दोहा छंद (13-11 मात्राएँ)
Classical Couplet (दोहा)

समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं। रबि पावक सुरसरि की नाईं॥अस संसय आनहिं मन माहीं। ज्ञान बिराग बिचार न जाहीं॥

Samrath kahun nahin doshu gosain. Rabi paawak surasari kee naain. As sansay aanahin man maahin. Gyaan biraag bichaar na jaahin.

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Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या)

हिंदी सरल व्याख्या (Hindi Vyakhya):

तुलसीदास जी कहते हैं कि जो पूर्ण समर्थ और सर्वव्यापी हैं, उन्हें कोई दोष स्पर्श नहीं करता; जैसे सूर्य, अग्नि और गंगा नदी सब कुछ भस्म अथवा शुद्ध कर देते हैं किंतु स्वयं कभी दूषित नहीं होते। सूर्य अपवित्र जल को भी सोखकर निर्मल वर्षा बनाता है, इसी प्रकार ईश्वर के न्याय पर संदेह नहीं करना चाहिए।

English Translation & Meaning:

The truly transcendent and omnipotent Divine cannot be tainted by mundane flaws, much like the sun, fire, and the sacred river Ganges. The radiant sun absorbs moisture from all places yet purifies it into nourishing rain; divine authority operates beyond superficial mortal judgments.

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Literary Context & Source (साहित्यिक संदर्भ व स्रोत)

मूल ग्रंथ / संकलन: रामचरितमानस (बालकाण्ड)
काव्य विधा: दोहा (मात्रिक छंद)

गोस्वामी तुलसीदास का यह दोहा 16वीं शताब्दी (भक्तिकाल - सगुण रामाश्रयी शाखा) की अमर साहित्यिक धरोहर है। यह दोहा मध्यकालीन भक्ति एवं नीति काव्य परंपरा का अत्यंत प्रामाणिक अंश है जो जीवन के व्यावहारिक सत्य, सदाचार और मानवीय चेतना को जागृत करता है।

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"समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं। रबि पावक सुरसरि की नाईं॥" दोहे के रचयिता कौन हैं?▼

यह प्रसिद्ध एवं प्रामाणिक दोहा गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित है। यह दोहा 'रामचरितमानस (बालकाण्ड)' में संकलित है।

"समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं। रबि पावक सुरसरि की नाईं॥" दोहे का सरल हिंदी भावार्थ (व्याख्या) क्या है?▼

तुलसीदास जी कहते हैं कि जो पूर्ण समर्थ और सर्वव्यापी हैं, उन्हें कोई दोष स्पर्श नहीं करता; जैसे सूर्य, अग्नि और गंगा नदी सब कुछ भस्म अथवा शुद्ध कर देते हैं किंतु स्वयं कभी दूषित नहीं होते। सूर्य अपवित्र जल को भी सोखकर निर्मल वर्षा बनाता है, इसी प्रकार ईश्वर के न्याय पर संदेह नहीं करना चाहिए।

What is the English meaning of the doha "समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं। रबि पावक सुरसरि की नाईं॥"?▼

The truly transcendent and omnipotent Divine cannot be tainted by mundane flaws, much like the sun, fire, and the sacred river Ganges. The radiant sun absorbs moisture from all places yet purifies it into nourishing rain; divine authority operates beyond superficial mortal judgments.

यह दोहा किस विषय और जीवन-मूल्य पर आधारित है?▼

यह दोहा मुख्य रूप से 'नीति एवं सदाचार' (Wisdom & Morals) विषय पर आधारित है, जो मानव जीवन में सदाचार, विवेक और आत्म-सुधार की प्रेरणा देता है।

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दया धरम का मूल है, पाप मूल अभिमान।

तुलसी दया न छांड़िए, जब लग घट में प्रान॥

Daya dharam ka mool hai, paap mool abhimaan. / Tulsi daya na chhandiye, jab lag ghat mein praan.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

तुलसीदास जी स्पष्ट करते हैं कि दया और करुणा ही समस्त धर्मों की प्राथमिक जड़ हैं, जबकि अहंकार और घमंड ही सारे पापों और अनर्थों का मूल कारण है। जब तक शरीर में प्राण शेष हैं, मनुष्य को कभी भी अपने हृदय से प्राणिमात्र के प्रति दया भाव का त्याग नहीं करना चाहिए।

English: Compassion is the root of all righteousness and spiritual duty, whereas arrogant pride is the wellspring of all sin. Tulsidas urges us never to surrender or abandon mercy and empathy towards all living beings as long as breath resides within this physical vessel.

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तुलसी साथी विपत्ति के, विद्या विनय विवेक।

साहस सुकृति सुसत्यव्रत, राम भरोसो एक॥

Tulsi saathi vipatti ke, vidya vinay vivek. / Saahas sukriti susatyavrat, ram bharoso ek.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

तुलसीदास जी कहते हैं कि घोर संकट और विपत्ति के समय मनुष्य के सच्चे साथी केवल छह गुण होते हैं—सच्ची विद्या (ज्ञान), विनम्रता, विवेक (उचित-अनुचित का बोध), आंतरिक साहस, सत्कर्म (सुकृति), सत्यनिष्ठा और सबसे बढ़कर एकमात्र परमपिता प्रभु राम पर अविचल भरोसा।

English: Tulsidas reflects that during times of deep adversity, a person has only six true companions: true learning, humility, moral discernment (viveka), fortitude, righteous deeds, adherence to truth, and an unwavering, total surrender to Divine Grace.

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आवत ही हरषे नहीं, नैनन नहीं सनेह।

तुलसी तहाँ न जाइए, कंचन बरसे मेह॥

Aavat hi harshe nahin, nainan nahin saneh. / Tulsi tahan na jaiye, kanchan barse meh.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

तुलसीदास जी स्वाभिमान और सामाजिक व्यवहार की सीख देते हुए कहते हैं कि जहाँ आपके पहुँचने पर गृहस्वामी का हृदय हर्षित न हो और उसके नेत्रों में स्नेह व आदर का भाव न झलके, उस स्थान पर कदापि नहीं जाना चाहिए, भले ही वहाँ सोने की ही वर्षा क्यों न हो रही हो।

English: Tulsidas teaches true self-respect: never visit a threshold where your arrival brings no genuine joy and where host’s eyes lack warmth and love, even if gold were showering abundantly like rain upon that wealthy home.

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तुलसी या संसार में, भाँति-भाँति के लोग।

सबसों हिलमिल चालिए, नदी नाव संजोग॥

Tulsi ya sansar mein, bhaanti-bhaanti ke log. / Sabson hilmil chaaliye, nadi naav sanjog.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

तुलसीदास जी कहते हैं कि इस विशाल संसार में विभिन्न प्रकृति, विचार और स्वभाव के लोग रहते हैं। मनुष्य को सभी के साथ प्रेमपूर्वक और मिलनसारिता से सामंजस्य बिठाकर जीवन व्यतीत करना चाहिए, जैसे नदी और नाव का संयोग केवल यात्रा की अवधि तक का होता है।

English: In this vast transient world, one encounters diverse temperaments and dispositions. Tulsidas urges us to live cooperatively and harmoniously with everyone, realizing our mortal coexistence is as brief and passing as the momentary union between a boat and the flowing river.

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