Visheshokti (Cause Present but No Effect) — लक्षण, परिभाषा व उदाहरणविशेषोक्ति अलंकार
उच्चारण व लिपि: Visheshokti Alankar
काव्य में जहाँ कार्य की सिद्धि के समस्त कारण उपस्थित होने पर भी कार्य का न होना दिखाया जाए, वहाँ "विशेषोक्ति अलंकार" होता है। यह "विभावना" का ठीक उलटा होता है (विभावना = बिना कारण कार्य; विशेषोक्ति = कारण होते हुए भी कार्य नहीं)।
पर्याप्त साधन या कारण मौजूद होने के बावजूद कार्य का अधूरा या न होना दिखाया जाना।
Tip in English: All conditions for fulfillment exist, yet the expected action remains conspicuously unfulfilled.
"पानी बिच मीन पियासी, मोहि सुनि-सुनि आवै हाँसी।"
काव्यशास्त्रीय विश्लेषण (Literary Explanation):
मछली जल के बीच (प्यास बुझाने के समस्त कारण मौजूद) रहती है, फिर भी वह प्यासी है (कार्य नहीं हो रहा)। अतः यहाँ विशेषोक्ति अलंकार है।
Analysis in English: A fish lives submerged in water (sufficient cause present) yet remains thirsty (expected outcome fails to occur).
अन्य प्रसिद्ध काव्य दोहे एवं उदाहरण
"नेह न केहूं अनादर तैं, जल में मीन पियासी। मोहि सुनि सुनि आवै हांसी॥"
अगाध जलराशि के मध्य रहकर भी मछली का प्यासा रहना कारण की उपस्थिति में कार्य न होने का परिचायक है।
Despite residing amidst abundant water, the fish thirsts, illustrating cause present without effect.
"दो-दो मेघ बरसते, मैं प्यासी की प्यासी।"
आँखों से बादलों की तरह आँसू बरस रहे हैं, फिर भी विरहिणी का हृदय प्यासा ही रहता है।
Twin rainclouds shower down, yet the beloved remains unquenched.
समान श्रेणी के अन्य प्रमुख अलंकार (अर्थालंकार)
सभी अर्थालंकार देखें →उपमा अलंकार
Upama (Simile)
जहाँ किसी वस्तु या प्राणी के गुण, रूप, स्वभाव या सौंदर्य की समानता किसी अन्य प्रसिद्ध वस्तु या प्राणी से की जाती है, वहाँ "उपमा अलंकार" होता है। उपमा के चार अनिवार्य अंग होते हैं: 1. उपमेय (जिसकी तुलना हो), 2. उपमान (जिससे तुलना की जाए), 3. साधारण धर्म (समान गुण), और 4. वाचक शब्द (सा, सी, से, सम, सरिस, सदृश, जैसा)।
"पीपर पात सरिस मन डोला।"
यहाँ मानव मन की चंचलता की तुलना पीपल के हिलते हुए पत्ते से की गई है। उपमेय: "मन", उपमान: "पीपर पात", साधारण धर्म: "डोला (हिलना/चंचल होना)", और वाचक शब्द: "सरिस"। चारों अंग उपस्थित होने से यह पूर्णोपमा अलंकार है।
रूपक अलंकार
Rupaka (Metaphor)
जहाँ गुण की अत्यधिक समानता के कारण उपमेय में उपमान का अभेद आरोप (दोनों को एक ही मान लेना) कर दिया जाता है और कोई वाचक शब्द (सा, सी) नहीं होता, वहाँ "रूपक अलंकार" होता है। इसमें तुलना न करके उपमेय को ही उपमान का रूप दे दिया जाता है।
"चरन कमल बंदौ हरिराई।"
यहाँ भगवान के चरणों (उपमेय) में कमल (उपमान) का अभेद आरोप किया गया है। यह नहीं कहा गया कि "चरण कमल जैसे हैं", बल्कि चरणों को ही सीधे "कमल" कह दिया गया है।
उत्प्रेक्षा अलंकार
Utpreksha (Poetic Fancy / Conceit)
जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना या कल्पना की जाए, वहाँ "उत्प्रेक्षा अलंकार" होता है। इसमें किसी वस्तु को देखकर ऐसा लगता है मानो वह कोई दूसरी सुंदर वस्तु हो। इसके प्रमुख वाचक शब्द हैं: जनु, मनु, जानो, मानो, जनहुँ, मनहुँ, निश्चय, इव।
"सोहत ओढ़ै पीत पट स्याम सलोने गात। मनहुँ नीलमनि सैल पर आतप पर्यो प्रभात॥"
श्रीकृष्ण के सांवले शरीर पर पीले वस्त्र देखकर ऐसी संभावना की गई है "मानो" नीलमणि पर्वत पर प्रातःकालीन सुनहरी धूप पड़ रही हो। "मनहुँ" वाचक शब्द से उत्प्रेक्षा स्पष्ट है।