Shant Ras (Peaceful / Tranquil / Serene Sentiment) — लक्षण, स्थायी भाव व उदाहरणशांत रस
निर्वेद (शम / वैराग्य / वीतरागता) (Nirveda (Tranquility / Detachment / Serenity))
संसार की नश्वरता (क्षणभंगुरता), सांसारिक भोग-विलासों की व्यर्थता, तत्त्व-ज्ञान (ईश्वर-बोध) तथा आत्मा-परमात्मा के गूढ़ संबंध का साक्षात्कार होने पर जब मन के समस्त विकार, राग-द्वेष, काम-क्रोध शांत होकर परम शांति एवं वैराग्य की अवस्था प्राप्त करते हैं, तब "शांत रस" की निष्पत्ति होती है। इसका स्थायी भाव "निर्वेद" (शम या वीतरागता) है।
आश्रय: मुमुक्षु (मोक्ष-अभिलाषी), साधक, कवि; विषय: ईश्वर का स्वरूप, संसार की नश्वरता, पवित्र तीर्थ स्थल, आश्रम
सत्संग, संतों के उपदेश, उपनिषद/गीता का श्रवण, एकांत वन, कल-कल बहती नदी का तट, श्मशान का वैराग्य
रोमांच, अश्रु (आनंद के), शांत मुखमुद्रा, नेत्र बंद करना, हाथ जोड़ना, विनम्र भाव
हर्ष, स्मृति, मति, धृति, विबोध, निर्वेद, दैन्य
जहाँ संसार को झूठा, पानी का बुलबुला, माया का जाल बताया गया हो, तथा प्रभु-भजन, एकांत, वैराग्य और आत्मिक शांति का संदेश हो, वहाँ शांत रस होता है।
Formula in English: Look for themes of detachment from worldly illusions, inner stillness, impermanence of life, and contemplative serenity.
"मन रे परसि हरि के चरन। सुभग सीतल कमल कोमल, त्रिबिध-ज्वाला-हरन॥"
काव्यशास्त्रीय विश्लेषण एवं भावार्थ (Literary Analysis):
भक्त शिरोमणि मीराबाई अपने मन को प्रभु के पावन चरणों का स्पर्श करने का उपदेश देती हैं, जो कमल के समान कोमल, शीतल और सांसारिक तीनों प्रकार के तापों (दैहिक, दैविक, भौतिक) को हरने वाले हैं। यहाँ सांसारिक आपाधापी को छोड़कर भगवान के चरणों में समर्पित होकर परम शांति का अनुभव करना शांत रस का द्योतक है।
English Analysis: Sant Mirabai urges the restless mind to take refuge at the feet of the Divine, which are cooling, fragrant like tender lotuses, and capable of extinguishing the threefold worldly agonies, instilling deep spiritual calm.
अन्य प्रामाणिक काव्य उदाहरण
"जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं। सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माहिं॥"
कबीरदास जी कहते हैं कि जब तक मेरे भीतर "मैं" (अहंकार) था, तब तक ईश्वर की प्राप्ति नहीं हुई थी। अब ज्ञान का दीपक जलने से सारा अंधकार मिट गया और केवल ईश्वर का साक्षात्कार रह गया। यह आत्म-बोध शांत रस की चरम अवस्था है।
Kabir declares that as long as egoism ("I") reigned, God was absent; now that the inner lamp of realization shines, the ego has vanished and pristine divine tranquility remains.
"कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो। श्रीरघुनाथ कृपालु कृपा तें संत सुभाव गहौंगो॥"
तुलसीदास जी संसार के प्रपंचों से विरक्त होकर भगवान रघुनाथ की कृपा से संतों जैसा समदर्शी, शांत और निर्लिप्त जीवन व्यतीत करने की अभिलाषा व्यक्त करते हैं।
Tulsidas yearns for a life of quiet detachment and saintly contentment, free from pride and greed, embodying Shant Ras.
अन्य प्रमुख काव्य रस (Related Sentiments)
सभी रस देखें →शृंगार रस
स्थायी भाव: रति (प्रेम)Shringar Ras (Erotic / Romantic Sentiment) • Rati (Love / Romantic Attraction)
काव्य या नाटक में नायक और नायिका के पारस्परिक प्रेम, आकर्षण, मिलन अथवा विरह की स्थिति का जब रस रूप में परिपाक होता है, तब "शृंगार रस" की निष्पत्ति होती है। इसे सभी रसों में सर्वाधिक व्यापक, सरस और रमणीय होने के कारण "रसराज" (रसों का राजा) या "रसबति" कहा जाता है। इसके दो मुख्य भेद होते हैं: संयोग शृंगार (मिलन) और वियोग/विप्रलम्भ शृंगार (विरह)।
"बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय। सौंह करैं, भौंहनु हँसै, दैन कहैं, नटि जाय॥"
इस दोहे में गोपियों द्वारा श्रीकृष्ण से बातचीत करने के सुख (बतरस) के लोभ में उनकी बाँसुरी छिपा लेने का अत्यंत मनोहर चित्रण है। जब कृष्ण बाँसुरी माँगते हैं तो वे सौगंध खाती हैं पर भौंहों से मुस्कराती हैं और अंत में देने से इनकार कर देती हैं। यहाँ नायक-नायिका के बीच मधुर क्रीड़ा एवं प्रेमपूर्ण हास-परिहास से "संयोग शृंगार" की निष्पत्ति होती है।
हास्य रस
स्थायी भाव: हास (हँसी / आमोद)Hasya Ras (Comic / Humorous Sentiment) • Haas (Laughter / Mirth)
काव्य अथवा नाटक में किसी व्यक्ति के विकृत रूप, विचित्र वेशभूषा, बेडौल आकार, हास्यास्पद वाणी अथवा अनोखी चेष्टाओं को देखकर या सुनकर जब मन में हँसी (हास) का स्थायी भाव जाग्रत होकर पुष्ट होता है, तब "हास्य रस" की निष्पत्ति होती है।
"सीस पर गंगा हसैं, भुजनि भुजंगा हसैं, हास ही को दंगा भयो नंगा के बिवाह में।"
महाकवि पद्माकर द्वारा रचित इस छंद में भगवान शिव के विचित्र विवाह दृश्य का अत्यंत मनोरंजक चित्रण है। उनके सिर पर गंगा जी और भुजाओं में लिपटे सर्प हँस रहे हैं। दिगंबर रूपधारी शिवजी की बारात की अद्भुत वेशभूषा को देखकर संपूर्ण समाज में केवल हँसी का दंगल मच जाता है, जिससे हास्य रस प्रस्फुटित होता है।
करुण रस
स्थायी भाव: शोक (दुःख / विषाद)Karun Ras (Pathetic / Compassionate / Sorrowful Sentiment) • Shok (Sorrow / Grief / Deep Loss)
काव्य में जहाँ किसी प्रियजन की मृत्यु, स्थायी वियोग, बंधु-विनाश, अत्यधिक धन-हानि अथवा किसी दारुण अनिष्ट के कारण हृदय में गहन विषाद और रुदन का भाव उत्पन्न होता है, वहाँ "करुण रस" की निष्पत्ति होती है। इसका स्थायी भाव "शोक" है। (ध्यान दें: वियोग शृंगार में पुनः मिलन की आशा शेष रहती है, परंतु करुण रस में प्रिय के सदा के लिए खो जाने का निरुपाय दुःख होता है)।
"दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज, जो नहीं कही!"
महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" द्वारा अपनी दिवंगत पुत्री सरोज की स्मृति में रचित इस अमर पंक्ति में जीवन भर के असहनीय अभावों, संघर्षों और पुत्री की अकाल मृत्यु का अपार शोक एक ही साँस में फूट पड़ा है। यहाँ कवि के हृदय का मौन क्रंदन और निरुपाय व्यथा करुण रस की पराकाष्ठा है।