Virodhabhasa (Oxymoron / Paradox) — लक्षण, परिभाषा व उदाहरणविरोधाभास अलंकार
उच्चारण व लिपि: Virodhabhasa Alankar
काव्य में जहाँ वास्तविक विरोध न होते हुए भी केवल शब्दों के प्रयोग से विरोध का आभास होता है, किंतु गहराई से विचार करने पर विरोध समाप्त होकर सुंदर अर्थ प्रकट होता है, वहाँ "विरोधाभास अलंकार" होता है।
विपरीत अर्थ देने वाले शब्द (जैसे काला-उज्ज्वल, मीठी-पीर, आग-जल) एक साथ आकर सुंदर आध्यात्मिक/भावात्मक अर्थ दें।
Tip in English: Contradictory semantic terms juxtaposed together that resolve into an inspiring philosophical truth.
"या अनुरागी चित्त की गति समुझै नहिं कोय। ज्यों-ज्यों बूड़ै स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्ज्वल होय॥"
काव्यशास्त्रीय विश्लेषण (Literary Explanation):
ऊपरी तौर पर ऐसा लगता है कि काले (स्याम) रंग में डूबने पर कोई वस्तु उज्ज्वल (सफेद) कैसे हो सकती है? किंतु वास्तविक अर्थ है कि मन जितना भगवान श्रीकृष्ण (श्याम) की भक्ति में लीन होता है, वह उतना ही पवित्र व निष्कलंक (उज्ज्वल) बनता जाता है।
Analysis in English: Surface meaning suggests sinking into black dye makes one brighter; the deeper spiritual truth is that immersing in Krishna's love purifies the soul.
अन्य प्रसिद्ध काव्य दोहे एवं उदाहरण
"सुलगी अनुराग की आग वहाँ, जल से भरपूर तड़ाग जहाँ।"
जल से भरे तालाब में प्रेम की आग का सुलगना बाह्य विरोध का आभास कराता है, किंतु भाव रूप में यह विरह की पीड़ा को दर्शाता है।
Fire smouldering in a pond brim-full of water creates a paradoxical surface tension depicting intense longing.
समान श्रेणी के अन्य प्रमुख अलंकार (अर्थालंकार)
सभी अर्थालंकार देखें →उपमा अलंकार
Upama (Simile)
जहाँ किसी वस्तु या प्राणी के गुण, रूप, स्वभाव या सौंदर्य की समानता किसी अन्य प्रसिद्ध वस्तु या प्राणी से की जाती है, वहाँ "उपमा अलंकार" होता है। उपमा के चार अनिवार्य अंग होते हैं: 1. उपमेय (जिसकी तुलना हो), 2. उपमान (जिससे तुलना की जाए), 3. साधारण धर्म (समान गुण), और 4. वाचक शब्द (सा, सी, से, सम, सरिस, सदृश, जैसा)।
"पीपर पात सरिस मन डोला।"
यहाँ मानव मन की चंचलता की तुलना पीपल के हिलते हुए पत्ते से की गई है। उपमेय: "मन", उपमान: "पीपर पात", साधारण धर्म: "डोला (हिलना/चंचल होना)", और वाचक शब्द: "सरिस"। चारों अंग उपस्थित होने से यह पूर्णोपमा अलंकार है।
रूपक अलंकार
Rupaka (Metaphor)
जहाँ गुण की अत्यधिक समानता के कारण उपमेय में उपमान का अभेद आरोप (दोनों को एक ही मान लेना) कर दिया जाता है और कोई वाचक शब्द (सा, सी) नहीं होता, वहाँ "रूपक अलंकार" होता है। इसमें तुलना न करके उपमेय को ही उपमान का रूप दे दिया जाता है।
"चरन कमल बंदौ हरिराई।"
यहाँ भगवान के चरणों (उपमेय) में कमल (उपमान) का अभेद आरोप किया गया है। यह नहीं कहा गया कि "चरण कमल जैसे हैं", बल्कि चरणों को ही सीधे "कमल" कह दिया गया है।
उत्प्रेक्षा अलंकार
Utpreksha (Poetic Fancy / Conceit)
जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना या कल्पना की जाए, वहाँ "उत्प्रेक्षा अलंकार" होता है। इसमें किसी वस्तु को देखकर ऐसा लगता है मानो वह कोई दूसरी सुंदर वस्तु हो। इसके प्रमुख वाचक शब्द हैं: जनु, मनु, जानो, मानो, जनहुँ, मनहुँ, निश्चय, इव।
"सोहत ओढ़ै पीत पट स्याम सलोने गात। मनहुँ नीलमनि सैल पर आतप पर्यो प्रभात॥"
श्रीकृष्ण के सांवले शरीर पर पीले वस्त्र देखकर ऐसी संभावना की गई है "मानो" नीलमणि पर्वत पर प्रातःकालीन सुनहरी धूप पड़ रही हो। "मनहुँ" वाचक शब्द से उत्प्रेक्षा स्पष्ट है।