🎨KAVYASHASTRA & FIGURES OF SPEECH

हिंदी अलंकार कोषअलंकार लक्षण, भेद, पहचान की ट्रिक्स एवं काव्य उदाहरण

काव्य की सुंदरता, नाद-सौंदर्य और अर्थ-चमत्कार को निखारने वाले सभी प्रमुख शब्दालंकार, अर्थालंकार एवं उभयालंकार। कक्षा 9-12 सीबीएसई, राज्य बोर्ड, CTET, REET, DSSSB एवं प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए प्रामाणिक दोहे, वाचक शब्द व सरल व्याख्या।

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3 मुख्य भेद
Core Classifications
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24
Total Figures of Speech
CLASSIFICATION ARCHITECTURE

अलंकार के ३ मुख्य भेद (Three Categories)

काव्य में चमत्कार के आधार पर अलंकारों का त्रिविध शास्त्रीय वर्गीकरण

🎵6 अलंकार

शब्दालंकार

Shabdalankar (Sound-based Devices)

जहाँ काव्य में विशिष्ट शब्दों, ध्वनियों या वर्णों के प्रयोग से चमत्कार या सौंदर्य उत्पन्न होता है, वहाँ शब्दालंकार होता है। यदि उस शब्द के स्थान पर उसका पर्यायवाची रख दिया जाए, तो चमत्कार नष्ट हो जाता है।

नाद-सौंदर्य, कर्णप्रियता, लय और ध्वन्यात्मक चमत्कार की सृष्टि करना।विस्तार से देखें→
✨16 अलंकार

अर्थालंकार

Arthalankar (Meaning-based Devices)

जहाँ काव्य का सौंदर्य शब्दों के बाह्य रूप पर नहीं, बल्कि उनके अंतर्निहित अर्थ, भाव, सादृश्य या कल्पना पर आश्रित होता है, वहाँ अर्थालंकार होता है। यहाँ शब्द के स्थान पर उसका पर्यायवाची रखने पर भी अलंकार का सौंदर्य अक्षुण्ण रहता है।

भाव-गांभीर्य, बिंब-विधान, सादृश्य-तुलना और कल्पना की सूक्ष्मता की अभिव्यक्ति।विस्तार से देखें→
⚖️2 अलंकार

उभयालंकार

Ubhayalankar (Dual-aspect Devices)

जहाँ काव्य में शब्द और अर्थ — दोनों के एक साथ चमत्कारी प्रयोग से विशिष्ट सौंदर्य उत्पन्न होता है, वहाँ उभयालंकार होता है (जैसे संकर एवं संसृष्टि अलंकार)।

शब्द और अर्थ का संतुलित, परस्पर संपुष्ट समन्वय।विस्तार से देखें→
ALANKAR DIRECTORY

प्रमुख अलंकार संग्रह एवं काव्य पंक्तियाँ

कक्षा 9-12 बोर्ड एवं प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए प्रामाणिक लक्षण, भेद, पहचान की ट्रिक्स व दोहे।

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शब्दालंकार

6 अलंकार

जहाँ काव्य में विशिष्ट शब्दों, ध्वनियों या वर्णों के प्रयोग से चमत्कार या सौंदर्य उत्पन्न होता है, वहाँ शब्दालंकार होता है। यदि उस शब्द के स्थान पर उसका पर्यायवाची रख दिया जाए, तो चमत्कार नष्ट हो जाता है।

सभी 6 शब्दालंकार देखें→
शब्दालंकारClass 9-10
#anuprasa

काव्य में जहाँ एक ही वर्ण (व्यंजन) की आवृत्ति बार-बार एक निश्चित क्रम में होती है, जिससे चमत्कारिक नाद-सौंदर्य और लय उत्पन्न होती है, वहाँ "अनुप्रास अलंकार" होता है। इसमें स्वरों की समानता होना आवश्यक नहीं है, केवल व्यंजन वर्णों की आवृत्ति ही मुख्य है।

काव्य उदाहरण (Poetic Line):

"चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल-थल में।"

इस काव्य पंक्ति में "च" वर्ण की आवृत्ति (चारु, चंद्र, चंचल) तथा "ल" वर्ण की आवृत्ति (खेल, जल, थल) से संगीतात्मक झंकार उत्पन्न हो रही है, अतः यहाँ अनुप्रास अलंकार है।

💡 ट्रिक:किसी पंक्ति में एक ही व्यंजन वर्ण (जैसे क, च, त, र, म) का बार-बार दोहराया जाना देखें।
शब्दालंकारClass 9-10
#yamaka

यमक अलंकार

Yamaka (Polysemic Repetition)

काव्य में जहाँ एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आए, किंतु प्रत्येक बार उसका अर्थ भिन्न (अलग) हो, वहाँ "यमक अलंकार" होता है। "यमक" का शाब्दिक अर्थ होता है — "जोड़ा" या "युग्म"।

काव्य उदाहरण (Poetic Line):

"कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय। या खाए बौराय जग, वा पाए बौराय॥"

यहाँ "कनक" शब्द दो बार प्रयुक्त हुआ है। प्रथम "कनक" का अर्थ "धतूरा" (नशीला फल) है और द्वितीय "कनक" का अर्थ "स्वर्ण" (सोना) है। दोनों बार भिन्न अर्थ होने से यमक अलंकार है।

💡 ट्रिक:काव्य पंक्ति में एक ही शब्द दो बार आए और दोनों स्थानों पर उसका अर्थ अलग-अलग निकले।
शब्दालंकारClass 9-10
#shlesha

श्लेष अलंकार

Shlesha (Paranomasia / Pun)

काव्य में जहाँ कोई शब्द एक ही बार प्रयुक्त हो, किंतु संदर्भ के अनुसार उसके दो या दो से अधिक भिन्न अर्थ निकलते हों, वहाँ "श्लेष अलंकार" होता है। "श्लेष" का शाब्दिक अर्थ होता है — "चिपका हुआ होना" (एक शब्द में कई अर्थ चिपके रहना)।

काव्य उदाहरण (Poetic Line):

"रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून॥"

यहाँ तीसरी बार प्रयुक्त "पानी" शब्द के तीन भिन्न अर्थ हैं: 1. मोती के पक्ष में "चमक/आभा", 2. मनुष्य के पक्ष में "सम्मान/प्रतिष्ठा", तथा 3. चून (आटे) के पक्ष में "जल"। अतः यहाँ श्लेष अलंकार है।

💡 ट्रिक:एक मुख्य शब्द के साथ कई विषय जुड़े हों (जैसे मोती, मानुष, चून) और उस एक शब्द का प्रत्येक के साथ अलग अर्थ बैठता हो।
शब्दालंकारClass 11-12
#vakrokti

काव्य में जहाँ वक्ता (बोलने वाले) के कथन का श्रोता (सुनने वाला) जानबूझकर श्लेष या काकु (स्वर-विकार) के आधार पर कोई दूसरा कल्पित अर्थ निकाल ले, वहाँ "वक्रोक्ति अलंकार" होता है। "वक्रोक्ति" का अर्थ है — "टेढ़ी उक्ति"।

काव्य उदाहरण (Poetic Line):

"को तुम हौ इत? "आए कहाँ घनस्याम हौ तौ कितहूँ बरसो।""

द्वार पर खड़े श्रीकृष्ण कहते हैं कि "हम घनश्याम (कृष्ण) हैं", किंतु अंदर से राधा जी जानबूझकर इसका अर्थ "काले बादल" लगाकर परिहास करती हैं कि "यदि घनश्याम हो तो कहीं जाकर बरसो, यहाँ क्या काम?"

💡 ट्रिक:वक्ता और श्रोता के मध्य संवाद में शब्द-चमत्कार या स्वर के कारण अर्थ का जानबूझकर घुमाव देखना।
शब्दालंकारClass 9-10
#punaruktiprakash

काव्य में जहाँ किसी भाव (हर्ष, विस्मय, आग्रह, सौंदर्य या तीव्रता) को प्रभावशाली रूप से प्रकट करने के लिए एक ही शब्द की बिना अर्थ बदले लगातार दो बार आवृत्ति की जाती है, वहाँ "पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार" होता है। यहाँ दोनों शब्दों का अर्थ एक ही रहता है (यमक के समान भिन्न नहीं होता)।

काव्य उदाहरण (Poetic Line):

"मधुर-मधुर मेरे दीपक जल, युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल, प्रियतम का पथ आलोकित कर!"

यहाँ "मधुर-मधुर" और "युग-युग" शब्दों की आवृत्ति केवल भाव को गहन और संगीतमय बनाने के लिए हुई है, दोनों के अर्थ में कोई भिन्नता नहीं है। अतः यह पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।

💡 ट्रिक:एक ही शब्द लगातार दो बार आए और दोनों जगह उसका अर्थ बिल्कुल समान रहे।
शब्दालंकारClass 11-12
#veepsa

वीप्सा अलंकार

Veepsa (Exclamatory Emotional Repetition)

जहाँ आदर, हर्ष, शोक, विस्मय, घृणा या घबराहट आदि मनोवेगों को तीव्र रूप से व्यक्त करने के लिए किसी शब्द को दोहराया जाता है, वहाँ "वीप्सा अलंकार" होता है।

काव्य उदाहरण (Poetic Line):

"छिः-छिः! ऐसा घृणित कार्य तुम कर बैठे?"

यहाँ "छिः-छिः" की पुनरावृत्ति घृणा और तीव्र तिरस्कार के मनोभाव को व्यक्त करने के लिए हुई है।

💡 ट्रिक:मनोभाव सूचक विस्मयादिबोधक शब्दों (राम-राम, देखो-देखो, छिः-छिः, हा-हा) की आवृत्ति।
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अर्थालंकार

16 अलंकार

जहाँ काव्य का सौंदर्य शब्दों के बाह्य रूप पर नहीं, बल्कि उनके अंतर्निहित अर्थ, भाव, सादृश्य या कल्पना पर आश्रित होता है, वहाँ अर्थालंकार होता है। यहाँ शब्द के स्थान पर उसका पर्यायवाची रखने पर भी अलंकार का सौंदर्य अक्षुण्ण रहता है।

सभी 16 अर्थालंकार देखें→
अर्थालंकारClass 9-10
#upama

जहाँ किसी वस्तु या प्राणी के गुण, रूप, स्वभाव या सौंदर्य की समानता किसी अन्य प्रसिद्ध वस्तु या प्राणी से की जाती है, वहाँ "उपमा अलंकार" होता है। उपमा के चार अनिवार्य अंग होते हैं: 1. उपमेय (जिसकी तुलना हो), 2. उपमान (जिससे तुलना की जाए), 3. साधारण धर्म (समान गुण), और 4. वाचक शब्द (सा, सी, से, सम, सरिस, सदृश, जैसा)।

काव्य उदाहरण (Poetic Line):

"पीपर पात सरिस मन डोला।"

यहाँ मानव मन की चंचलता की तुलना पीपल के हिलते हुए पत्ते से की गई है। उपमेय: "मन", उपमान: "पीपर पात", साधारण धर्म: "डोला (हिलना/चंचल होना)", और वाचक शब्द: "सरिस"। चारों अंग उपस्थित होने से यह पूर्णोपमा अलंकार है।

💡 ट्रिक:पंक्ति में सा, सी, से, सम, सरिस, सदृश, जैसा, ज्यों जैसे वाचक शब्द देखना।
अर्थालंकारClass 9-10
#rupaka

जहाँ गुण की अत्यधिक समानता के कारण उपमेय में उपमान का अभेद आरोप (दोनों को एक ही मान लेना) कर दिया जाता है और कोई वाचक शब्द (सा, सी) नहीं होता, वहाँ "रूपक अलंकार" होता है। इसमें तुलना न करके उपमेय को ही उपमान का रूप दे दिया जाता है।

काव्य उदाहरण (Poetic Line):

"चरन कमल बंदौ हरिराई।"

यहाँ भगवान के चरणों (उपमेय) में कमल (उपमान) का अभेद आरोप किया गया है। यह नहीं कहा गया कि "चरण कमल जैसे हैं", बल्कि चरणों को ही सीधे "कमल" कह दिया गया है।

💡 ट्रिक:उपमेय और उपमान के बीच प्रायः योजक चिह्न (-) लगा होता है (जैसे चरण-कमल, चंद्र-खिलौना, राम-रतन) तथा "सा/सी" नहीं होता।
अर्थालंकारClass 9-10
#utpreksha

जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना या कल्पना की जाए, वहाँ "उत्प्रेक्षा अलंकार" होता है। इसमें किसी वस्तु को देखकर ऐसा लगता है मानो वह कोई दूसरी सुंदर वस्तु हो। इसके प्रमुख वाचक शब्द हैं: जनु, मनु, जानो, मानो, जनहुँ, मनहुँ, निश्चय, इव।

काव्य उदाहरण (Poetic Line):

"सोहत ओढ़ै पीत पट स्याम सलोने गात। मनहुँ नीलमनि सैल पर आतप पर्यो प्रभात॥"

श्रीकृष्ण के सांवले शरीर पर पीले वस्त्र देखकर ऐसी संभावना की गई है "मानो" नीलमणि पर्वत पर प्रातःकालीन सुनहरी धूप पड़ रही हो। "मनहुँ" वाचक शब्द से उत्प्रेक्षा स्पष्ट है।

💡 ट्रिक:काव्य पंक्ति में जनु, मनु, जानो, मानो, मनहुँ, जनहुँ शब्द देखते ही उत्प्रेक्षा अलंकार पहचानें।
अर्थालंकारClass 9-10
#atishayokti

काव्य में जहाँ किसी वस्तु, व्यक्ति, घटना या स्थिति का वर्णन लोक-सीमा अथवा वास्तविकता से बहुत अधिक बढ़ा-चढ़ाकर किया जाए, वहाँ "अतिशयोक्ति अलंकार" होता है। (अतिशय + उक्ति = अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात)।

काव्य उदाहरण (Poetic Line):

"हनुमान की पूँछ में लगन न पाई आग। लंका सिगरी जल गई गए निसाचर भाग॥"

यहाँ हनुमान जी की पूंछ में आग लगने से पहले ही संपूर्ण लंका के जल जाने और राक्षसों के भाग जाने का अस्वाभाविक बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया गया है।

💡 ट्रिक:घटना या कार्य का परिणाम कारण से पहले ही घटित दिखाया जाए या असंभव सीमा तक वर्णन हो।
अर्थालंकारClass 9-10
#manaveekaran

मानवीकरण अलंकार

Manaveekaran (Personification)

काव्य में जहाँ जड़ (अचेतन) प्रकृति, पेड़-पौधों, बादलों, ऋतुओं या निर्जीव वस्तुओं पर मानव की चेतना, क्रियाओं, भावनाओं या व्यवहार का आरोप किया जाता है (उन्हें मनुष्य की तरह कार्य करते दिखाया जाए), वहाँ "मानवीकरण अलंकार" होता है।

काव्य उदाहरण (Poetic Line):

"मेघ आए बड़े बन-ठन के संवर के।"

यहाँ बादलों (निर्जीव प्रकृति) को किसी मेहमान (दामाद) की तरह सज-धजकर और संवरकर आने के मानवीय क्रियाकलाप से युक्त दिखाया गया है।

💡 ट्रिक:प्रकृति के तत्वों (फूल, बादल, नदी, हवा, रात) को हंसते, रोते, सजते, चलते या बातें करते दिखाया जाना।
अर्थालंकारClass 11-12
#drishtanta

दृष्टांत अलंकार

Drishtanta (Exemplification / Mirror Analogy)

जहाँ पहले एक सामान्य या विशेष बात कही जाए और फिर उसी के समर्थन या पुष्टि के लिए उससे मिलती-जुलती दूसरी बात कही जाए, जिससे दोनों वाक्यों में "बिंब-प्रतिबिंब भाव" (आईने की तरह परछाईं) दिखाई दे, वहाँ "दृष्टांत अलंकार" होता है।

काव्य उदाहरण (Poetic Line):

"करत-करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान। रसरी आवत-जात ते सिल पर परत निसान॥"

पहली पंक्ति में सिद्धांत बताया गया है कि निरंतर अभ्यास से मूर्ख भी विद्वान बन जाता है; और दूसरी पंक्ति में इसका प्रमाण दृष्टांत दिया गया है कि कोमल रस्सी के बार-बार रगड़ खाने से कठोर पत्थर पर भी गहरा निशान पड़ जाता है।

💡 ट्रिक:दो पंक्तियों में से पहली पंक्ति में कोई नीति/सिद्धांत हो और दूसरी पंक्ति में उसका प्रत्यक्ष लौकिक उदाहरण दिया गया हो।
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उभयालंकार

2 अलंकार

जहाँ काव्य में शब्द और अर्थ — दोनों के एक साथ चमत्कारी प्रयोग से विशिष्ट सौंदर्य उत्पन्न होता है, वहाँ उभयालंकार होता है (जैसे संकर एवं संसृष्टि अलंकार)।

सभी 2 उभयालंकार देखें→
उभयालंकारCompetitive Exams
#sansrishti

संसृष्टि अलंकार

Sansrishti (Independent Collocation of Figures)

जहाँ दो या दो से अधिक अलंकार (शब्दालंकार अथवा अर्थालंकार) किसी एक पद्य में इस प्रकार एकत्र हों कि वे एक-दूसरे से पूर्णतः स्वतंत्र रहें (तिल और चावल के मिश्रण की तरह, जिन्हें आसानी से अलग किया जा सके), वहाँ "संसृष्टि अलंकार" होता है।

काव्य उदाहरण (Poetic Line):

"भूप सहस दस एकहि बारा। लगे उठावन टरइ न टारा॥"

यहाँ "भूप सहस दस" में अतिशयोक्ति अलंकार है और "टरइ न टारा" में अनुप्रास अलंकार है। दोनों अलंकार अपने-अपने स्थान पर स्वतंत्र रूप से स्पष्ट हैं।

💡 ट्रिक:एक ही पद्य में दो अलग-अलग अलंकार मौजूद हों और दोनों का अस्तित्व एक-दूसरे पर निर्भर न हो।
उभयालंकारCompetitive Exams
#sankara

संकर अलंकार

Sankara (Inextricable Blend of Figures)

जहाँ दो या दो से अधिक अलंकार इस प्रकार घुले-मिले हों कि उन्हें एक-दूसरे से पृथक् न किया जा सके (जैसे दूध और पानी का मिश्रण — क्षीर-नीर न्याय), अथवा यह निर्णय करना कठिन हो कि मुख्य कौन है और गौण कौन, वहाँ "संकर अलंकार" होता है।

काव्य उदाहरण (Poetic Line):

"चरण-कमल मृदु मंजु तुम्हारे।"

यहाँ "चरण-कमल" में रूपक अलंकार (अभेद आरोप) भी है और "मृदु मंजु" के कारण उपमा का भाव भी समाहित है; दोनों अलंकार क्षीर-नीर की भाँति परस्पर मिले हुए हैं।

💡 ट्रिक:एक ही अभिव्यक्ति में दो अलंकारों का ऐसा परस्पर गुंफन जिसे अलग-अलग करके देखना संभव न हो।
FREQUENTLY ASKED QUESTIONS

अलंकार से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तरी (FAQ)

बोर्ड परीक्षाओं, CTET, REET एवं TGT/PGT में बार-बार पूछे जाने वाले प्रमुख सैद्धांतिक प्रश्न

अलंकार किसे कहते हैं? (What is Alankar in Hindi Poetics?)▼
काव्य की शोभा बढ़ाने वाले धर्मों या तत्वों को 'अलंकार' कहते हैं। जिस प्रकार आभूषण (गहने) स्त्री के शारीरिक सौंदर्य को निखारते हैं, उसी प्रकार अलंकार काव्य (कविता) के भाषा-सौंदर्य, नाद-झंकार और अर्थ-गांभीर्य को बढ़ाते हैं। आचार्य दंडी के अनुसार — 'काव्यशोभाकरान् धर्मान् अलंकारान् प्रचक्षते' (काव्य की शोभा बढ़ाने वाले धर्म अलंकार कहलाते हैं)।
अलंकार के मुख्य कितने भेद होते हैं? (Types of Alankar in Hindi)▼
हिंदी व्याकरण और काव्यशास्त्र में अलंकार के मुख्य रूप से 3 भेद माने जाते हैं: 1. शब्दालंकार (जहाँ शब्दों या वर्णों की ध्वनि से सौंदर्य उत्पन्न हो, जैसे अनुप्रास, यमक, श्लेष), 2. अर्थालंकार (जहाँ अर्थ या भाव के कारण चमत्कार उत्पन्न हो, जैसे उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति, मानवीकरण), और 3. उभयालंकार (जहाँ शब्द और अर्थ दोनों के प्रयोग से सौंदर्य बढ़े, जैसे संसृष्टि और संकर)।
उपमा और रूपक अलंकार में क्या अंतर है? (Difference between Upama and Rupak)▼
उपमा अलंकार में दो भिन्न वस्तुओं के बीच समानता या तुलना की जाती है और तुलनात्मक वाचक शब्द (सा, सी, से, सरिस, सम, जैसा) प्रयुक्त होते हैं (जैसे: 'हरिपद कोमल कमल से')। इसके विपरीत, रूपक अलंकार में तुलना न करके उपमेय को ही सीधे उपमान मान लिया जाता है (अभेद आरोप), इसमें कोई वाचक शब्द नहीं होता (जैसे: 'चरन कमल बंदौ हरिराई')।
यमक और श्लेष अलंकार में क्या अंतर है? (Difference between Yamak and Shlesh)▼
यमक अलंकार में एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आता है और प्रत्येक बार उसका अर्थ भिन्न होता है (जैसे: 'कनक कनक ते सौ गुनी' — यहाँ पहला कनक धतूरा और दूसरा कनक सोना है)। श्लेष अलंकार में शब्द केवल एक ही बार प्रयुक्त होता है, किंतु संदर्भ के अनुसार उसके एक साथ दो या अधिक अर्थ चिपके होते हैं (जैसे: 'रहिमन पानी राखिए' — यहाँ पानी के चमक, सम्मान और जल तीन अर्थ हैं)।
उत्प्रेक्षा अलंकार को पहचानने की सबसे आसान ट्रिक क्या है?▼
उत्प्रेक्षा अलंकार की पहचान उसके वाचक शब्दों से तुरंत हो जाती है। यदि किसी काव्य पंक्ति में 'जनु', 'मनु', 'जानो', 'मानो', 'जनहुँ', 'मनहुँ', 'निश्चय' या 'इव' में से कोई भी शब्द आए, तो वहाँ 99% उत्प्रेक्षा अलंकार होता है (जैसे: 'सोहत ओढ़ै पीत पट स्याम सलोने गात। मनहुँ नीलमनि सैल पर आतप पर्यो प्रभात॥')।