Veepsa (Exclamatory Emotional Repetition) — लक्षण, परिभाषा व उदाहरणवीप्सा अलंकार
उच्चारण व लिपि: Veepsa Alankar
जहाँ आदर, हर्ष, शोक, विस्मय, घृणा या घबराहट आदि मनोवेगों को तीव्र रूप से व्यक्त करने के लिए किसी शब्द को दोहराया जाता है, वहाँ "वीप्सा अलंकार" होता है।
मनोभाव सूचक विस्मयादिबोधक शब्दों (राम-राम, देखो-देखो, छिः-छिः, हा-हा) की आवृत्ति।
Tip in English: Watch for consecutive emotional interjections capturing surprise, revulsion, or deep grief.
"छिः-छिः! ऐसा घृणित कार्य तुम कर बैठे?"
काव्यशास्त्रीय विश्लेषण (Literary Explanation):
यहाँ "छिः-छिः" की पुनरावृत्ति घृणा और तीव्र तिरस्कार के मनोभाव को व्यक्त करने के लिए हुई है।
Analysis in English: The exclamation "chhih-chhih" repeats to articulate intense revulsion and moral indignation.
समान श्रेणी के अन्य प्रमुख अलंकार (शब्दालंकार)
सभी शब्दालंकार देखें →अनुप्रास अलंकार
Anuprasa (Alliteration)
काव्य में जहाँ एक ही वर्ण (व्यंजन) की आवृत्ति बार-बार एक निश्चित क्रम में होती है, जिससे चमत्कारिक नाद-सौंदर्य और लय उत्पन्न होती है, वहाँ "अनुप्रास अलंकार" होता है। इसमें स्वरों की समानता होना आवश्यक नहीं है, केवल व्यंजन वर्णों की आवृत्ति ही मुख्य है।
"चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल-थल में।"
इस काव्य पंक्ति में "च" वर्ण की आवृत्ति (चारु, चंद्र, चंचल) तथा "ल" वर्ण की आवृत्ति (खेल, जल, थल) से संगीतात्मक झंकार उत्पन्न हो रही है, अतः यहाँ अनुप्रास अलंकार है।
यमक अलंकार
Yamaka (Polysemic Repetition)
काव्य में जहाँ एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आए, किंतु प्रत्येक बार उसका अर्थ भिन्न (अलग) हो, वहाँ "यमक अलंकार" होता है। "यमक" का शाब्दिक अर्थ होता है — "जोड़ा" या "युग्म"।
"कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय। या खाए बौराय जग, वा पाए बौराय॥"
यहाँ "कनक" शब्द दो बार प्रयुक्त हुआ है। प्रथम "कनक" का अर्थ "धतूरा" (नशीला फल) है और द्वितीय "कनक" का अर्थ "स्वर्ण" (सोना) है। दोनों बार भिन्न अर्थ होने से यमक अलंकार है।
श्लेष अलंकार
Shlesha (Paranomasia / Pun)
काव्य में जहाँ कोई शब्द एक ही बार प्रयुक्त हो, किंतु संदर्भ के अनुसार उसके दो या दो से अधिक भिन्न अर्थ निकलते हों, वहाँ "श्लेष अलंकार" होता है। "श्लेष" का शाब्दिक अर्थ होता है — "चिपका हुआ होना" (एक शब्द में कई अर्थ चिपके रहना)।
"रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून॥"
यहाँ तीसरी बार प्रयुक्त "पानी" शब्द के तीन भिन्न अर्थ हैं: 1. मोती के पक्ष में "चमक/आभा", 2. मनुष्य के पक्ष में "सम्मान/प्रतिष्ठा", तथा 3. चून (आटे) के पक्ष में "जल"। अतः यहाँ श्लेष अलंकार है।