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Classical Navras (Nine Core Sentiments)शास्त्रीय नवरस — लक्षण, स्थायी भाव एवं प्रामाणिक उदाहरण

भरतमुनि के नाट्यशास्त्र एवं आचार्य अभिनवगुप्त द्वारा प्रतिष्ठित 9 मौलिक काव्य-रस जो मानवीय चित्त के मूल स्थायी भावों पर आधारित हैं।

📜 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Historical Context):

नाट्यशास्त्र में भरतमुनि ने मूल रूप से 8 रसों का उल्लेख किया था। बाद में आचार्य उद्भट एवं अभिनवगुप्त ने शांत रस को जोड़कर "नवरस" की सार्वकालिक अवधारणा स्थापित की।

शास्त्रीय नवरस के सभी 9 रस

कक्षा 9-10, 11-12 एवं प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु
Showing 1–9 of 9 entries
शास्त्रीय नवरसClass 9-10
#shringar-ras

शृंगार रस

स्थायी भाव: रति (प्रेम)

Shringar Ras (Erotic / Romantic Sentiment) • Rati (Love / Romantic Attraction)

काव्य या नाटक में नायक और नायिका के पारस्परिक प्रेम, आकर्षण, मिलन अथवा विरह की स्थिति का जब रस रूप में परिपाक होता है, तब "शृंगार रस" की निष्पत्ति होती है। इसे सभी रसों में सर्वाधिक व्यापक, सरस और रमणीय होने के कारण "रसराज" (रसों का राजा) या "रसबति" कहा जाता है। इसके दो मुख्य भेद होते हैं: संयोग शृंगार (मिलन) और वियोग/विप्रलम्भ शृंगार (विरह)।

प्रामाणिक काव्य उदाहरण (Verse Example):

"बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय। सौंह करैं, भौंहनु हँसै, दैन कहैं, नटि जाय॥"

इस दोहे में गोपियों द्वारा श्रीकृष्ण से बातचीत करने के सुख (बतरस) के लोभ में उनकी बाँसुरी छिपा लेने का अत्यंत मनोहर चित्रण है। जब कृष्ण बाँसुरी माँगते हैं तो वे सौगंध खाती हैं पर भौंहों से मुस्कराती हैं और अंत में देने से इनकार कर देती हैं। यहाँ नायक-नायिका के बीच मधुर क्रीड़ा एवं प्रेमपूर्ण हास-परिहास से "संयोग शृंगार" की निष्पत्ति होती है।

आलंबन:आश्रय: गोपियाँ / नायक-नायिका; विषय: श्रीकृष्ण / प्रियतम
संचारी भाव:हर्ष, लज्जा (व्रीड़ा), उत्सुकता, चपलता, अभिलाषा, स्मृति, उन्माद
💡 पहचान:काव्य में जहाँ भी नायक-नायिका का प्रेम, सौंदर्य, मिलन, नैन-मटक्का, अथवा विरह-वेदना व आँसुओं का वर्णन हो, वहाँ शृंगार रस होता है। (संयोग = मिलना; वियोग = बिछड़ना)।
शास्त्रीय नवरसClass 9-10
#hasya-ras

हास्य रस

स्थायी भाव: हास (हँसी / आमोद)

Hasya Ras (Comic / Humorous Sentiment) • Haas (Laughter / Mirth)

काव्य अथवा नाटक में किसी व्यक्ति के विकृत रूप, विचित्र वेशभूषा, बेडौल आकार, हास्यास्पद वाणी अथवा अनोखी चेष्टाओं को देखकर या सुनकर जब मन में हँसी (हास) का स्थायी भाव जाग्रत होकर पुष्ट होता है, तब "हास्य रस" की निष्पत्ति होती है।

प्रामाणिक काव्य उदाहरण (Verse Example):

"सीस पर गंगा हसैं, भुजनि भुजंगा हसैं, हास ही को दंगा भयो नंगा के बिवाह में।"

महाकवि पद्माकर द्वारा रचित इस छंद में भगवान शिव के विचित्र विवाह दृश्य का अत्यंत मनोरंजक चित्रण है। उनके सिर पर गंगा जी और भुजाओं में लिपटे सर्प हँस रहे हैं। दिगंबर रूपधारी शिवजी की बारात की अद्भुत वेशभूषा को देखकर संपूर्ण समाज में केवल हँसी का दंगल मच जाता है, जिससे हास्य रस प्रस्फुटित होता है।

आलंबन:आश्रय: हँसने वाला व्यक्ति/पाठक; विषय: विचित्र वेशभूषा, बेडौल आकृति या हास्यास्पद हरकत करने वाला पात्र
संचारी भाव:हर्ष, चपलता, उत्सुकता, निद्रा-भंग, उत्सुकता, विस्मय
💡 पहचान:काव्य में जहाँ किसी विसंगति, चुटकुले, विचित्र वेशभूषा या मूर्खतापूर्ण प्रसंग को पढ़कर स्वतः हँसी या मुस्कान आ जाए, वहाँ हास्य रस होता है।
शास्त्रीय नवरसClass 9-10
#karun-ras

करुण रस

स्थायी भाव: शोक (दुःख / विषाद)

Karun Ras (Pathetic / Compassionate / Sorrowful Sentiment) • Shok (Sorrow / Grief / Deep Loss)

काव्य में जहाँ किसी प्रियजन की मृत्यु, स्थायी वियोग, बंधु-विनाश, अत्यधिक धन-हानि अथवा किसी दारुण अनिष्ट के कारण हृदय में गहन विषाद और रुदन का भाव उत्पन्न होता है, वहाँ "करुण रस" की निष्पत्ति होती है। इसका स्थायी भाव "शोक" है। (ध्यान दें: वियोग शृंगार में पुनः मिलन की आशा शेष रहती है, परंतु करुण रस में प्रिय के सदा के लिए खो जाने का निरुपाय दुःख होता है)।

प्रामाणिक काव्य उदाहरण (Verse Example):

"दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज, जो नहीं कही!"

महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" द्वारा अपनी दिवंगत पुत्री सरोज की स्मृति में रचित इस अमर पंक्ति में जीवन भर के असहनीय अभावों, संघर्षों और पुत्री की अकाल मृत्यु का अपार शोक एक ही साँस में फूट पड़ा है। यहाँ कवि के हृदय का मौन क्रंदन और निरुपाय व्यथा करुण रस की पराकाष्ठा है।

आलंबन:आश्रय: दुःखी व्यक्ति / पाठक; विषय: मृत प्रियजन, दीन-हीन पीड़ित व्यक्ति, विनष्ट कुल
संचारी भाव:निर्वेद, ग्लानि, दैन्य, विषाद, मोह, स्मृति, जड़ता, उन्माद
💡 पहचान:जहाँ मृत्यु, अनाथ होने, प्रिय के विनाश, फूट-फूटकर रोने, छाती पीटने अथवा कभी न समाप्त होने वाले गहरे दुःख का वर्णन हो, वहाँ करुण रस होता है।
शास्त्रीय नवरसClass 9-10
#raudra-ras

रौद्र रस

स्थायी भाव: क्रोध (कोप / अमर्ष)

Raudra Ras (Furious / Wrathful Sentiment) • Krodha (Wrath / Fury / Intense Anger)

काव्य में जब किसी विरोधी, शत्रु, दुष्ट, समाज-कंटक अथवा गुरुजनों का अपमान करने वाले व्यक्ति के अनुचित व्यवहार, कटु वचनों या देश-धर्म के द्रोह को देखकर हृदय में प्रतिशोध और प्रचंड क्रोध का भाव जाग्रत होता है, तब "रौद्र रस" की निष्पत्ति होती है। इसका स्थायी भाव "क्रोध" है।

प्रामाणिक काव्य उदाहरण (Verse Example):

"श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्षोभ से जलने लगे। सब शील अपना भूल कर करतल युगल मलने लगे॥"

अभिमन्यु वध के पश्चात जब श्रीकृष्ण अर्जुन को कौरवों के अधर्म और जयद्रथ के छल का स्मरण कराते हैं, तब अर्जुन का धैर्य टूट जाता है और वे भीषण क्रोध से धधक उठते हैं। अपने दोनों हाथों को मलना और आँखें लाल होना क्रोध के प्रबल अनुभाव हैं जो रौद्र रस की स्पष्ट अभिव्यक्ति करते हैं।

आलंबन:आश्रय: क्रुद्ध व्यक्ति (जैसे अर्जुन, परशुराम); विषय: अन्यायी शत्रु, दुष्ट, अपमानकर्ता (जैसे जयद्रथ, लक्ष्मण)
संचारी भाव:अमर्ष (असहनशीलता), उग्रता, गर्व, चपलता, स्मृति, आवेग
💡 पहचान:जहाँ आँखें लाल होने, दाँत किटकिटाने, शस्त्र उठाने, भस्म कर देने की प्रतिज्ञा अथवा बदला लेने के धधकते क्रोध का वर्णन हो, वहाँ रौद्र रस होता है।
शास्त्रीय नवरसClass 9-10
#veer-ras

वीर रस

स्थायी भाव: उत्साह (पराक्रम / शौर्य)

Veer Ras (Heroic / Valorous Sentiment) • Utsaha (Energy / Courage / Heroic Zeal)

युद्धभूमि में शत्रु का सामना करने, दीन-दुखियों की रक्षा करने, सर्वस्व दान देने अथवा धर्म की मर्यादा की रक्षा करने जैसे कठिन और उदात्त कार्यों के लिए जब हृदय में अदम्य साहस, उमंग और शौर्य का भाव उमड़ता है, तब "वीर रस" की निष्पत्ति होती है। इसका स्थायी भाव "उत्साह" है। साहित्य में इसके चार भेद माने गए हैं: युद्धवीर, दानवीर, दयावीर और धर्मवीर।

प्रामाणिक काव्य उदाहरण (Verse Example):

"बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥"

कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित यह अमर पंक्ति रानी लक्ष्मीबाई के अद्वितीय पराक्रम, निर्भीकता और मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजों से डटकर लोहा लेने के असीम शौर्य का साक्षात प्रतीक है। यह पंक्ति पढ़ते ही पाठक के मन में देशभक्ति और उत्साह का संचार हो जाता है, जो वीर रस का प्राण है।

आलंबन:आश्रय: वीर योद्धा, त्यागी पुरुष, देशप्रेमी; विषय: शत्रु सेना, अधर्मी, याचक (दानवीर में), दुःखी जन (दयावीर में)
संचारी भाव:धृति (धैर्य), गर्व, हर्ष, मति, असूया, आवेग, चपलता
💡 पहचान:जहाँ युद्ध, शंखनाद, देश की रक्षा, तलवारें चमकने, रणभेरी बजने अथवा दीन-दुखियों के लिए जान न्योछावर करने का शौर्यपूर्ण वर्णन हो, वहाँ वीर रस होता है।
शास्त्रीय नवरसClass 11-12
#bhayanak-ras

भयानक रस

स्थायी भाव: भय (डर / संत्रास)

Bhayanak Ras (Terrifying / Dreadful / Fearful Sentiment) • Bhaya (Fear / Dread / Terror)

काव्य में किसी हिंसक और भयंकर जीव (जैसे सिंह, अजगर), भीषण प्राकृतिक आपदा, पिशाच, घोर अंधकार, बलवान क्रूर शत्रु अथवा विनाशकारी दृश्य को देखने या उसकी भयंकरता का श्रवण करने से जब चित्त में व्याकुलता और भय का स्थायी भाव पुष्ट होता है, तब "भयानक रस" की निष्पत्ति होती है।

प्रामाणिक काव्य उदाहरण (Verse Example):

"एक ओर अजगरहि लखि, एक ओर मृगराय। बिकल बटोही बीच ही, परयो मूरछा खाय॥"

जंगल के संकरे मार्ग पर एक ओर महाकाय अजगर मुँह खोले खड़ा है और दूसरी ओर हिंसक सिंह (मृगराज) गरज रहा है। दोनों ओर निश्चित मृत्यु देखकर भयभीत राहगीर (बटोही) के पास बचने का कोई मार्ग नहीं रहता और वह घोर भय के मारे बीच में ही मूर्छित होकर गिर पड़ता है। यहाँ भय का साकार रूप भयानक रस उत्पन्न करता है।

आलंबन:आश्रय: भयभीत व्यक्ति (यात्री/सैनिक/पाठक); विषय: भयानक अजगर, सिंह, दानव, श्मशान, भयंकर गर्जना, हिंसक शत्रु
संचारी भाव:शंका, त्रास, मोह, दैन्य, संभ्रम, मरण, चिंता, ग्लानि
💡 पहचान:जहाँ कंपकपी छूटने, पसीना आने, होश उड़ जाने, मूर्छित होने अथवा हिंसक पशु व आपदा से जान के लाले पड़ने का वर्णन हो, वहाँ भयानक रस होता है।
शास्त्रीय नवरसClass 11-12
#beebhats-ras

बीभत्स रस

स्थायी भाव: जुगुप्सा (घृणा / घिन)

Beebhats Ras (Odious / Disgustful / Revolting Sentiment) • Jugupsa (Disgust / Revulsion / Aversion)

काव्य में जब सड़ी-गली वस्तुओं, सड़ांध, दुर्गंधयुक्त पीब, रक्त, चर्बी, अंतड़ियों, गिद्धों और सियारों द्वारा नोचे जा रहे शवों अथवा अत्यंत घृणास्पद और वीभत्स दृश्यों का वर्णन पढ़कर या देखकर मन में उल्टी, ग्लानि अथवा वितृष्णा (घिन) की भावना प्रबल हो उठती है, तब "बीभत्स रस" की निष्पत्ति होती है। इसका स्थायी भाव "जुगुप्सा" (घृणा) है।

प्रामाणिक काव्य उदाहरण (Verse Example):

"सिर पर बैठ्यो काग, आँख दोउ खात निकारत। खींचत जीभहिं स्यार, अतिहि आनंद उर धारत॥"

भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा श्मशान भूमि का अत्यंत वीभत्स दृश्य प्रस्तुत किया गया है जहाँ एक शव के सिर पर कौआ बैठकर उसकी दोनों आँखें नोच-नोच कर खा रहा है, और सियार उसकी जीभ खींचकर उल्लसित हो रहा है। इसके साथ गिद्धों द्वारा जाँघों का मांस नोचने और कुत्तों द्वारा उँगलियाँ चबाने का वर्णन पाठक के मन में तीव्र घृणा और जुगुप्सा जाग्रत करता है।

आलंबन:आश्रय: दृश्य देखने या पढ़ने वाला व्यक्ति; विषय: सड़ती हुई लाशें, बहता रक्त-पीब, विष्ठा, चर्बी, दुर्गंधयुक्त शव
संचारी भाव:ग्लानि, मोह, व्याधि, अपस्मार, विषाद, आवेग, निर्वेद
💡 पहचान:जहाँ माँस, मज्जा, रक्त, पीब, कौवे-गिद्धों द्वारा लाशें नोचने, दुर्गंध आने और नाक-मुँह सिकोड़ने का घिनौना वर्णन हो, वहाँ बीभत्स रस होता है।
शास्त्रीय नवरसClass 9-10
#adbhut-ras

अद्भुत रस

स्थायी भाव: विस्मय (आश्चर्य / अचंभा)

Adbhut Ras (Marvelous / Wondrous / Astonishing Sentiment) • Vismaya (Wonder / Astonishment / Awe)

काव्य में जब किसी अलौकिक, अकल्पनीय, विचित्र अथवा असंभव प्रतीत होने वाली वस्तु, घटना या दृश्य का वर्णन देखकर या सुनकर मन आश्चर्य और विस्मय से चकित रह जाता है, तब "अद्भुत रस" की निष्पत्ति होती है। इसका स्थायी भाव "विस्मय" (आश्चर्य) है।

प्रामाणिक काव्य उदाहरण (Verse Example):

"देखि जसोदा सिसु मुख माहीं, अद्भुत रूप अखंड। रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड॥"

बालक श्रीकृष्ण जब मिट्टी खाने के बहाने माता यशोदा के कहने पर अपना नन्हा सा मुख खोलते हैं, तो माता यशोदा उनके मुख के भीतर समस्त ब्रह्मांड, चर-अचर जीव, ग्रह-नक्षत्र और कोटि-कोटि लोकों का अखंड दर्शन करती हैं। एक नन्हे बालक के मुख में विराट विश्व को देखकर माता यशोदा आश्चर्यचकित और स्तब्ध रह जाती हैं, जो अद्भुत रस की पूर्ण निष्पत्ति है।

आलंबन:आश्रय: विस्मयकारी दृश्य देखने वाला (यशोदा / दर्शक); विषय: अलौकिक दृश्य (श्रीकृष्ण का विश्वरूप, जादुई घटना)
संचारी भाव:हर्ष, मोह, भ्रांति, आवेग, जड़ता, उत्सुकता, वितर्क
💡 पहचान:जहाँ किसी असंभव बात, चमत्कार, मुख में पूरा ब्रह्मांड दिखने, या हतप्रभ व दंग रह जाने वाली विचित्रता का वर्णन हो, वहाँ अद्भुत रस होता है।
शास्त्रीय नवरसClass 9-10
#shant-ras

शांत रस

स्थायी भाव: निर्वेद (शम / वैराग्य / वीतरागता)

Shant Ras (Peaceful / Tranquil / Serene Sentiment) • Nirveda (Tranquility / Detachment / Serenity)

संसार की नश्वरता (क्षणभंगुरता), सांसारिक भोग-विलासों की व्यर्थता, तत्त्व-ज्ञान (ईश्वर-बोध) तथा आत्मा-परमात्मा के गूढ़ संबंध का साक्षात्कार होने पर जब मन के समस्त विकार, राग-द्वेष, काम-क्रोध शांत होकर परम शांति एवं वैराग्य की अवस्था प्राप्त करते हैं, तब "शांत रस" की निष्पत्ति होती है। इसका स्थायी भाव "निर्वेद" (शम या वीतरागता) है।

प्रामाणिक काव्य उदाहरण (Verse Example):

"मन रे परसि हरि के चरन। सुभग सीतल कमल कोमल, त्रिबिध-ज्वाला-हरन॥"

भक्त शिरोमणि मीराबाई अपने मन को प्रभु के पावन चरणों का स्पर्श करने का उपदेश देती हैं, जो कमल के समान कोमल, शीतल और सांसारिक तीनों प्रकार के तापों (दैहिक, दैविक, भौतिक) को हरने वाले हैं। यहाँ सांसारिक आपाधापी को छोड़कर भगवान के चरणों में समर्पित होकर परम शांति का अनुभव करना शांत रस का द्योतक है।

आलंबन:आश्रय: मुमुक्षु (मोक्ष-अभिलाषी), साधक, कवि; विषय: ईश्वर का स्वरूप, संसार की नश्वरता, पवित्र तीर्थ स्थल, आश्रम
संचारी भाव:हर्ष, स्मृति, मति, धृति, विबोध, निर्वेद, दैन्य
💡 पहचान:जहाँ संसार को झूठा, पानी का बुलबुला, माया का जाल बताया गया हो, तथा प्रभु-भजन, एकांत, वैराग्य और आत्मिक शांति का संदेश हो, वहाँ शांत रस होता है।