Drishtanta (Exemplification / Mirror Analogy) — लक्षण, परिभाषा व उदाहरणदृष्टांत अलंकार
उच्चारण व लिपि: Drishtanta Alankar
जहाँ पहले एक सामान्य या विशेष बात कही जाए और फिर उसी के समर्थन या पुष्टि के लिए उससे मिलती-जुलती दूसरी बात कही जाए, जिससे दोनों वाक्यों में "बिंब-प्रतिबिंब भाव" (आईने की तरह परछाईं) दिखाई दे, वहाँ "दृष्टांत अलंकार" होता है।
दो पंक्तियों में से पहली पंक्ति में कोई नीति/सिद्धांत हो और दूसरी पंक्ति में उसका प्रत्यक्ष लौकिक उदाहरण दिया गया हो।
Tip in English: Line 1 asserts a moral truth; Line 2 provides everyday empirical proof reflecting the exact same principle.
"करत-करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान। रसरी आवत-जात ते सिल पर परत निसान॥"
काव्यशास्त्रीय विश्लेषण (Literary Explanation):
पहली पंक्ति में सिद्धांत बताया गया है कि निरंतर अभ्यास से मूर्ख भी विद्वान बन जाता है; और दूसरी पंक्ति में इसका प्रमाण दृष्टांत दिया गया है कि कोमल रस्सी के बार-बार रगड़ खाने से कठोर पत्थर पर भी गहरा निशान पड़ जाता है।
Analysis in English: The first line affirms that regular practice makes the dullest person wise; the second line provides mirror proof: a soft rope rubbing continuously grooves hard stone.
अन्य प्रसिद्ध काव्य दोहे एवं उदाहरण
"जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग। चंदन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग॥"
उत्तम स्वभाव वाले व्यक्ति पर कुसंगति का प्रभाव न पड़ने के सिद्धांत को स्पष्ट करने हेतु चंदन के वृक्ष और विषैले सांपों का दृष्टांत दिया गया है।
The proposition that a noble nature is immune to evil company is substantiated by the mirror analogy that venomous serpents clinging to sandalwood trees cannot poison them.
समान श्रेणी के अन्य प्रमुख अलंकार (अर्थालंकार)
सभी अर्थालंकार देखें →उपमा अलंकार
Upama (Simile)
जहाँ किसी वस्तु या प्राणी के गुण, रूप, स्वभाव या सौंदर्य की समानता किसी अन्य प्रसिद्ध वस्तु या प्राणी से की जाती है, वहाँ "उपमा अलंकार" होता है। उपमा के चार अनिवार्य अंग होते हैं: 1. उपमेय (जिसकी तुलना हो), 2. उपमान (जिससे तुलना की जाए), 3. साधारण धर्म (समान गुण), और 4. वाचक शब्द (सा, सी, से, सम, सरिस, सदृश, जैसा)।
"पीपर पात सरिस मन डोला।"
यहाँ मानव मन की चंचलता की तुलना पीपल के हिलते हुए पत्ते से की गई है। उपमेय: "मन", उपमान: "पीपर पात", साधारण धर्म: "डोला (हिलना/चंचल होना)", और वाचक शब्द: "सरिस"। चारों अंग उपस्थित होने से यह पूर्णोपमा अलंकार है।
रूपक अलंकार
Rupaka (Metaphor)
जहाँ गुण की अत्यधिक समानता के कारण उपमेय में उपमान का अभेद आरोप (दोनों को एक ही मान लेना) कर दिया जाता है और कोई वाचक शब्द (सा, सी) नहीं होता, वहाँ "रूपक अलंकार" होता है। इसमें तुलना न करके उपमेय को ही उपमान का रूप दे दिया जाता है।
"चरन कमल बंदौ हरिराई।"
यहाँ भगवान के चरणों (उपमेय) में कमल (उपमान) का अभेद आरोप किया गया है। यह नहीं कहा गया कि "चरण कमल जैसे हैं", बल्कि चरणों को ही सीधे "कमल" कह दिया गया है।
उत्प्रेक्षा अलंकार
Utpreksha (Poetic Fancy / Conceit)
जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना या कल्पना की जाए, वहाँ "उत्प्रेक्षा अलंकार" होता है। इसमें किसी वस्तु को देखकर ऐसा लगता है मानो वह कोई दूसरी सुंदर वस्तु हो। इसके प्रमुख वाचक शब्द हैं: जनु, मनु, जानो, मानो, जनहुँ, मनहुँ, निश्चय, इव।
"सोहत ओढ़ै पीत पट स्याम सलोने गात। मनहुँ नीलमनि सैल पर आतप पर्यो प्रभात॥"
श्रीकृष्ण के सांवले शरीर पर पीले वस्त्र देखकर ऐसी संभावना की गई है "मानो" नीलमणि पर्वत पर प्रातःकालीन सुनहरी धूप पड़ रही हो। "मनहुँ" वाचक शब्द से उत्प्रेक्षा स्पष्ट है।