Shringar Ras (Erotic / Romantic Sentiment) — लक्षण, स्थायी भाव व उदाहरणशृंगार रस
रति (प्रेम) (Rati (Love / Romantic Attraction))
काव्य या नाटक में नायक और नायिका के पारस्परिक प्रेम, आकर्षण, मिलन अथवा विरह की स्थिति का जब रस रूप में परिपाक होता है, तब "शृंगार रस" की निष्पत्ति होती है। इसे सभी रसों में सर्वाधिक व्यापक, सरस और रमणीय होने के कारण "रसराज" (रसों का राजा) या "रसबति" कहा जाता है। इसके दो मुख्य भेद होते हैं: संयोग शृंगार (मिलन) और वियोग/विप्रलम्भ शृंगार (विरह)।
आश्रय: गोपियाँ / नायक-नायिका; विषय: श्रीकृष्ण / प्रियतम
एकांत कुंज, वसंत ऋतु, कोयल की कूक, शीतल-मंद-सुगंध पवन, चाँदनी रात, बाँसुरी की तान
मुस्कराना, भौंहों से संकेत करना, कटाक्ष, आलिंगन, स्पर्श, अश्रु (विरह में)
हर्ष, लज्जा (व्रीड़ा), उत्सुकता, चपलता, अभिलाषा, स्मृति, उन्माद
काव्य में जहाँ भी नायक-नायिका का प्रेम, सौंदर्य, मिलन, नैन-मटक्का, अथवा विरह-वेदना व आँसुओं का वर्णन हो, वहाँ शृंगार रस होता है। (संयोग = मिलना; वियोग = बिछड़ना)।
Formula in English: Look for themes of romantic love, physical beauty, flirtatious glances, union, or painful separation between lovers.
"बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय। सौंह करैं, भौंहनु हँसै, दैन कहैं, नटि जाय॥"
काव्यशास्त्रीय विश्लेषण एवं भावार्थ (Literary Analysis):
इस दोहे में गोपियों द्वारा श्रीकृष्ण से बातचीत करने के सुख (बतरस) के लोभ में उनकी बाँसुरी छिपा लेने का अत्यंत मनोहर चित्रण है। जब कृष्ण बाँसुरी माँगते हैं तो वे सौगंध खाती हैं पर भौंहों से मुस्कराती हैं और अंत में देने से इनकार कर देती हैं। यहाँ नायक-नायिका के बीच मधुर क्रीड़ा एवं प्रेमपूर्ण हास-परिहास से "संयोग शृंगार" की निष्पत्ति होती है।
English Analysis: In this couplet by Bihari, the Gopis hide Krishna’s flute out of greed to engage him in conversation. When he asks for it, they swear innocence yet smile mischievously with their eyebrows, refusing to return it. This playful banter evokes exquisite Samyoga Shringara (romantic union).
शृंगार रस के प्रमुख भेद (2 Types)
1. संयोग शृंगार (Samyoga Shringara) (Romantic Union)
नायक और नायिका के पारस्परिक मिलन, वार्तालाप, दर्शन, स्पर्श और आलिंगन आदि सुखद प्रसंगों का वर्णन।
स्पष्टीकरण: श्रीराम के अलौकिक रूप को सीता जी कंगन के नग में देखकर मुग्ध हो जाती हैं और एकटक देखती रह जाती हैं।
2. वियोग / विप्रलम्भ शृंगार (Viyoga / Vipralambha Shringara) (Love in Separation)
जहाँ एक-दूसरे के प्रति प्रगाढ़ प्रेम होने पर भी नायक-नायिका का प्रत्यक्ष मिलन न हो सके और विरह की तीव्र वेदना हो।
स्पष्टीकरण: सीता हरण के पश्चात भगवान राम वन के पशु-पक्षियों और भौरों से व्याकुल होकर सीता का पता पूछते हैं।
अन्य प्रामाणिक काव्य उदाहरण
"निसिदिन बरसत नैन हमारे। सदा रहति पावस ऋतु हम पै, जब ते स्याम सिधारे॥"
श्रीकृष्ण के मथुरा चले जाने पर गोपियों की विरह-व्यथा का मार्मिक चित्रण है। उनके नेत्रों से अश्रुओं की निरंतर वर्षा होती रहती है मानो उनके लिए सदैव वर्षा ऋतु छाई हो। यह वियोग शृंगार का चरम उदाहरण है।
Surdas depicts the acute anguish of the Gopis after Krishna moves to Mathura. Their eyes weep ceaselessly like a perpetual monsoon, embodying peak Viyoga Shringara.
अन्य प्रमुख काव्य रस (Related Sentiments)
सभी रस देखें →हास्य रस
स्थायी भाव: हास (हँसी / आमोद)Hasya Ras (Comic / Humorous Sentiment) • Haas (Laughter / Mirth)
काव्य अथवा नाटक में किसी व्यक्ति के विकृत रूप, विचित्र वेशभूषा, बेडौल आकार, हास्यास्पद वाणी अथवा अनोखी चेष्टाओं को देखकर या सुनकर जब मन में हँसी (हास) का स्थायी भाव जाग्रत होकर पुष्ट होता है, तब "हास्य रस" की निष्पत्ति होती है।
"सीस पर गंगा हसैं, भुजनि भुजंगा हसैं, हास ही को दंगा भयो नंगा के बिवाह में।"
महाकवि पद्माकर द्वारा रचित इस छंद में भगवान शिव के विचित्र विवाह दृश्य का अत्यंत मनोरंजक चित्रण है। उनके सिर पर गंगा जी और भुजाओं में लिपटे सर्प हँस रहे हैं। दिगंबर रूपधारी शिवजी की बारात की अद्भुत वेशभूषा को देखकर संपूर्ण समाज में केवल हँसी का दंगल मच जाता है, जिससे हास्य रस प्रस्फुटित होता है।
करुण रस
स्थायी भाव: शोक (दुःख / विषाद)Karun Ras (Pathetic / Compassionate / Sorrowful Sentiment) • Shok (Sorrow / Grief / Deep Loss)
काव्य में जहाँ किसी प्रियजन की मृत्यु, स्थायी वियोग, बंधु-विनाश, अत्यधिक धन-हानि अथवा किसी दारुण अनिष्ट के कारण हृदय में गहन विषाद और रुदन का भाव उत्पन्न होता है, वहाँ "करुण रस" की निष्पत्ति होती है। इसका स्थायी भाव "शोक" है। (ध्यान दें: वियोग शृंगार में पुनः मिलन की आशा शेष रहती है, परंतु करुण रस में प्रिय के सदा के लिए खो जाने का निरुपाय दुःख होता है)।
"दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज, जो नहीं कही!"
महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" द्वारा अपनी दिवंगत पुत्री सरोज की स्मृति में रचित इस अमर पंक्ति में जीवन भर के असहनीय अभावों, संघर्षों और पुत्री की अकाल मृत्यु का अपार शोक एक ही साँस में फूट पड़ा है। यहाँ कवि के हृदय का मौन क्रंदन और निरुपाय व्यथा करुण रस की पराकाष्ठा है।
रौद्र रस
स्थायी भाव: क्रोध (कोप / अमर्ष)Raudra Ras (Furious / Wrathful Sentiment) • Krodha (Wrath / Fury / Intense Anger)
काव्य में जब किसी विरोधी, शत्रु, दुष्ट, समाज-कंटक अथवा गुरुजनों का अपमान करने वाले व्यक्ति के अनुचित व्यवहार, कटु वचनों या देश-धर्म के द्रोह को देखकर हृदय में प्रतिशोध और प्रचंड क्रोध का भाव जाग्रत होता है, तब "रौद्र रस" की निष्पत्ति होती है। इसका स्थायी भाव "क्रोध" है।
"श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्षोभ से जलने लगे। सब शील अपना भूल कर करतल युगल मलने लगे॥"
अभिमन्यु वध के पश्चात जब श्रीकृष्ण अर्जुन को कौरवों के अधर्म और जयद्रथ के छल का स्मरण कराते हैं, तब अर्जुन का धैर्य टूट जाता है और वे भीषण क्रोध से धधक उठते हैं। अपने दोनों हाथों को मलना और आँखें लाल होना क्रोध के प्रबल अनुभाव हैं जो रौद्र रस की स्पष्ट अभिव्यक्ति करते हैं।