अ
CLASSICAL POETIC TREASURY

अक्षर 'अ' से शुरू होने वाले दोहे

4 प्रामाणिक दोहे उपलब्ध हैं।

🪔संत कबीरदास💡नीति एवं सदाचार🎓 Class 6-8

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।

अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥

Ati ka bhala na bolna, ati ki bhali na choop. / Ati ka bhala na barasna, ati ki bhali na dhoop.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

कबीरदास जी जीवन में संतुलन और मर्यादा का संदेश देते हुए कहते हैं कि न तो बहुत अधिक बोलना अच्छा होता है और न ही आवश्यकता से अधिक चुप रहना। जिस प्रकार अत्यधिक मूसलाधार वर्षा बाढ़ लाकर विनाश करती है और अत्यधिक कड़ी धूप सूखा लाकर कष्ट देती है, उसी प्रकार जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अति हानिकारक होती है। संयम और संतुलन ही श्रेयस्कर है।

English: Excessive speech is harmful, and excessive silence is equally unfitting. Neither is torrential endless rainfall good, nor is an unrelenting harsh drought beneficial. In all realms of existence, golden moderation and balance are the key to harmony.

अति का भला न बोलना • संतुलनपूरी व्याख्या व संदर्भ→
🪔संत कबीरदास💡नीति एवं सदाचार🎓 Class 6-8

अवगुण कहूँ शराब का, आपा सब बिसराय।

मानुष तैं मर्कट भया, जग में हँसी कराय॥

Avagun kahun sharaab ka, aapa sab bisray. / Maanush tain markat bhaya, jag mein hansi karaay.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

कबीरदास जी मद्यपान और व्यसनों के दुष्परिणामों पर चेतावनी देते हुए कहते हैं कि शराब का सबसे बड़ा अवगुण यह है कि वह मनुष्य का सारा होश-ओ-हवास और आत्म-संयम भुला देती है। मदिरापान करने से बुद्धिमान मनुष्य भी बंदर (मर्कट) के समान लज्जाहीन और हास्यास्पद चेष्टाएं करने लगता है और पूरे संसार में अपनी जग-हंसाई करवाता है। नशामुक्त जीवन ही सम्मानजनक है।

English: Behold the terrible vice of intoxicants: it strips a person of all self-awareness and dignity. Under its influence, an intelligent human degenerates into an unhinged ape, inviting ridicule, shame, and ruin before the world.

अवगुण कहूँ शराब का • नशा मुक्तिपूरी व्याख्या व संदर्भ→
📜रहीम (अब्दुल रहीम ख़ान-ए-ख़ाना)🗣️मधुर वाणी एवं सद्व्यवहार🎓 Class 9-10

अमृत ऐसे बचन में, रहिमन रिस की गाँस।

जैसे मिसरीहु में मिली, नीरस बाँस की फाँस॥

Amrit aise bachan mein, rahiman ris ki gaans. / Jaise misreehu mein mili, neeras baans ki faans.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

रहीम जी क्रोध के दुष्परिणाम को बताते हुए कहते हैं कि अत्यंत मधुर, अमृत तुल्य बातचीत के बीच में यदि क्रोध अथवा कटुता की एक भी बात आ जाए, तो वह पूरे संवाद के आनंद को नष्ट कर देती है। यह ठीक वैसा ही है जैसे स्वादिष्ट और मीठी मिश्री खाते समय यदि उसमें सूखी बाँस की फाँस आ जाए, तो वह मुँह के सारे स्वाद को बिगाड़ देती है और पीड़ा पहुँचाती है।

English: In words sweet as celestial nectar, a sudden thorn of fury ruins all beauty, cautions Rahim. It is precisely like discovering a dry, piercing splinter of bamboo lodged inside a piece of crystal candy, destroying all delight and causing pain.

अमृत ऐसे बचन में • क्रोध का त्यागपूरी व्याख्या व संदर्भ→
🌸गोस्वामी तुलसीदास💡नीति एवं सदाचार🎓 Class 9-10

अति सनेह जहँ होत है, तहाँ कलह को मूल।

तुलसी ज्यों अति नेह ते, कमल सूखि जल कूल॥

Ati sneh jahan hot hai, tahan kalah ko mool. / Tulsi jyon ati neh te, kamal sookhi jal kool.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

तुलसीदास जी मनोवैज्ञानिक सत्य उजागर करते हुए कहते हैं कि जहाँ अत्यधिक मोह, आसक्ति और अपेक्षाएँ होती हैं, वहीं कलह और विवाद की जड़ें भी पनपती हैं। जैसे जल से अत्यधिक लगाव होने पर भी यदि जल सूख जाए तो किनारे का कमल कुम्हला जाता है, वैसे ही अति-आसक्ति अंततः दुःख का कारण बनती है।

English: Tulsidas reveals a keen insight into human psychology: excessive possessiveness, blind attachment, and over-dependence inevitably foster discord and disappointment. Moderation and inner detachment preserve harmony in human relationships.

अति सनेह जहँ होत है • अति-आसक्ति से बचावपूरी व्याख्या व संदर्भ→