🌸गोस्वामी तुलसीदास💡नीति एवं सदाचार🎓 Class 6-8🎓 Class 9-10🎓 Class 11-12🎓 Competitive Exams
दोहा छंद (13-11 मात्राएँ)
Classical Couplet (दोहा)

आवत ही हरषे नहीं, नैनन नहीं सनेह।तुलसी तहाँ न जाइए, कंचन बरसे मेह॥

Aavat hi harshe nahin, nainan nahin saneh. Tulsi tahan na jaiye, kanchan barse meh.

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Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या)

हिंदी सरल व्याख्या (Hindi Vyakhya):

तुलसीदास जी स्वाभिमान और सामाजिक व्यवहार की सीख देते हुए कहते हैं कि जहाँ आपके पहुँचने पर गृहस्वामी का हृदय हर्षित न हो और उसके नेत्रों में स्नेह व आदर का भाव न झलके, उस स्थान पर कदापि नहीं जाना चाहिए, भले ही वहाँ सोने की ही वर्षा क्यों न हो रही हो।

English Translation & Meaning:

Tulsidas teaches true self-respect: never visit a threshold where your arrival brings no genuine joy and where host’s eyes lack warmth and love, even if gold were showering abundantly like rain upon that wealthy home.

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Literary Context & Source (साहित्यिक संदर्भ व स्रोत)

मूल ग्रंथ / संकलन: दोहावली
काव्य विधा: दोहा (मात्रिक छंद)

गोस्वामी तुलसीदास का यह दोहा 16वीं शताब्दी (भक्तिकाल - सगुण रामाश्रयी शाखा) की अमर साहित्यिक धरोहर है। यह दोहा मध्यकालीन भक्ति एवं नीति काव्य परंपरा का अत्यंत प्रामाणिक अंश है जो जीवन के व्यावहारिक सत्य, सदाचार और मानवीय चेतना को जागृत करता है।

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"आवत ही हरषे नहीं, नैनन नहीं सनेह।" दोहे के रचयिता कौन हैं?▼

यह प्रसिद्ध एवं प्रामाणिक दोहा गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित है। यह दोहा 'दोहावली' में संकलित है।

"आवत ही हरषे नहीं, नैनन नहीं सनेह।" दोहे का सरल हिंदी भावार्थ (व्याख्या) क्या है?▼

तुलसीदास जी स्वाभिमान और सामाजिक व्यवहार की सीख देते हुए कहते हैं कि जहाँ आपके पहुँचने पर गृहस्वामी का हृदय हर्षित न हो और उसके नेत्रों में स्नेह व आदर का भाव न झलके, उस स्थान पर कदापि नहीं जाना चाहिए, भले ही वहाँ सोने की ही वर्षा क्यों न हो रही हो।

What is the English meaning of the doha "आवत ही हरषे नहीं, नैनन नहीं सनेह।"?▼

Tulsidas teaches true self-respect: never visit a threshold where your arrival brings no genuine joy and where host’s eyes lack warmth and love, even if gold were showering abundantly like rain upon that wealthy home.

यह दोहा किस विषय और जीवन-मूल्य पर आधारित है?▼

यह दोहा मुख्य रूप से 'नीति एवं सदाचार' (Wisdom & Morals) विषय पर आधारित है, जो मानव जीवन में सदाचार, विवेक और आत्म-सुधार की प्रेरणा देता है।

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दया धरम का मूल है, पाप मूल अभिमान।

तुलसी दया न छांड़िए, जब लग घट में प्रान॥

Daya dharam ka mool hai, paap mool abhimaan. / Tulsi daya na chhandiye, jab lag ghat mein praan.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

तुलसीदास जी स्पष्ट करते हैं कि दया और करुणा ही समस्त धर्मों की प्राथमिक जड़ हैं, जबकि अहंकार और घमंड ही सारे पापों और अनर्थों का मूल कारण है। जब तक शरीर में प्राण शेष हैं, मनुष्य को कभी भी अपने हृदय से प्राणिमात्र के प्रति दया भाव का त्याग नहीं करना चाहिए।

English: Compassion is the root of all righteousness and spiritual duty, whereas arrogant pride is the wellspring of all sin. Tulsidas urges us never to surrender or abandon mercy and empathy towards all living beings as long as breath resides within this physical vessel.

दया धरम का मूल है • करुणापूरी व्याख्या व संदर्भ→
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तुलसी साथी विपत्ति के, विद्या विनय विवेक।

साहस सुकृति सुसत्यव्रत, राम भरोसो एक॥

Tulsi saathi vipatti ke, vidya vinay vivek. / Saahas sukriti susatyavrat, ram bharoso ek.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

तुलसीदास जी कहते हैं कि घोर संकट और विपत्ति के समय मनुष्य के सच्चे साथी केवल छह गुण होते हैं—सच्ची विद्या (ज्ञान), विनम्रता, विवेक (उचित-अनुचित का बोध), आंतरिक साहस, सत्कर्म (सुकृति), सत्यनिष्ठा और सबसे बढ़कर एकमात्र परमपिता प्रभु राम पर अविचल भरोसा।

English: Tulsidas reflects that during times of deep adversity, a person has only six true companions: true learning, humility, moral discernment (viveka), fortitude, righteous deeds, adherence to truth, and an unwavering, total surrender to Divine Grace.

विपत्ति के साथी • धैर्य और विवेकपूरी व्याख्या व संदर्भ→
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तुलसी या संसार में, भाँति-भाँति के लोग।

सबसों हिलमिल चालिए, नदी नाव संजोग॥

Tulsi ya sansar mein, bhaanti-bhaanti ke log. / Sabson hilmil chaaliye, nadi naav sanjog.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

तुलसीदास जी कहते हैं कि इस विशाल संसार में विभिन्न प्रकृति, विचार और स्वभाव के लोग रहते हैं। मनुष्य को सभी के साथ प्रेमपूर्वक और मिलनसारिता से सामंजस्य बिठाकर जीवन व्यतीत करना चाहिए, जैसे नदी और नाव का संयोग केवल यात्रा की अवधि तक का होता है।

English: In this vast transient world, one encounters diverse temperaments and dispositions. Tulsidas urges us to live cooperatively and harmoniously with everyone, realizing our mortal coexistence is as brief and passing as the momentary union between a boat and the flowing river.

भाँति-भाँति के लोग • सामंजस्यपूरी व्याख्या व संदर्भ→
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मुखिया मुख सो चाहिऐ, खान पान कहुँ एक।

पालइ पोषइ सकल अंग, तुलसी सहित बिबेक॥

Mukhiya mukh so chahiai, khaan paan kahun ek. / Palai poshai sakal ang, tulsi sahit bibek.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

तुलसीदास जी श्रेष्ठ नेतृत्व का आदर्श प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि परिवार अथवा समाज का मुखिया मुख (मुँह) के समान होना चाहिए। मुँह भोजन और जल तो अकेला ही ग्रहण करता है, परंतु विवेकपूर्वक उस पोषण को शरीर के समस्त अंगों में समान रूप से वितरित कर उनका पोषण करता है।

English: Tulsidas outlines the timeless ideal of fair and conscientious leadership: a leader should function like the mouth. While the mouth alone consumes food and drink, it prudently distributes vitality, nourishing every limb and organ of the body with balanced wisdom.

मुखिया मुख सो चाहिये • नेतृत्व के गुणपूरी व्याख्या व संदर्भ→