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CLASSICAL POETIC TREASURY

अक्षर 'स' से शुरू होने वाले दोहे

10 प्रामाणिक दोहे उपलब्ध हैं।

🪔संत कबीरदास💡नीति एवं सदाचार🎓 Class 6-8

साईं इतना दीजिए, जा मे कुटुम समाय।

मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय॥

Sai itna dijiye, ja me kutum samay. / Main bhi bhookha na rahoon, saadhu na bhookha jaay.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

कबीरदास जी ईश्वर से परम संतोष और अपरिग्रह की प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि हे प्रभु! मुझे केवल इतना ही धन-धान्य दीजिए जितने में मेरे परिवार का सादगी से निर्वाह हो सके। न तो मैं और मेरा परिवार भूखा रहे और न ही मेरे द्वार पर आया कोई अतिथि, साधु या भिक्षुक भूखे पेट वापस लौटे। लोभ और अति-संग्रह से मुक्ति ही सच्चा सुख है।

English: O Lord, bestow upon me only as much sustenance as suffices to maintain my household with dignity: that neither I remain starved, nor does any wandering ascetic or guest turn away hungry from my threshold. In noble contentment lies true wealth.

साईं इतना दीजिए • संतोषपूरी व्याख्या व संदर्भ→
🪔संत कबीरदास⚖️सत्य एवं धर्म🎓 Class 6-8

साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।

जाके हिरदै साँच है, ताके हिरदै आप॥

Saanch barabar tap nahin, jhooth barabar paap. / Jaake hirdai saanch hai, taake hirdai aap.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

कबीरदास जी सत्य की सर्वोपरिता का प्रतिपादन करते हुए कहते हैं कि सत्य बोलने और आचरण करने के समान कोई महान तपस्या नहीं है, और असत्य व छल के समान कोई घोर पाप नहीं है। जिस मनुष्य के हृदय में सत्य, निष्कपटता और सत्यनिष्ठा का वास होता है, उसके हृदय में साक्षात् परमात्मा (आप) स्वयं निवास करते हैं।

English: There is no spiritual penance comparable to Truth, and no transgression as grievous as untruth. In whose heart Truth dwells unshakably, within that very sacred heart resides the Supreme Divine Himself.

साँच बराबर तप नहीं • सत्यनिष्ठापूरी व्याख्या व संदर्भ→
🪔संत कबीरदास📖गुरु महिमा एवं ज्ञान🎓 Class 9-10

सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार।

लोचन अनंत उघाड़िया, अनंत दिखावणहार॥

Satguru ki mahima anant, anant kiya upkaar. / Lochan anant ughaadiya, anant dikhaavanhaar.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

कबीरदास जी अपने सच्चे गुरु की वंदना करते हुए कहते हैं कि सद्गुरु की महिमा अपरंपार और असीम है, उन्होंने मुझ पर अनंत उपकार किए हैं। उन्होंने मेरे अज्ञान के चक्षुओं को खोलकर मुझे ज्ञान और प्रज्ञा के दिव्य नेत्र प्रदान किए, जिससे मुझे अनंत, अविनाशी परमात्मा का साक्षात्कार संभव हो सका।

English: Boundless and infinite is the glory of the True Guru, and countless are the blessings he showered upon me. He unsealed the divine eye of spiritual vision within me, revealing the infinite, immortal Supreme Reality.

सतगुरु की महिमा अनंत • गुरु वंदनापूरी व्याख्या व संदर्भ→
🪔संत कबीरदास🪔भक्ति एवं आध्यात्म🎓 Class 9-10

सुखिया सब संसार है, खावै अरु सोवै।

दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै॥

Sukhiya sab sansaar hai, khaavai aru sovai. / Dukhiya daas kabir hai, jaagai aru rovai.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

कबीरदास जी सांसारिक अज्ञान पर खेद व्यक्त करते हुए कहते हैं कि यह सारा अज्ञानी संसार अपने आपको बहुत सुखी मानता है, क्योंकि वह केवल खाने-पीने और भोग-विलास की निद्रा में मस्त है। परंतु सच्चा दुखी तो ईश्वर का सेवक कबीर है, जो जागृत रहकर संसार की क्षणभंगुरता, आसन्न मृत्यु और परमात्मा से विछोह को देखकर तड़पता और रोता है। आध्यात्मिक जागरण संवेदनशील बना देता है।

English: Deliriously happy seems the ignorant world, simply eating, drinking, and sleeping in illusion. But deeply sorrowful is servant Kabir, who remains wide awake, weeping for mankind’s spiritual blindness and separation from the Divine.

सुखिया सब संसार है • आध्यात्मिक जागृतिपूरी व्याख्या व संदर्भ→
🪔संत कबीरदास📖गुरु महिमा एवं ज्ञान🎓 Class 6-8

सब धरती कागद करूँ, लेखनि सब बनराय।

सात समुंदर की मसि करूँ, गुरु गुन लिखा न जाय॥

Sab dharti kaagad karun, lekhani sab banraay. / Saat samundar ki masi karun, guru gun likha na jaay.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

कबीरदास जी गुरु की अनंत महिमा का बखान करते हुए कहते हैं कि यदि मैं संपूर्ण पृथ्वी को कागज़ बना लूँ, सारे जंगलों की वनस्पतियों को कलम (लेखनी) बना लूँ और सातों समुद्रों के जल को स्याही बना लूँ, तो भी सद्गुरु के उपकारों और उनके गुणों का वर्णन नहीं किया जा सकता। गुरु की कृपा असीम और अवर्णनीय है।

English: Were I to transform the entire earth into paper, turn all forests into pens, and make ink of the seven great oceans, even then the infinite virtues, grace, and blessings of the True Guru could never be fully written.

सब धरती कागद करूँ • गुरु महिमापूरी व्याख्या व संदर्भ→
📜रहीम (अब्दुल रहीम ख़ान-ए-ख़ाना)⏳समय एवं नश्वरता🎓 Class 6-8

समय पाय फल होत है, समय पाय झरि जाय।

सदा रहे नहिं एक सी, का रहीम पछिताय॥

Samay paay phal hot hai, samay paay jhari jaay. / Sada rahe nahin ek si, ka rahim pachhitaay.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

रहीम जी काल के अटल नियम को समझाते हुए कहते हैं कि समय आने पर ही वृक्षों पर फल लगते हैं और समय पूरा होने पर वे स्वतः पककर गिर जाते हैं। संसार में कोई भी अवस्था, सुख या दुख सदैव एक जैसी नहीं रहती। जब परिवर्तन प्रकृति का नियम है, तो मनुष्य को समय के उतार-चढ़ाव पर व्यर्थ पछतावा या शोक क्यों करना चाहिए? समभाव से हर परिस्थिति को स्वीकार करना चाहिए।

English: Trees bear fruit when their appointed season arrives, and shed them when the time has run its course. No condition in this mortal realm remains permanent. When change is the immutable law of nature, why lament over the turning tides of fortune?

समय पाय फल होत है • काल चक्रपूरी व्याख्या व संदर्भ→
📜रहीम (अब्दुल रहीम ख़ान-ए-ख़ाना)⏳समय एवं नश्वरता🎓 Class 9-10

सदा न काहू की रही, रहिमन यह गति जानि।

घटत बढ़त ज्यों चंदमा, त्यों सुख-दुख पहिचानि॥

Sada na kaahu ki rahi, rahiman yeh gati jaani. / Ghatat badhat jyon chandama, tyon sukh-dukh pahichaani.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

रहीम जी कहते हैं कि यह संसार का अटल नियम जान लो कि किसी की भी स्थिति सदैव एक जैसी नहीं रहती। जिस प्रकार चंद्रमा कभी घटता है (कृष्ण पक्ष) और कभी बढ़ता है (शुक्ल पक्ष), उसी प्रकार जीवन में सुख और दुख का चक्र भी निरंतर घटता और बढ़ता रहता है। सुख में अहंकारी नहीं होना चाहिए और दुख में निराश नहीं होना चाहिए।

English: Understand this inexorable rhythm of life: the circumstances of no human remain constant forever. Just as the moon waxes in illumination and wanes in shadow, recognize that joy and sorrow continually alternate in human existence.

सदा न काहू की रही • सुख दुख का चक्रपूरी व्याख्या व संदर्भ→
🌸गोस्वामी तुलसीदास💡नीति एवं सदाचार🎓 Class 9-10

सचिव बैद गुरु तीनि जौं, प्रिय बोलहिं भय आस।

राज धर्म तन तीनि कर, होइ बेगिहीं नास॥

Sachiv vaid gur teeni jaun, priya bolahin bhay aas. / Raaj dharam tan teeni kar, hoi begiheen naas.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

तुलसीदास जी नीति का गूढ़ मर्म बताते हैं कि यदि मंत्री (सलाहकार), चिकित्सक (वैद्य) और गुरु—ये तीनों भयवश या किसी स्वार्थ-लाभ की आशा में आकर शासक या व्यक्ति से अप्रिय सत्य छिपाकर केवल मीठी और चाटुकारितापूर्ण बातें बोलने लगें, तो क्रमशः राज्य, स्वास्थ्य और धर्म का शीघ्र ही सर्वनाश हो जाता है।

English: If a minister, a physician, and a spiritual preceptor speak merely flattering words out of personal fear or greedy hope rather than stating the unvarnished truth, then the kingdom, physical health, and moral righteousness are swiftly and utterly destroyed.

सचिव बैद गुरु • सत्य सलाहपूरी व्याख्या व संदर्भ→
🌸गोस्वामी तुलसीदास💡नीति एवं सदाचार🎓 Class 9-10

सुर नर मुनि सब कै यह रीती। स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती॥

बालि बचन सुनि सहज सुहावा। राम कृपा करि हृदयँ लगावा॥

Sur nar muni sab kai yeh reeti. Swaarath laagi karahin sab preeti. / Baali bachan suni sahaj suhaawa. Ram kripa kari hridayan lagaawa.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

तुलसीदास जी सांसारिक यथार्थ को उजागर करते हुए कहते हैं कि देवता, साधारण मनुष्य और मुनि—प्रायः सभी का यही सांसारिक स्वभाव देखा जाता है कि वे किसी न किसी स्वार्थ के कारण ही दूसरों से स्नेह व प्रेम का संबंध जोड़ते हैं। केवल परमेश्वर ही जीव से अहैतुकी और निस्वार्थ प्रेम करते हैं।

English: Tulsidas candidly reveals the transactional nature of the worldly realm: gods, mortals, and even many ascetics commonly cultivate attachments driven by underlying self-interest. Only the Supreme Lord loves unconditionally without any motive of personal gain.

सुर नर मुनि सब कै यह रीती • सांसारिक स्वार्थपूरी व्याख्या व संदर्भ→
🌸गोस्वामी तुलसीदास💡नीति एवं सदाचार🎓 Class 11-12

समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं। रबि पावक सुरसरि की नाईं॥

अस संसय आनहिं मन माहीं। ज्ञान बिराग बिचार न जाहीं॥

Samrath kahun nahin doshu gosain. Rabi paawak surasari kee naain. / As sansay aanahin man maahin. Gyaan biraag bichaar na jaahin.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

तुलसीदास जी कहते हैं कि जो पूर्ण समर्थ और सर्वव्यापी हैं, उन्हें कोई दोष स्पर्श नहीं करता; जैसे सूर्य, अग्नि और गंगा नदी सब कुछ भस्म अथवा शुद्ध कर देते हैं किंतु स्वयं कभी दूषित नहीं होते। सूर्य अपवित्र जल को भी सोखकर निर्मल वर्षा बनाता है, इसी प्रकार ईश्वर के न्याय पर संदेह नहीं करना चाहिए।

English: The truly transcendent and omnipotent Divine cannot be tainted by mundane flaws, much like the sun, fire, and the sacred river Ganges. The radiant sun absorbs moisture from all places yet purifies it into nourishing rain; divine authority operates beyond superficial mortal judgments.

समरथ कहुँ नहिं दोषु • ईश्वरीय सामर्थ्यपूरी व्याख्या व संदर्भ→