Bhayanak Ras (Terrifying / Dreadful / Fearful Sentiment) — लक्षण, स्थायी भाव व उदाहरणभयानक रस
भय (डर / संत्रास) (Bhaya (Fear / Dread / Terror))
काव्य में किसी हिंसक और भयंकर जीव (जैसे सिंह, अजगर), भीषण प्राकृतिक आपदा, पिशाच, घोर अंधकार, बलवान क्रूर शत्रु अथवा विनाशकारी दृश्य को देखने या उसकी भयंकरता का श्रवण करने से जब चित्त में व्याकुलता और भय का स्थायी भाव पुष्ट होता है, तब "भयानक रस" की निष्पत्ति होती है।
आश्रय: भयभीत व्यक्ति (यात्री/सैनिक/पाठक); विषय: भयानक अजगर, सिंह, दानव, श्मशान, भयंकर गर्जना, हिंसक शत्रु
घोर अंधकार, जंगल का सन्नाटा, भयानक आवाजें, बिजली की कड़क, रक्तपात, अकेलेपन का अहसास
काँपना (कंप), पसीना छूटना (स्वेद), रोंगटे खड़े होना (रोमांच), चीखना, मुख सूखना, मूर्छा (बेहोशी)
शंका, त्रास, मोह, दैन्य, संभ्रम, मरण, चिंता, ग्लानि
जहाँ कंपकपी छूटने, पसीना आने, होश उड़ जाने, मूर्छित होने अथवा हिंसक पशु व आपदा से जान के लाले पड़ने का वर्णन हो, वहाँ भयानक रस होता है।
Formula in English: Look for shivering, fainting from terror, cold sweat, dark haunted forests, beasts, and impending doom.
"एक ओर अजगरहि लखि, एक ओर मृगराय। बिकल बटोही बीच ही, परयो मूरछा खाय॥"
काव्यशास्त्रीय विश्लेषण एवं भावार्थ (Literary Analysis):
जंगल के संकरे मार्ग पर एक ओर महाकाय अजगर मुँह खोले खड़ा है और दूसरी ओर हिंसक सिंह (मृगराज) गरज रहा है। दोनों ओर निश्चित मृत्यु देखकर भयभीत राहगीर (बटोही) के पास बचने का कोई मार्ग नहीं रहता और वह घोर भय के मारे बीच में ही मूर्छित होकर गिर पड़ता है। यहाँ भय का साकार रूप भयानक रस उत्पन्न करता है।
English Analysis: A lone traveler finds a python on one side and a roaring lion on the other. Facing inescapable doom from both flanks, terror paralyzes him and he collapses in a dead faint, vividly depicting Bhayanak Ras.
अन्य प्रामाणिक काव्य उदाहरण
"उधर गरजती सिंधु लहरियाँ, कुटिल काल के जालों सी। चली आ रहीं फेन उगलतीं, फन फैलाए व्यालों सी॥"
प्रलयंकारी जलप्लावन के समय समुद्र की विकराल लहरें काल के फंदे के समान गरज रही हैं और फन फैलाए विषैले साँपों की भाँति झाग उगलती हुई विनाश की ओर बढ़ रही हैं। यह दृश्य मन में महाविनाश का गहरा भय जगाता है।
Prasad paints the cosmic deluge where ocean surges roar like venomous serpents spitting doom, freezing the onlooker’s heart in primal terror.
अन्य प्रमुख काव्य रस (Related Sentiments)
सभी रस देखें →शृंगार रस
स्थायी भाव: रति (प्रेम)Shringar Ras (Erotic / Romantic Sentiment) • Rati (Love / Romantic Attraction)
काव्य या नाटक में नायक और नायिका के पारस्परिक प्रेम, आकर्षण, मिलन अथवा विरह की स्थिति का जब रस रूप में परिपाक होता है, तब "शृंगार रस" की निष्पत्ति होती है। इसे सभी रसों में सर्वाधिक व्यापक, सरस और रमणीय होने के कारण "रसराज" (रसों का राजा) या "रसबति" कहा जाता है। इसके दो मुख्य भेद होते हैं: संयोग शृंगार (मिलन) और वियोग/विप्रलम्भ शृंगार (विरह)।
"बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय। सौंह करैं, भौंहनु हँसै, दैन कहैं, नटि जाय॥"
इस दोहे में गोपियों द्वारा श्रीकृष्ण से बातचीत करने के सुख (बतरस) के लोभ में उनकी बाँसुरी छिपा लेने का अत्यंत मनोहर चित्रण है। जब कृष्ण बाँसुरी माँगते हैं तो वे सौगंध खाती हैं पर भौंहों से मुस्कराती हैं और अंत में देने से इनकार कर देती हैं। यहाँ नायक-नायिका के बीच मधुर क्रीड़ा एवं प्रेमपूर्ण हास-परिहास से "संयोग शृंगार" की निष्पत्ति होती है।
हास्य रस
स्थायी भाव: हास (हँसी / आमोद)Hasya Ras (Comic / Humorous Sentiment) • Haas (Laughter / Mirth)
काव्य अथवा नाटक में किसी व्यक्ति के विकृत रूप, विचित्र वेशभूषा, बेडौल आकार, हास्यास्पद वाणी अथवा अनोखी चेष्टाओं को देखकर या सुनकर जब मन में हँसी (हास) का स्थायी भाव जाग्रत होकर पुष्ट होता है, तब "हास्य रस" की निष्पत्ति होती है।
"सीस पर गंगा हसैं, भुजनि भुजंगा हसैं, हास ही को दंगा भयो नंगा के बिवाह में।"
महाकवि पद्माकर द्वारा रचित इस छंद में भगवान शिव के विचित्र विवाह दृश्य का अत्यंत मनोरंजक चित्रण है। उनके सिर पर गंगा जी और भुजाओं में लिपटे सर्प हँस रहे हैं। दिगंबर रूपधारी शिवजी की बारात की अद्भुत वेशभूषा को देखकर संपूर्ण समाज में केवल हँसी का दंगल मच जाता है, जिससे हास्य रस प्रस्फुटित होता है।
करुण रस
स्थायी भाव: शोक (दुःख / विषाद)Karun Ras (Pathetic / Compassionate / Sorrowful Sentiment) • Shok (Sorrow / Grief / Deep Loss)
काव्य में जहाँ किसी प्रियजन की मृत्यु, स्थायी वियोग, बंधु-विनाश, अत्यधिक धन-हानि अथवा किसी दारुण अनिष्ट के कारण हृदय में गहन विषाद और रुदन का भाव उत्पन्न होता है, वहाँ "करुण रस" की निष्पत्ति होती है। इसका स्थायी भाव "शोक" है। (ध्यान दें: वियोग शृंगार में पुनः मिलन की आशा शेष रहती है, परंतु करुण रस में प्रिय के सदा के लिए खो जाने का निरुपाय दुःख होता है)।
"दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज, जो नहीं कही!"
महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" द्वारा अपनी दिवंगत पुत्री सरोज की स्मृति में रचित इस अमर पंक्ति में जीवन भर के असहनीय अभावों, संघर्षों और पुत्री की अकाल मृत्यु का अपार शोक एक ही साँस में फूट पड़ा है। यहाँ कवि के हृदय का मौन क्रंदन और निरुपाय व्यथा करुण रस की पराकाष्ठा है।