंत में मिलता है, जबकि दोहा में तुक सम चरणों में मिलता है। विषम चरणों के अंत में एक गुरु और एक लघु (ऽ।) का विधान रहता है।
"मूक होइ बाचाल, पंगु चढ़इ गिरिवर गहन। जासु कृपाँ सो दयाल, द्रवउ सकल कलिमल दहन॥"
— गोस्वामी तुलसीदास (रामचरितमानस (मंगलाचरण))