Savaiya (22 to 26 Syllable Classical Varnik Meter) — लक्षण, मात्रा गणना व उदाहरणसवैया छंद
सवैया वर्णिक छंदों का एक अत्यंत लोकप्रिय वर्ग है। जिन वर्णिक वृत्तों के प्रत्येक चरण में 22 से लेकर 26 वर्ण (अक्षर) होते हैं, उन्हें सामूहिक रूप से "सवैया" कहा जाता है। इसमें सबसे अधिक प्रसिद्ध "मत्तगयंद सवैया" है, जिसमें 23 वर्ण होते हैं (7 भगण ऽ।। + 2 गुरु ऽऽ = २३ वर्ण)। इसके अतिरिक्त दुर्मिल (२४ वर्ण), किरीट (२४ वर्ण), मदिरा आदि इसके अनेक भेद हैं। रसखान के कृष्ण-प्रेम के सवैये हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि हैं।
४ चरण (वर्णिक वृत्त)
प्रायः मध्य में या चरण के अंत में
चारों चरणों में सुंदर अंत्यानुप्रास
मात्राओं की संख्या का नियम (गणों का बंधन नहीं)
"मानुष हों तो वही रसखानि, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन। जो पसु हों तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥ पाहन हों तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर धारन। जो खग हों तो बसेरो करौं, मिलि कालिंदी कूल कदंब की डारन॥"
काव्यशास्त्रीय मात्रा संगति एवं स्पष्टीकरण (Metrical Analysis):
इस सवैये के प्रत्येक चरण में ठीक २३ वर्ण हैं। प्रत्येक चरण में ७ भगण (ऽ।।) और अंत में २ गुरु (ऽऽ) वर्ण आते हैं (जैसे: ग्वारन, मँझारन, धारन, डारन)। यह मत्तगयंद सवैया का विश्वप्रसिद्ध उदाहरण है जिसमें रसखान ने अगले जन्म में भी ब्रजभूमि में जन्म लेने की अभिलाषा व्यक्त की है।
English Analysis: Every single line counts exactly 23 syllables formed by 7 Bhagana feet (long-short-short) followed by two long syllables. Raskhan yearns to be reborn anywhere in Braj, presenting the quintessential Mattagayand Savaiya.
अन्य प्रामाणिक काव्य उदाहरण
"धूरि भरे अति शोभित स्याम जू, तैसी बनी सिर सुंदर चोटी। खेलत खात फिरैं अँगना, पग पैंजनिया कटि पीरी कछौटी॥"
बालकृष्ण के सौंदर्य का २३ वर्णों वाला अनुपम मत्तगयंद सवैया।
Raskhan’s famous portrait of toddler Krishna in 23-syllable Savaiya meter.
अन्य प्रमुख काव्य छंद (Related Poetic Meters)
सभी छंद देखें →दोहा
विषम (१, ३) = १३ मात्राएँDoha (Rhymed Couplet Meter)
दोहा अर्धसम मात्रिक छंद है। इसमें 4 चरण (दो दल / पंक्तियाँ) होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम और तृतीय चरण) में 13-13 मात्राएँ तथा सम चरणों (द्वितीय और चतुर्थ चरण) में 11-11 मात्राएँ होती हैं। प्रत्येक पंक्ति में 13 + 11 = 24 मात्राएँ होती हैं (कुल 48 मात्राएँ)। सम चरणों (2, 4) के अंत में एक लघु (।) वर्ण अनिवार्य होता है और परस्पर तुक मिलता है। विषम चरणों के आदि में जगण (।ऽ।) का होना वर्जित है।
"मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोइ। जा तन की झाँई परैं, स्याम हरित दुति होइ॥"
— महाकवि बिहारी (बिहारी सतसई (मंगलाचरण))चौपाई
प्रत्येक चरण = १६ मात्राएँ (४ चरण, कुल ६४ मात्राएँ)Chaupai (Four-Quarter 16-Mora Meter)
चौपाई सम मात्रिक छंद है। इसमें 4 चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राएँ होती हैं। चरण के अंत में जगण (।ऽ।) और तगण (ऽऽ।) का आना पूर्णतः वर्जित माना गया है। चरण के अंत में प्रायः दो गुरु (ऽऽ) वर्ण आते हैं जो अत्यंत शुभ और कर्णप्रिय माने जाते हैं। प्रथम चरण की तुक द्वितीय चरण से तथा तृतीय चरण की तुक चतुर्थ चरण से मिलती है।
"जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥ रामदूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥"
— गोस्वामी तुलसीदास (हनुमान चालीसा / रामचरितमानस)सोरठा
विषम (१, ३) = ११ मात्राएँSortha (Inverted Doha Meter)
सोरठा अर्धसम मात्रिक छंद है और यह दोहा छंद का ठीक उल्टा (विपरीत) होता है। इसमें भी 4 चरण (दो दल) होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम और तृतीय चरण) में 11-11 मात्राएँ तथा सम चरणों (द्वितीय और चतुर्थ चरण) में 13-13 मात्राएँ होती हैं। विशेष नियम: सोरठा में तुक विषम चरणों (१ और ३) के अंत में मिलता है, जबकि दोहा में तुक सम चरणों में मिलता है। विषम चरणों के अंत में एक गुरु और एक लघु (ऽ।) का विधान रहता है।
"मूक होइ बाचाल, पंगु चढ़इ गिरिवर गहन। जासु कृपाँ सो दयाल, द्रवउ सकल कलिमल दहन॥"
— गोस्वामी तुलसीदास (रामचरितमानस (मंगलाचरण))