Kavitta / Manharan (31-Syllable Classical Varnik Meter) — लक्षण, मात्रा गणना व उदाहरणकवित्त (मनहरण) छंद
कवित्त (जिसे मनहरण कवित्त या घनाक्षरी भी कहा जाता है) एक प्रमुख वर्णिक छंद है। इसमें मात्राओं की नहीं, बल्कि वर्णों (अक्षरों) की गिनती होती है। इसके प्रत्येक चरण में 31 वर्ण (अक्षर) होते हैं। यति 16 और 15 वर्णों पर होती है। प्रत्येक चरण का अंतिम वर्ण अनिवार्यतः गुरु (दीर्घ ऽ) होता है। रीतिकाल के प्रसिद्ध वीर रस कवि भूषण, पद्माकर एवं सेनापति ने अपने अमर काव्यों में इसका सर्वाधिक प्रयोग किया है।
४ चरण (वर्णिक वृत्त)
१६ और १५ वर्णों पर यति
चरणों के अंत में परस्पर तुक
मात्राओं की संख्या का नियम (गणों का बंधन नहीं)
"इंद्र जिमि जंभ पर, बाडव सुअंभ पर, रावन सदंभ पर, रघुकुल राज है। पौन बारिबाह पर, संभु रतिनाह पर, ज्यों सहसबाह पर, राम द्विजराज है॥"
काव्यशास्त्रीय मात्रा संगति एवं स्पष्टीकरण (Metrical Analysis):
प्रत्येक चरण में अक्षरों (वर्णों) की संख्या ठीक ३१ है। पहली पंक्ति में १६ वर्णों (इंद्र जिमि जंभ पर, बाडव सुअंभ पर) पर यति है, और आगे १५ वर्णों (रावन सदंभ पर, रघुकुल राज है) पर चरण समाप्त होता है। अंत में "राज है" का "है" गुरु वर्ण है। यह महाकवि भूषण का अत्यंत ओजस्वी मनहरण कवित्त है।
English Analysis: Every line counts exactly 31 syllables, splitting neatly into 16 syllables and 15 syllables, terminating in a stressed long syllable (Raaj hai / Dwijraaj hai).
अन्य प्रामाणिक काव्य उदाहरण
"ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहन वारी, ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहाती हैं॥"
शिवाजी के भय से बेगमों की दशा का ३१ वर्णों में ऐतिहासिक मनहरण कवित्त।
Bhushan’s celebrated historical Kavitta depicting the flight of Mughal princesses in 31-syllable lines.
अन्य प्रमुख काव्य छंद (Related Poetic Meters)
सभी छंद देखें →दोहा
विषम (१, ३) = १३ मात्राएँDoha (Rhymed Couplet Meter)
दोहा अर्धसम मात्रिक छंद है। इसमें 4 चरण (दो दल / पंक्तियाँ) होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम और तृतीय चरण) में 13-13 मात्राएँ तथा सम चरणों (द्वितीय और चतुर्थ चरण) में 11-11 मात्राएँ होती हैं। प्रत्येक पंक्ति में 13 + 11 = 24 मात्राएँ होती हैं (कुल 48 मात्राएँ)। सम चरणों (2, 4) के अंत में एक लघु (।) वर्ण अनिवार्य होता है और परस्पर तुक मिलता है। विषम चरणों के आदि में जगण (।ऽ।) का होना वर्जित है।
"मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोइ। जा तन की झाँई परैं, स्याम हरित दुति होइ॥"
— महाकवि बिहारी (बिहारी सतसई (मंगलाचरण))चौपाई
प्रत्येक चरण = १६ मात्राएँ (४ चरण, कुल ६४ मात्राएँ)Chaupai (Four-Quarter 16-Mora Meter)
चौपाई सम मात्रिक छंद है। इसमें 4 चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राएँ होती हैं। चरण के अंत में जगण (।ऽ।) और तगण (ऽऽ।) का आना पूर्णतः वर्जित माना गया है। चरण के अंत में प्रायः दो गुरु (ऽऽ) वर्ण आते हैं जो अत्यंत शुभ और कर्णप्रिय माने जाते हैं। प्रथम चरण की तुक द्वितीय चरण से तथा तृतीय चरण की तुक चतुर्थ चरण से मिलती है।
"जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥ रामदूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥"
— गोस्वामी तुलसीदास (हनुमान चालीसा / रामचरितमानस)सोरठा
विषम (१, ३) = ११ मात्राएँSortha (Inverted Doha Meter)
सोरठा अर्धसम मात्रिक छंद है और यह दोहा छंद का ठीक उल्टा (विपरीत) होता है। इसमें भी 4 चरण (दो दल) होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम और तृतीय चरण) में 11-11 मात्राएँ तथा सम चरणों (द्वितीय और चतुर्थ चरण) में 13-13 मात्राएँ होती हैं। विशेष नियम: सोरठा में तुक विषम चरणों (१ और ३) के अंत में मिलता है, जबकि दोहा में तुक सम चरणों में मिलता है। विषम चरणों के अंत में एक गुरु और एक लघु (ऽ।) का विधान रहता है।
"मूक होइ बाचाल, पंगु चढ़इ गिरिवर गहन। जासु कृपाँ सो दयाल, द्रवउ सकल कलिमल दहन॥"
— गोस्वामी तुलसीदास (रामचरितमानस (मंगलाचरण))