हिंदी व्याकरण संधि के 18 नियम एवं सूत्र (All 18 Standard Sandhi Rules)
स्वर संधि (5 भेद), व्यंजन संधि (7 नियम) और विसर्ग संधि (6 नियम) के प्रामाणिक ध्वनि परिवर्तन सूत्र, विच्छेद प्रक्रिया और पहचान की आसान ट्रिक्स।
स्वर संधि (अच् संधि) (Swar Sandhi (Vowel Harmonies))
दो स्वरों के परस्पर मेल से होने वाला ध्वनि परिवर्तन (दीर्घ, गुण, वृद्धि, यण, अयादि)
दो सजातीय (समान) ह्रस्व या दीर्घ स्वर जब आपस में मिलते हैं, तो वे मिलकर उसी स्वर के दीर्घ रूप (आ, ई, ऊ, ऋ) में बदल जाते हैं। इसे दीर्घ संधि कहते हैं।
पहचान ट्रिक: संधियुक्त शब्द के बीच में यदि "आ" (ा), "ई" (ी), या "ऊ" (ू) की दीर्घ मात्रा दिखाई दे, तो वहाँ अधिकांशतः दीर्घ संधि होती है। जैसे: देवालय (ा), कवीश (ी), भानूदय (ू)।
यदि "अ" या "आ" के बाद ह्रस्व या दीर्घ "इ/ई", "उ/ऊ" या "ऋ" आए, तो दोनों मिलकर क्रमशः "ए", "ओ" और "अर्" में परिवर्तित हो जाते हैं। इसे गुण संधि कहते हैं।
पहचान ट्रिक: शब्द के मध्य में एकल चोटी वाली मात्रा "ए" ( े ) या "ओ" ( ो ) अथवा अंत में "र्षि" (अर्) दिखे तो वहाँ 99% गुण संधि होती है। जैसे: राकेश, परोपकार, महर्षि।
यदि "अ" या "आ" के बाद "ए" या "ऐ" आए तो दोनों मिलकर "ऐ" ( ै ) बन जाते हैं; तथा यदि "ओ" या "औ" आए तो दोनों मिलकर "औ" ( ौ ) बन जाते हैं। इसे वृद्धि संधि कहते हैं।
पहचान ट्रिक: शब्द के मध्य में सिर पर दो चोटियों वाली मात्रा "ऐ" ( ै ) या "औ" ( ौ ) दिखाई दे तो निसंदेह वृद्धि संधि है। जैसे: सदैव ( ै ), जलौघ ( ौ ), तथैव ( ै )।
यदि ह्रस्व या दीर्घ "इ/ई", "उ/ऊ" या "ऋ" के बाद कोई भिन्न (असमान) स्वर आए, तो इ/ई का "य्", उ/ऊ का "व्", और ऋ का "र्" हो जाता है। इसे यण संधि कहते हैं।
पहचान ट्रिक: शब्द में "य", "व" या "त्र" से ठीक पहले आधा व्यंजन (अर्ध वर्ण) आए, तो वहाँ अधिकांशतः यण संधि होती है। जैसे: इ-त्या-दि (त् + य), स्वा-गत (स् + व), पि-त्रा-ज्ञा (त् + र)।
यदि "ए", "ऐ", "ओ", "औ" के बाद कोई भिन्न स्वर आए तो "ए" का "अय्", "ऐ" का "आय्", "ओ" का "अव्" और "औ" का "आव्" हो जाता है। इसे अयादि संधि कहते हैं।
पहचान ट्रिक: उच्चारण करने पर शब्द में "अय", "आय", "अव" या "आव" की स्पष्ट ध्वनि सुनाई देती है और प्रायः ये तीन अक्षरों के सरल शब्द होते हैं जिनमें कोई संयुक्त वर्ण नहीं होता। जैसे: नयन (अय), गायक (आय), पवन (अव), पावक (आव)।
व्यंजन संधि (हल् संधि) (Vyanjan Sandhi (Consonant Alterations))
व्यंजन के साथ स्वर अथवा व्यंजन के मेल से उत्पन्न विकार (7 मुख्य प्रामाणिक नियम)
वर्ग के पहले वर्ण का तीसरे वर्ण में परिवर्तन
First Consonant to Third Consonant Rule (k/ch/t/t/p → g/j/d/d/b)
यदि किसी वर्ग के पहले वर्ण (क्, च्, ट्, त्, प्) के बाद किसी वर्ग का तीसरा या चौथा वर्ण, अथवा य, र, ल, व, ह या कोई स्वर आए, तो पहला वर्ण अपने ही वर्ग के तीसरे वर्ण (ग्, ज्, ड्, द्, ब्) में परिवर्तित हो जाता है।
पहचान ट्रिक: संधियुक्त शब्द के बीच में यदि आधा या पूरा "ग्, ज्, ड्, द्, ब्" दिखाई दे और विच्छेद करने पर प्रथम शब्द "क्, च्, ट्, त्, प्" पर समाप्त हो, तो यह पहला-तीसरा नियम है।
वर्ग के पहले वर्ण का पाँचवें वर्ण में परिवर्तन
First Consonant to Nasal Fifth Rule (Nasalization to ङ, ञ, ण, न, म)
यदि किसी वर्ग के पहले वर्ण (क्, च्, ट्, त्, प्) के बाद कोई अनुनासिक वर्ण (विशेष रूप से न् या म्) आए, तो पहला वर्ण अपने ही वर्ग के पाँचवें (अनुनासिक) वर्ण (ङ्, ञ्, ण्, न्, म्) में बदल जाता है।
पहचान ट्रिक: संधियुक्त शब्द में यदि संयुक्त पंचमाक्षर जैसे "ङ्क/ङ्म", "ण्ण/ण्म", "न्न/न्म" या "म्म" दिखाई दें, तो वहाँ पहला-पाँचवाँ नियम होता है।
त् के बाद यदि च/छ आए तो "च्च/च्छ", ज/झ आए तो "ज्ज", ट/ठ आए तो "ट्ट", ड/ढ आए तो "ड्ड", ल आए तो "ल्ल", श आए तो "च्छ" (त् का च् और श का छ्), तथा ह आए तो "द्ध" (त् का द् और ह का ध्) बन जाता है।
पहचान ट्रिक: शब्द के बीच में द्वित्व व्यंजन "च्च, ज्ज, ल्ल, ट्ट" अथवा संयुक्त "च्छ, द्ध" मिले, तो समझ लें कि वहाँ त् सम्बन्धी नियम है। विच्छेद करने पर प्रथम शब्द में हमेशा हलंत "त्" होगा।
'छ' सम्बन्धी नियम (तुक् / च् का आगम)
Chha Consonant Insertion Rule (Insertion of half 'ch')
यदि किसी ह्रस्व स्वर (अ, इ, उ, ऋ) या "आ" के बाद "छ" वर्ण आए, तो संधि होने पर "छ" से पहले आधा "च्" जुड़ जाता है (इसे व्याकरण में च् का आगम या तुक् आगम कहते हैं)।
पहचान ट्रिक: विच्छेद करते समय बस बीच के आधे "च्" को हटा दीजिए, दोनों मूल शब्द अपने शुद्ध रूप में स्वतः सामने आ जाते हैं! जैसे: परिच्छेद = परि + छेद।
'म्' सम्बन्धी नियम (अनुस्वार एवं द्वित्व)
Rules of 'M' (Anusvara & Doubling Transformation)
यदि "म्" के बाद कोई स्पर्श व्यंजन (क् से भ् तक) आए तो म् अनुस्वार (ं) या बाद वाले वर्ग के पंचम वर्ण में बदलता है। यदि म् के बाद अंतःस्थ (य, र, ल, व) या ऊष्म (श, ष, स, ह) आए तो म् सदैव अनुस्वार होता है। यदि म् के बाद म् आए तो द्वित्व "म्म" बनता है।
पहचान ट्रिक: शब्द के आरंभ में "सं-" (अनुस्वार) या "सम्म्-" दिखे, तो विच्छेद में पहला पद प्रायः "सम्" (हलंत म्) उपसर्ग होता है। जैसे: संसार = सम् + सार।
'न्' का 'ण्' में परिवर्तन नियम (णत्व विधान)
Na to Retroflex Na Transformation (Nata-Vidhāna Rule)
यदि किसी शब्द में ऋ, र् या ष् के बाद "न्" व्यंजन आए (चाहे बीच में स्वर, क-वर्ग, प-वर्ग, अनुस्वार या य, व, ह का व्यवधान क्यों न हो), तो "न्" का "ण्" (मूर्धन्य ण) हो जाता है।
पहचान ट्रिक: विच्छेद करते समय अंतिम पद के "ण्" को वापस मूल दन्त्य "न्" में बदल दिया जाता है। जैसे: परिणाम = परि + नाम, प्रमाण = प्र + मान।
'स्' का 'ष्' में परिवर्तन नियम (षत्व विधान)
Sa to Retroflex Sha Transformation (Shatva-Vidhāna Rule)
यदि दन्त्य "स्" से पूर्व "अ" या "आ" से भिन्न कोई अन्य स्वर (जैसे इ, उ आदि) आए, तो "स्" मूर्धन्य "ष्" में बदल जाता है। इसे षत्व विधान कहते हैं।
पहचान ट्रिक: विच्छेद करते समय "ष्" को वापस मूल "स्" में बदल दिया जाता है। जैसे: विषम = वि + सम, सुषमा = सु + समा।
विसर्ग संधि (Visarg Sandhi (Aspirate Mutations))
विसर्ग (ः) के साथ स्वर अथवा व्यंजन के मेल से होने वाला परिवर्तन (6 मानक नियम)
यदि विसर्ग (ः) से पहले "अ" स्वर हो और बाद में "अ" अथवा किसी वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवाँ वर्ण, या य, र, ल, व, ह आए, तो विसर्ग का "ओ" ( ो ) हो जाता है।
पहचान ट्रिक: संधियुक्त शब्द में यदि "मनो-", "यशो-", "तपो-", "सरो-", "अधो-" आदि दिखाई दें, तो "ओ" की मात्रा को हटाकर विसर्ग (ः) लगा दें। जैसे: मनोरथ = मनः + रथ।
यदि विसर्ग से पहले "अ" और "आ" को छोड़कर कोई अन्य स्वर (जैसे इ, उ) हो और बाद में कोई स्वर या किसी वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवाँ वर्ण, अथवा य, र, ल, व, ह आए, तो विसर्ग "र्" (रेफ) में बदल जाता है।
पहचान ट्रिक: यदि शब्द के ऊपर रेफ "र्" दिखे (जैसे निर्धन, दुर्बल) या "निरा-", "दुरा-" दिखाई दे, तो वहाँ विसर्ग का र् में परिवर्तन होता है। विच्छेद: निः + धन, निः + आशा।
यदि विसर्ग के बाद "च", "छ" या "श" आए, तो विसर्ग का तालव्य "श्" (आधा श) हो जाता है।
पहचान ट्रिक: शब्द के बीच में संयुक्त वर्ण "श्च" या "श्छ" दिखाई दे, तो समझ लें कि वहाँ विसर्ग का श् हुआ है। विच्छेद करते समय "श्" के स्थान पर विसर्ग लगा दें। जैसे: निश्चिंत = निः + चिंत।
यदि विसर्ग से पहले "इ" या "उ" स्वर हो और बाद में क, ख, ट, ठ, प, फ में से कोई वर्ण आए, तो विसर्ग का मूर्धन्य "ष्" (आधा ष) हो जाता है।
पहचान ट्रिक: यदि शब्द के बीच में "ष्क", "ष्ट", "ष्प" या "ष्फ" दिखाई दे, तो ष् को विसर्ग (ः) में बदल दीजिए। जैसे: निष्कपट = निः + कपट, धनुष्टंकार = धनुः + टंकार।
यदि विसर्ग के बाद "त", "थ" या "स" आए, तो विसर्ग का दन्त्य "स्" (आधा स) हो जाता है।
पहचान ट्रिक: शब्द के बीच में संयुक्त "स्त" या "स्स" मिले, तो आधे "स्" के स्थान पर विसर्ग लगा दें। जैसे: नमस्ते = नमः + ते, निस्तेज = निः + तेज।
विसर्ग का लोप एवं पूर्व स्वर का दीर्घ होना
Visarga Elision & Preceding Vowel Lengthening Rule
यदि विसर्ग के बाद "र" वर्ण आए, तो विसर्ग का लोप हो जाता है और विसर्ग से पहले का ह्रस्व स्वर दीर्घ (इ का ई, उ का ऊ) हो जाता है। इसके अतिरिक्त यदि विसर्ग से पहले "अ/आ" हो और बाद में कोई भिन्न स्वर आए, तो केवल विसर्ग का लोप होता है।
पहचान ट्रिक: "नी-" से शुरू होने वाले वे शब्द जिनमें दूसरा वर्ण "र" हो (जैसे नीरोग, नीरस, नीरव), उनमें विच्छेद करते समय छोटी इ और विसर्ग (निः) लग जाता है। जैसे: नीरोग = निः + रोग।