Punaruktiprakash (Emphatic Repetition) — लक्षण, परिभाषा व उदाहरणपुनरुक्तिप्रकाश अलंकार
उच्चारण व लिपि: Punaruktiprakash Alankar
काव्य में जहाँ किसी भाव (हर्ष, विस्मय, आग्रह, सौंदर्य या तीव्रता) को प्रभावशाली रूप से प्रकट करने के लिए एक ही शब्द की बिना अर्थ बदले लगातार दो बार आवृत्ति की जाती है, वहाँ "पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार" होता है। यहाँ दोनों शब्दों का अर्थ एक ही रहता है (यमक के समान भिन्न नहीं होता)।
एक ही शब्द लगातार दो बार आए और दोनों जगह उसका अर्थ बिल्कुल समान रहे।
Tip in English: A word repeats back-to-back with zero change in meaning, solely serving emphatic or rhythmic beauty.
"मधुर-मधुर मेरे दीपक जल, युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल, प्रियतम का पथ आलोकित कर!"
काव्यशास्त्रीय विश्लेषण (Literary Explanation):
यहाँ "मधुर-मधुर" और "युग-युग" शब्दों की आवृत्ति केवल भाव को गहन और संगीतमय बनाने के लिए हुई है, दोनों के अर्थ में कोई भिन्नता नहीं है। अतः यह पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।
Analysis in English: "Madhur-madhur" (sweetly) and "yug-yug" (age after age) repeat with identical senses to amplify emotional yearning.
अन्य प्रसिद्ध काव्य दोहे एवं उदाहरण
"पुनि-पुनि मोहि देखराव कुठारू। चहत उड़ावन फूँकि पहारू॥"
यहाँ "पुनि-पुनि" का अर्थ "बार-बार" है। शब्द की आवृत्ति कथन में दृढ़ता और चमत्कार भरने के लिए हुई है।
"Puni-puni" identically signifies "again and again", lending dramatic defiance to Lakshmana's words.
समान श्रेणी के अन्य प्रमुख अलंकार (शब्दालंकार)
सभी शब्दालंकार देखें →अनुप्रास अलंकार
Anuprasa (Alliteration)
काव्य में जहाँ एक ही वर्ण (व्यंजन) की आवृत्ति बार-बार एक निश्चित क्रम में होती है, जिससे चमत्कारिक नाद-सौंदर्य और लय उत्पन्न होती है, वहाँ "अनुप्रास अलंकार" होता है। इसमें स्वरों की समानता होना आवश्यक नहीं है, केवल व्यंजन वर्णों की आवृत्ति ही मुख्य है।
"चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल-थल में।"
इस काव्य पंक्ति में "च" वर्ण की आवृत्ति (चारु, चंद्र, चंचल) तथा "ल" वर्ण की आवृत्ति (खेल, जल, थल) से संगीतात्मक झंकार उत्पन्न हो रही है, अतः यहाँ अनुप्रास अलंकार है।
यमक अलंकार
Yamaka (Polysemic Repetition)
काव्य में जहाँ एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आए, किंतु प्रत्येक बार उसका अर्थ भिन्न (अलग) हो, वहाँ "यमक अलंकार" होता है। "यमक" का शाब्दिक अर्थ होता है — "जोड़ा" या "युग्म"।
"कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय। या खाए बौराय जग, वा पाए बौराय॥"
यहाँ "कनक" शब्द दो बार प्रयुक्त हुआ है। प्रथम "कनक" का अर्थ "धतूरा" (नशीला फल) है और द्वितीय "कनक" का अर्थ "स्वर्ण" (सोना) है। दोनों बार भिन्न अर्थ होने से यमक अलंकार है।
श्लेष अलंकार
Shlesha (Paranomasia / Pun)
काव्य में जहाँ कोई शब्द एक ही बार प्रयुक्त हो, किंतु संदर्भ के अनुसार उसके दो या दो से अधिक भिन्न अर्थ निकलते हों, वहाँ "श्लेष अलंकार" होता है। "श्लेष" का शाब्दिक अर्थ होता है — "चिपका हुआ होना" (एक शब्द में कई अर्थ चिपके रहना)।
"रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून॥"
यहाँ तीसरी बार प्रयुक्त "पानी" शब्द के तीन भिन्न अर्थ हैं: 1. मोती के पक्ष में "चमक/आभा", 2. मनुष्य के पक्ष में "सम्मान/प्रतिष्ठा", तथा 3. चून (आटे) के पक्ष में "जल"। अतः यहाँ श्लेष अलंकार है।