Karun Ras (Pathetic / Compassionate / Sorrowful Sentiment) — लक्षण, स्थायी भाव व उदाहरणकरुण रस
शोक (दुःख / विषाद) (Shok (Sorrow / Grief / Deep Loss))
काव्य में जहाँ किसी प्रियजन की मृत्यु, स्थायी वियोग, बंधु-विनाश, अत्यधिक धन-हानि अथवा किसी दारुण अनिष्ट के कारण हृदय में गहन विषाद और रुदन का भाव उत्पन्न होता है, वहाँ "करुण रस" की निष्पत्ति होती है। इसका स्थायी भाव "शोक" है। (ध्यान दें: वियोग शृंगार में पुनः मिलन की आशा शेष रहती है, परंतु करुण रस में प्रिय के सदा के लिए खो जाने का निरुपाय दुःख होता है)।
आश्रय: दुःखी व्यक्ति / पाठक; विषय: मृत प्रियजन, दीन-हीन पीड़ित व्यक्ति, विनष्ट कुल
दिवंगत व्यक्ति के वस्त्र, खिलौने, स्मृतियाँ, चिता का धुआँ, श्मशान भूमि, दीनतापूर्ण विलाप
फूट-फूट कर रोना (विलाप), छाती पीटना, भूमि पर गिरना, निश्वास छोड़ना, अचेत (मूर्छित) होना
निर्वेद, ग्लानि, दैन्य, विषाद, मोह, स्मृति, जड़ता, उन्माद
जहाँ मृत्यु, अनाथ होने, प्रिय के विनाश, फूट-फूटकर रोने, छाती पीटने अथवा कभी न समाप्त होने वाले गहरे दुःख का वर्णन हो, वहाँ करुण रस होता है।
Formula in English: Look for themes of death, irreversible bereavement, weeping, funerals, and tragic ruin with no hope of recovery.
"दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज, जो नहीं कही!"
काव्यशास्त्रीय विश्लेषण एवं भावार्थ (Literary Analysis):
महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" द्वारा अपनी दिवंगत पुत्री सरोज की स्मृति में रचित इस अमर पंक्ति में जीवन भर के असहनीय अभावों, संघर्षों और पुत्री की अकाल मृत्यु का अपार शोक एक ही साँस में फूट पड़ा है। यहाँ कवि के हृदय का मौन क्रंदन और निरुपाय व्यथा करुण रस की पराकाष्ठा है।
English Analysis: In this haunting line from Saroj-Smriti, Nirala reflects on the relentless tragedies of his life and the premature death of his daughter Saroj. His raw, unvarnished grief evokes profound Karun Ras.
करुण रस के प्रमुख भेद (1 Types)
1. शोक विलाप (Grief & Lamentation) (Mournful Wailing)
मृत्यु अथवा अनिष्ट पर खुलकर विलाप और क्रंदन करना।
स्पष्टीकरण: महाराजा दशरथ के देहावसान पर रानियों द्वारा उनके शील और पराक्रम का स्मरण कर विलाप करना।
अन्य प्रामाणिक काव्य उदाहरण
"मनि खोए भुजंग सी जननी, फन सा पटक रही थी सीस। अंधी आज बनाकर मुझको, किया न्याय तुमने जगदीश॥"
श्रवण कुमार की मृत्यु के पश्चात उनकी अंधी माता के हृदय-विदारक विलाप का चित्रण है। जिस प्रकार मणि छिन जाने पर नागिन फन पटकती है, उसी प्रकार माता सिर पटक-पटक कर ईश्वर से न्याय की गुहार लगा रही है।
Portraying Shravan Kumar’s mother grieving over her slain son like a serpent thrashing its hood having lost its gem, crying out to God in helpless bereavement.
अन्य प्रमुख काव्य रस (Related Sentiments)
सभी रस देखें →शृंगार रस
स्थायी भाव: रति (प्रेम)Shringar Ras (Erotic / Romantic Sentiment) • Rati (Love / Romantic Attraction)
काव्य या नाटक में नायक और नायिका के पारस्परिक प्रेम, आकर्षण, मिलन अथवा विरह की स्थिति का जब रस रूप में परिपाक होता है, तब "शृंगार रस" की निष्पत्ति होती है। इसे सभी रसों में सर्वाधिक व्यापक, सरस और रमणीय होने के कारण "रसराज" (रसों का राजा) या "रसबति" कहा जाता है। इसके दो मुख्य भेद होते हैं: संयोग शृंगार (मिलन) और वियोग/विप्रलम्भ शृंगार (विरह)।
"बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय। सौंह करैं, भौंहनु हँसै, दैन कहैं, नटि जाय॥"
इस दोहे में गोपियों द्वारा श्रीकृष्ण से बातचीत करने के सुख (बतरस) के लोभ में उनकी बाँसुरी छिपा लेने का अत्यंत मनोहर चित्रण है। जब कृष्ण बाँसुरी माँगते हैं तो वे सौगंध खाती हैं पर भौंहों से मुस्कराती हैं और अंत में देने से इनकार कर देती हैं। यहाँ नायक-नायिका के बीच मधुर क्रीड़ा एवं प्रेमपूर्ण हास-परिहास से "संयोग शृंगार" की निष्पत्ति होती है।
हास्य रस
स्थायी भाव: हास (हँसी / आमोद)Hasya Ras (Comic / Humorous Sentiment) • Haas (Laughter / Mirth)
काव्य अथवा नाटक में किसी व्यक्ति के विकृत रूप, विचित्र वेशभूषा, बेडौल आकार, हास्यास्पद वाणी अथवा अनोखी चेष्टाओं को देखकर या सुनकर जब मन में हँसी (हास) का स्थायी भाव जाग्रत होकर पुष्ट होता है, तब "हास्य रस" की निष्पत्ति होती है।
"सीस पर गंगा हसैं, भुजनि भुजंगा हसैं, हास ही को दंगा भयो नंगा के बिवाह में।"
महाकवि पद्माकर द्वारा रचित इस छंद में भगवान शिव के विचित्र विवाह दृश्य का अत्यंत मनोरंजक चित्रण है। उनके सिर पर गंगा जी और भुजाओं में लिपटे सर्प हँस रहे हैं। दिगंबर रूपधारी शिवजी की बारात की अद्भुत वेशभूषा को देखकर संपूर्ण समाज में केवल हँसी का दंगल मच जाता है, जिससे हास्य रस प्रस्फुटित होता है।
रौद्र रस
स्थायी भाव: क्रोध (कोप / अमर्ष)Raudra Ras (Furious / Wrathful Sentiment) • Krodha (Wrath / Fury / Intense Anger)
काव्य में जब किसी विरोधी, शत्रु, दुष्ट, समाज-कंटक अथवा गुरुजनों का अपमान करने वाले व्यक्ति के अनुचित व्यवहार, कटु वचनों या देश-धर्म के द्रोह को देखकर हृदय में प्रतिशोध और प्रचंड क्रोध का भाव जाग्रत होता है, तब "रौद्र रस" की निष्पत्ति होती है। इसका स्थायी भाव "क्रोध" है।
"श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्षोभ से जलने लगे। सब शील अपना भूल कर करतल युगल मलने लगे॥"
अभिमन्यु वध के पश्चात जब श्रीकृष्ण अर्जुन को कौरवों के अधर्म और जयद्रथ के छल का स्मरण कराते हैं, तब अर्जुन का धैर्य टूट जाता है और वे भीषण क्रोध से धधक उठते हैं। अपने दोनों हाथों को मलना और आँखें लाल होना क्रोध के प्रबल अनुभाव हैं जो रौद्र रस की स्पष्ट अभिव्यक्ति करते हैं।