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CLASSICAL POETIC TREASURY

अक्षर 'म' से शुरू होने वाले दोहे

9 प्रामाणिक दोहे उपलब्ध हैं।

🪔संत कबीरदास⏳समय एवं नश्वरता🎓 Class 9-10

माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रूँदे मोय।

एक दिन ऐसा आएगा, मैं रूँदूंगी तोय॥

Maati kahe kumhaar se, tu kya roonde moy. / Ek din aisa aayega, main roondoongi toy.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

कबीरदास जी नश्वरता का मर्म समझाते हुए रूपक का प्रयोग करते हैं: बर्तन बनाते समय कुम्हार जब मिट्टी को अपने पैरों से रौंदता है, तब मिट्टी उससे कहती है कि आज अपने घमंड में तू मुझे क्या रौंद रहा है? स्मरण रख, एक दिन ऐसा भी आएगा जब तेरी मृत्यु होगी और तू इसी मिट्टी में विलीन हो जाएगा, तब मैं तुझे अपने भीतर रौंदूँगी। संसार की नश्वरता के सम्मुख अहंकार मिथ्या है।

English: The clay speaks to the potter: Why dost thou tread upon me so arrogantly today? Remember, a day shall inevitably arrive when thou shalt perish and dissolve into dust, and then it is I who shall tread upon thee. Temporal pride is absurd before mortality.

माटी कहे कुम्हार से • नश्वरतापूरी व्याख्या व संदर्भ→
🪔संत कबीरदास🔥सामाजिक चेतना एवं आडंबर विरोध🎓 Class 9-10

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।

कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर॥

Mala ferat jug bhaya, fira na man ka fer. / Kar ka manka daari de, man ka manka fer.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

कबीरदास जी बाह्याडंबरों पर कटाक्ष करते हुए कहते हैं कि हाथ में माला के दाने घुमाते-घुमाते युग बीत गए, किंतु मन के भीतर की चंचलता, वासना और छल-कपट दूर नहीं हुए। इसलिए हाथ की माला के मणके फेरना छोड़ दो और अपने अंतःकरण के मनके को फेरो, अर्थात् मन को शुद्ध, एकाग्र और निर्मल बनाओ। आंतरिक पवित्रता ही सच्ची साधना है।

English: Eons passed revolving rosary beads between the fingers, yet the restless wanderings and pretenses of the mind remained unchanged. Cast aside the physical rosary from your hand; instead turn and refine the inner beads of your own conscious mind.

माला फेरत जुग भया • बाह्याडंबर विरोधपूरी व्याख्या व संदर्भ→
🪔संत कबीरदास💡नीति एवं सदाचार🎓 Class 9-10

माया मुई न मन मुआ, मरि मरि गया सरीर।

आसा तृष्णा ना मुई, कहि गए दास कबीर॥

Maya mui na man mua, mari mari gaya sareer. / Aasa trishna na mui, kahi gaye daas kabir.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

कबीरदास जी सांसारिक तृष्णा की प्रबलता पर दुख प्रकट करते हुए कहते हैं कि मनुष्य का शरीर बार-बार जन्म लेकर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है, किंतु न तो सांसारिक माया समाप्त होती है और न ही मन की वासनाएं मरती हैं। सांसारिक आशाएं और अनंत तृष्णाएं मनुष्य के वृद्ध होने पर भी कभी क्षीण नहीं होतीं। वासनाओं से मुक्ति ही मोक्ष का मार्ग है।

English: Worldly illusion died not, nor did the cravings of the mind dissolve; only the physical bodies perished again and again. Desires and insatiable yearnings never perish on their own, proclaims servant Kabir. True peace demands transcending desire.

माया मुई न मन मुआ • तृष्णा त्यागपूरी व्याख्या व संदर्भ→
🪔संत कबीरदास💡नीति एवं सदाचार🎓 Class 6-8

मांगन मरण समान है, मत माँगो कोई भीख।

मांगन से मरना भला, यह सतगुरु की सीख॥

Maangan maran samaan hai, mat maango koyi bheekh. / Maangan se marna bhala, yeh satguru ki seekh.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

कबीरदास जी स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता का उपदेश देते हुए कहते हैं कि दूसरों के आगे हाथ फैलाना और याचना करना मृत्यु के समान अपमानजनक है, अतः किसी से कभी भीख मत माँगो। अपने सद्गुरु की यही सच्ची सीख है कि परमुखापेक्षी होकर जीने से तो स्वाभिमानपूर्वक मर जाना कहीं बेहतर है। स्वावलंबन ही मनुष्य का सच्चा गौरव है।

English: Begging and supplicating before others is akin to spiritual death; do not stoop to beg. This is the supreme counsel of the True Guru: it is far more honorable to perish with self-respect than to survive through humiliating dependency.

मांगन मरण समान है • स्वाभिमानपूरी व्याख्या व संदर्भ→
🪔संत कबीरदास🌱विनम्रता एवं निरहंकार🎓 Class 6-8

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।

कहे कबीर हरि पाइए, मन ही की परतीत॥

Man ke haare haar hai, man ke jeete jeet. / Kahe kabir hari paaiye, man hi ki parteet.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

कबीरदास जी मनोबल और संकल्प-शक्ति का रहस्य बताते हुए कहते हैं कि यदि मन ने पराजय स्वीकार कर ली तो मनुष्य पराजित हो जाता है, और यदि मन में विजय का दृढ़ विश्वास है तो वह अवश्य विजयी होता है। कबीर कहते हैं कि परमात्मा की प्राप्ति भी मन के सच्चे विश्वास, आस्था और निष्ठा से ही संभव होती है। सारा खेल मन के संकल्प का है।

English: Defeat is determined by a surrendered mind; victory is won by an unconquered mind. Kabir declares that even the Supreme Divine is attained through the deep, unwavering conviction and devotion of the purified heart.

मन के हारे हार है • मनोबलपूरी व्याख्या व संदर्भ→
📜रहीम (अब्दुल रहीम ख़ान-ए-ख़ाना)🤝सत्संगति एवं मित्रता🎓 Class 9-10

मथत मथत माखन रहे, दही मही बिलगाय।

रहिमन सोई मीत है, भीर परे ठहराय॥

Mathat mathat maakhan rahe, dahi mahi bilgaay. / Rahiman soyi meet hai, bheer pare thahraay.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

रहीम जी सच्चे मित्र की तुलना मक्खन से करते हुए कहते हैं कि जब दही को मथा जाता है, तो छाछ (मही) अलग हो जाती है, किंतु मक्खन मथने की प्रक्रिया के बाद भी अपने सार रूप में टिका रहता है और ऊपर उभर आता है। इसी प्रकार, जो व्यक्ति संकट, विपत्ति और परीक्षा की घड़ी में विचलित हुए बिना मित्र के साथ अडिग खड़ा रहे, वही वास्तव में सच्चा मित्र होता है।

English: Through relentless churning, the whey separates and flows away, but the wholesome butter remains steadfast and rises to the top. Rahim declares that he alone is a true friend who stays steadfastly beside you when adversity falls.

मथत मथत माखन रहे • मित्रता की परीक्षापूरी व्याख्या व संदर्भ→
📜रहीम (अब्दुल रहीम ख़ान-ए-ख़ाना)💡नीति एवं सदाचार🎓 Class 9-10

मन मोती अरु दूध रस, इनकी सहज सुभाय।

फट जाए तो ना मिले, कोटिन करो उपाय॥

Man moti aru doodh ras, inki sahaj subhaay. / Phat jaaye to na mile, kotin karo upaay.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

रहीम जी कहते हैं कि मनुष्य का मन, मोती और दूध का रस—इन तीनों का स्वाभाविक गुण अत्यंत नाजुक होता है। यदि मोती में एक बार दरार पड़ जाए, दूध एक बार फट जाए, अथवा मन में एक बार अविश्वास या कटुता आ जाए, तो करोड़ों उपाय करने पर भी वे अपनी पूर्व स्थिति में कभी वापस नहीं लौट सकते। अतः मन की पवित्रता और संबंधों की शुद्धि को सहेज कर रखें।

English: Human affection, radiant pearls, and pure milk share a delicate, fragile nature. Once cracked, spoiled, or fractured, no millions of remedies can ever restore them to their pristine integrity. Safeguard the purity of relationships.

मन मोती अरु दूध रस • नाजुक संबंधपूरी व्याख्या व संदर्भ→
🌸गोस्वामी तुलसीदास💡नीति एवं सदाचार🎓 Class 9-10

मुखिया मुख सो चाहिऐ, खान पान कहुँ एक।

पालइ पोषइ सकल अंग, तुलसी सहित बिबेक॥

Mukhiya mukh so chahiai, khaan paan kahun ek. / Palai poshai sakal ang, tulsi sahit bibek.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

तुलसीदास जी श्रेष्ठ नेतृत्व का आदर्श प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि परिवार अथवा समाज का मुखिया मुख (मुँह) के समान होना चाहिए। मुँह भोजन और जल तो अकेला ही ग्रहण करता है, परंतु विवेकपूर्वक उस पोषण को शरीर के समस्त अंगों में समान रूप से वितरित कर उनका पोषण करता है।

English: Tulsidas outlines the timeless ideal of fair and conscientious leadership: a leader should function like the mouth. While the mouth alone consumes food and drink, it prudently distributes vitality, nourishing every limb and organ of the body with balanced wisdom.

मुखिया मुख सो चाहिये • नेतृत्व के गुणपूरी व्याख्या व संदर्भ→
🌸गोस्वामी तुलसीदास📖गुरु महिमा एवं ज्ञान🎓 Class 9-10

मूरख हृदयँ न चेत, जौं गुर मिलहिं बिरंचि सम।

फूलइ फलइ न बेंत, जदपि सुधा बरषहिं जलद॥

Moorakh hridayan na chet, jaun gur milahin biranchi sam. / Phoolai phalai na bent, jadapi sudha barashahin jalad.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

तुलसीदास जी कहते हैं कि मूर्ख और हठी व्यक्ति के हृदय में कभी ज्ञान का प्रकाश नहीं हो सकता, भले ही उसे साक्षात् ब्रह्मा के समान महान सद्गुरु ही क्यों न प्राप्त हो जाएँ। जिस प्रकार अमृत तुल्य वर्षा होने पर भी बाँस (बेंत) पर कभी फूल और फल नहीं आते, वैसे ही दुर्जन ज्ञान ग्रहण नहीं कर पाता।

English: Tulsidas observes that wisdom never dawns in the obstinate heart of a fool, even if he were instructed by an enlightened preceptor as great as Lord Brahma. Just as a cane reed never yields fragrant blossoms or sweet fruits even if monsoon clouds shower celestial nectar, the unreceptive mind remains barren.

मूरख हृदयँ न चेत • ज्ञान और पात्रतापूरी व्याख्या व संदर्भ→