Adbhut Ras (Marvelous / Wondrous / Astonishing Sentiment) — लक्षण, स्थायी भाव व उदाहरणअद्भुत रस
विस्मय (आश्चर्य / अचंभा) (Vismaya (Wonder / Astonishment / Awe))
काव्य में जब किसी अलौकिक, अकल्पनीय, विचित्र अथवा असंभव प्रतीत होने वाली वस्तु, घटना या दृश्य का वर्णन देखकर या सुनकर मन आश्चर्य और विस्मय से चकित रह जाता है, तब "अद्भुत रस" की निष्पत्ति होती है। इसका स्थायी भाव "विस्मय" (आश्चर्य) है।
आश्रय: विस्मयकारी दृश्य देखने वाला (यशोदा / दर्शक); विषय: अलौकिक दृश्य (श्रीकृष्ण का विश्वरूप, जादुई घटना)
अलौकिक चमत्कार, विचित्र आकृतियाँ, अकल्पनीय शक्तियाँ, अप्रत्याशित दृश्य, ईश्वरीय आभा
आँखें फटी की फटी रह जाना (विस्फारित नेत्र), मुँह खुला रह जाना, गद्गद स्वर, रोंगटे खड़े होना, काँपना
हर्ष, मोह, भ्रांति, आवेग, जड़ता, उत्सुकता, वितर्क
जहाँ किसी असंभव बात, चमत्कार, मुख में पूरा ब्रह्मांड दिखने, या हतप्रभ व दंग रह जाने वाली विचित्रता का वर्णन हो, वहाँ अद्भुत रस होता है।
Formula in English: Look for mind-bending marvels, cosmic revelations, miracles, gaping mouths, and wide-eyed awe.
"देखि जसोदा सिसु मुख माहीं, अद्भुत रूप अखंड। रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड॥"
काव्यशास्त्रीय विश्लेषण एवं भावार्थ (Literary Analysis):
बालक श्रीकृष्ण जब मिट्टी खाने के बहाने माता यशोदा के कहने पर अपना नन्हा सा मुख खोलते हैं, तो माता यशोदा उनके मुख के भीतर समस्त ब्रह्मांड, चर-अचर जीव, ग्रह-नक्षत्र और कोटि-कोटि लोकों का अखंड दर्शन करती हैं। एक नन्हे बालक के मुख में विराट विश्व को देखकर माता यशोदा आश्चर्यचकित और स्तब्ध रह जाती हैं, जो अद्भुत रस की पूर्ण निष्पत्ति है।
English Analysis: When infant Krishna opens his mouth to prove he has not eaten mud, Yashoda gazes inside to witness the infinite cosmic panorama with countless galaxies and universes revolving inside the child’s palate, freezing her in stunned awe.
अन्य प्रामाणिक काव्य उदाहरण
"अखिल भुवन चर-अचर सब, हरि मुख में लखि मातु। चकित भई गद्गद बचन, बिकसित दृग पुलकातु॥"
सूरदास जी वर्णन करते हैं कि बालकृष्ण के मुख में समस्त चराचर जगत को देखकर माता यशोदा चकित हो गईं, उनके नेत्र फैल गए और वाणी गद्गद हो गई। यह विस्मय भाव का साक्षात उदाहरण है।
Surdas mirrors the divine marvel as Yashoda’s eyes dilate in breathless astonishment seeing all mobile and immobile cosmos encapsulated within her baby’s lips.
अन्य प्रमुख काव्य रस (Related Sentiments)
सभी रस देखें →शृंगार रस
स्थायी भाव: रति (प्रेम)Shringar Ras (Erotic / Romantic Sentiment) • Rati (Love / Romantic Attraction)
काव्य या नाटक में नायक और नायिका के पारस्परिक प्रेम, आकर्षण, मिलन अथवा विरह की स्थिति का जब रस रूप में परिपाक होता है, तब "शृंगार रस" की निष्पत्ति होती है। इसे सभी रसों में सर्वाधिक व्यापक, सरस और रमणीय होने के कारण "रसराज" (रसों का राजा) या "रसबति" कहा जाता है। इसके दो मुख्य भेद होते हैं: संयोग शृंगार (मिलन) और वियोग/विप्रलम्भ शृंगार (विरह)।
"बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय। सौंह करैं, भौंहनु हँसै, दैन कहैं, नटि जाय॥"
इस दोहे में गोपियों द्वारा श्रीकृष्ण से बातचीत करने के सुख (बतरस) के लोभ में उनकी बाँसुरी छिपा लेने का अत्यंत मनोहर चित्रण है। जब कृष्ण बाँसुरी माँगते हैं तो वे सौगंध खाती हैं पर भौंहों से मुस्कराती हैं और अंत में देने से इनकार कर देती हैं। यहाँ नायक-नायिका के बीच मधुर क्रीड़ा एवं प्रेमपूर्ण हास-परिहास से "संयोग शृंगार" की निष्पत्ति होती है।
हास्य रस
स्थायी भाव: हास (हँसी / आमोद)Hasya Ras (Comic / Humorous Sentiment) • Haas (Laughter / Mirth)
काव्य अथवा नाटक में किसी व्यक्ति के विकृत रूप, विचित्र वेशभूषा, बेडौल आकार, हास्यास्पद वाणी अथवा अनोखी चेष्टाओं को देखकर या सुनकर जब मन में हँसी (हास) का स्थायी भाव जाग्रत होकर पुष्ट होता है, तब "हास्य रस" की निष्पत्ति होती है।
"सीस पर गंगा हसैं, भुजनि भुजंगा हसैं, हास ही को दंगा भयो नंगा के बिवाह में।"
महाकवि पद्माकर द्वारा रचित इस छंद में भगवान शिव के विचित्र विवाह दृश्य का अत्यंत मनोरंजक चित्रण है। उनके सिर पर गंगा जी और भुजाओं में लिपटे सर्प हँस रहे हैं। दिगंबर रूपधारी शिवजी की बारात की अद्भुत वेशभूषा को देखकर संपूर्ण समाज में केवल हँसी का दंगल मच जाता है, जिससे हास्य रस प्रस्फुटित होता है।
करुण रस
स्थायी भाव: शोक (दुःख / विषाद)Karun Ras (Pathetic / Compassionate / Sorrowful Sentiment) • Shok (Sorrow / Grief / Deep Loss)
काव्य में जहाँ किसी प्रियजन की मृत्यु, स्थायी वियोग, बंधु-विनाश, अत्यधिक धन-हानि अथवा किसी दारुण अनिष्ट के कारण हृदय में गहन विषाद और रुदन का भाव उत्पन्न होता है, वहाँ "करुण रस" की निष्पत्ति होती है। इसका स्थायी भाव "शोक" है। (ध्यान दें: वियोग शृंगार में पुनः मिलन की आशा शेष रहती है, परंतु करुण रस में प्रिय के सदा के लिए खो जाने का निरुपाय दुःख होता है)।
"दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज, जो नहीं कही!"
महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" द्वारा अपनी दिवंगत पुत्री सरोज की स्मृति में रचित इस अमर पंक्ति में जीवन भर के असहनीय अभावों, संघर्षों और पुत्री की अकाल मृत्यु का अपार शोक एक ही साँस में फूट पड़ा है। यहाँ कवि के हृदय का मौन क्रंदन और निरुपाय व्यथा करुण रस की पराकाष्ठा है।