Beebhats Ras (Odious / Disgustful / Revolting Sentiment) — लक्षण, स्थायी भाव व उदाहरणबीभत्स रस
जुगुप्सा (घृणा / घिन) (Jugupsa (Disgust / Revulsion / Aversion))
काव्य में जब सड़ी-गली वस्तुओं, सड़ांध, दुर्गंधयुक्त पीब, रक्त, चर्बी, अंतड़ियों, गिद्धों और सियारों द्वारा नोचे जा रहे शवों अथवा अत्यंत घृणास्पद और वीभत्स दृश्यों का वर्णन पढ़कर या देखकर मन में उल्टी, ग्लानि अथवा वितृष्णा (घिन) की भावना प्रबल हो उठती है, तब "बीभत्स रस" की निष्पत्ति होती है। इसका स्थायी भाव "जुगुप्सा" (घृणा) है।
आश्रय: दृश्य देखने या पढ़ने वाला व्यक्ति; विषय: सड़ती हुई लाशें, बहता रक्त-पीब, विष्ठा, चर्बी, दुर्गंधयुक्त शव
गिद्धों व सियारों द्वारा माँस नोचना, दुर्गंध का फैलना, कीड़े कुलबुलाना, हड्डियों की खड़खड़ाहट
नाक-मुँह सिकोड़ना, थूकना, आँखें बंद कर लेना, उल्टी होना (वमन), मुँह फेर लेना
ग्लानि, मोह, व्याधि, अपस्मार, विषाद, आवेग, निर्वेद
जहाँ माँस, मज्जा, रक्त, पीब, कौवे-गिद्धों द्वारा लाशें नोचने, दुर्गंध आने और नाक-मुँह सिकोड़ने का घिनौना वर्णन हो, वहाँ बीभत्स रस होता है।
Formula in English: Look for repulsive descriptions of rotting entrails, scavenging beasts tearing cadavers, festering wounds, and nausea.
"सिर पर बैठ्यो काग, आँख दोउ खात निकारत। खींचत जीभहिं स्यार, अतिहि आनंद उर धारत॥"
काव्यशास्त्रीय विश्लेषण एवं भावार्थ (Literary Analysis):
भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा श्मशान भूमि का अत्यंत वीभत्स दृश्य प्रस्तुत किया गया है जहाँ एक शव के सिर पर कौआ बैठकर उसकी दोनों आँखें नोच-नोच कर खा रहा है, और सियार उसकी जीभ खींचकर उल्लसित हो रहा है। इसके साथ गिद्धों द्वारा जाँघों का मांस नोचने और कुत्तों द्वारा उँगलियाँ चबाने का वर्णन पाठक के मन में तीव्र घृणा और जुगुप्सा जाग्रत करता है।
English Analysis: Bharatendu Harishchandra depicts a gruesome cremation ground where a crow pecks out eyeballs from a corpse, jackals rip out the tongue, and vultures gnaw flesh, eliciting visceral revulsion (Beebhatsa).
अन्य प्रामाणिक काव्य उदाहरण
"गीध जाँघि को खोदि-खोदि कै मांस उपारत। स्वान आंगुरिन काटि-काटि कै खात विदारत॥"
श्मशान भूमि में श्वान (कुत्ते) शव की उँगलियों को काट-काटकर चबा रहे हैं और गिद्ध अपनी चोंचों से जाँघों का माँस फाड़ रहे हैं। यह घिनौना यथार्थ जुगुप्सा की चरम अभिव्यक्ति है।
Further lines from Satya Harishchandra showing dogs crunching severed fingers and vultures ripping flesh from thighs, evoking pure repulsion.
अन्य प्रमुख काव्य रस (Related Sentiments)
सभी रस देखें →शृंगार रस
स्थायी भाव: रति (प्रेम)Shringar Ras (Erotic / Romantic Sentiment) • Rati (Love / Romantic Attraction)
काव्य या नाटक में नायक और नायिका के पारस्परिक प्रेम, आकर्षण, मिलन अथवा विरह की स्थिति का जब रस रूप में परिपाक होता है, तब "शृंगार रस" की निष्पत्ति होती है। इसे सभी रसों में सर्वाधिक व्यापक, सरस और रमणीय होने के कारण "रसराज" (रसों का राजा) या "रसबति" कहा जाता है। इसके दो मुख्य भेद होते हैं: संयोग शृंगार (मिलन) और वियोग/विप्रलम्भ शृंगार (विरह)।
"बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय। सौंह करैं, भौंहनु हँसै, दैन कहैं, नटि जाय॥"
इस दोहे में गोपियों द्वारा श्रीकृष्ण से बातचीत करने के सुख (बतरस) के लोभ में उनकी बाँसुरी छिपा लेने का अत्यंत मनोहर चित्रण है। जब कृष्ण बाँसुरी माँगते हैं तो वे सौगंध खाती हैं पर भौंहों से मुस्कराती हैं और अंत में देने से इनकार कर देती हैं। यहाँ नायक-नायिका के बीच मधुर क्रीड़ा एवं प्रेमपूर्ण हास-परिहास से "संयोग शृंगार" की निष्पत्ति होती है।
हास्य रस
स्थायी भाव: हास (हँसी / आमोद)Hasya Ras (Comic / Humorous Sentiment) • Haas (Laughter / Mirth)
काव्य अथवा नाटक में किसी व्यक्ति के विकृत रूप, विचित्र वेशभूषा, बेडौल आकार, हास्यास्पद वाणी अथवा अनोखी चेष्टाओं को देखकर या सुनकर जब मन में हँसी (हास) का स्थायी भाव जाग्रत होकर पुष्ट होता है, तब "हास्य रस" की निष्पत्ति होती है।
"सीस पर गंगा हसैं, भुजनि भुजंगा हसैं, हास ही को दंगा भयो नंगा के बिवाह में।"
महाकवि पद्माकर द्वारा रचित इस छंद में भगवान शिव के विचित्र विवाह दृश्य का अत्यंत मनोरंजक चित्रण है। उनके सिर पर गंगा जी और भुजाओं में लिपटे सर्प हँस रहे हैं। दिगंबर रूपधारी शिवजी की बारात की अद्भुत वेशभूषा को देखकर संपूर्ण समाज में केवल हँसी का दंगल मच जाता है, जिससे हास्य रस प्रस्फुटित होता है।
करुण रस
स्थायी भाव: शोक (दुःख / विषाद)Karun Ras (Pathetic / Compassionate / Sorrowful Sentiment) • Shok (Sorrow / Grief / Deep Loss)
काव्य में जहाँ किसी प्रियजन की मृत्यु, स्थायी वियोग, बंधु-विनाश, अत्यधिक धन-हानि अथवा किसी दारुण अनिष्ट के कारण हृदय में गहन विषाद और रुदन का भाव उत्पन्न होता है, वहाँ "करुण रस" की निष्पत्ति होती है। इसका स्थायी भाव "शोक" है। (ध्यान दें: वियोग शृंगार में पुनः मिलन की आशा शेष रहती है, परंतु करुण रस में प्रिय के सदा के लिए खो जाने का निरुपाय दुःख होता है)।
"दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज, जो नहीं कही!"
महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" द्वारा अपनी दिवंगत पुत्री सरोज की स्मृति में रचित इस अमर पंक्ति में जीवन भर के असहनीय अभावों, संघर्षों और पुत्री की अकाल मृत्यु का अपार शोक एक ही साँस में फूट पड़ा है। यहाँ कवि के हृदय का मौन क्रंदन और निरुपाय व्यथा करुण रस की पराकाष्ठा है।