Vibhavana (Effect Without Cause) — लक्षण, परिभाषा व उदाहरणविभावना अलंकार
उच्चारण व लिपि: Vibhavana Alankar
काव्य में जहाँ कारण के न होने पर भी कार्य का होना (उत्पन्न होना) वर्णित किया जाए, वहाँ "विभावना अलंकार" होता है। सांसारिक नियम है कि कारण के बिना कार्य नहीं होता, किंतु यहाँ कारण के अभाव में भी चमत्कारिक कार्य होता है। इसके वाचक शब्द हैं: बिनु, बिना, बिन, रहित।
पंक्ति में "बिनु", "बिना", "रहित" के साथ किसी क्रिया का संपन्न होना दिखाया जाए।
Tip in English: Watch for negations like "binu" or "bina" (without) followed immediately by the accomplishment of that physical action.
"बिनु पग चलै सुनै बिनु काना, कर बिनु कर्म करै विधि नाना। आनन रहित सकल रस भोगी, बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥"
काव्यशास्त्रीय विश्लेषण (Literary Explanation):
ईश्वर के निराकार स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा गया है कि पैर न होने पर भी वे चलते हैं, कान न होने पर भी सुनते हैं, हाथ न होने पर भी विविध कार्य करते हैं, और मुख न होने पर भी समस्त रसों का आस्वादन करते हैं। कारण रहित कार्य होने से विभावना अलंकार है।
Analysis in English: God walks without feet, hears without ears, performs deeds without hands, and relishes tastes without a mouth.
अन्य प्रसिद्ध काव्य दोहे एवं उदाहरण
"निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय। बिनु पानी, साबुन बिना, निरमल करै सुभाय॥"
यहाँ बिना पानी और साबुन (कारण के अभाव) के भी स्वभाव के निर्मल होने (कार्य) का वर्णन है।
The cleansing of personal character (effect) is achieved without water or soap (natural causes).
समान श्रेणी के अन्य प्रमुख अलंकार (अर्थालंकार)
सभी अर्थालंकार देखें →उपमा अलंकार
Upama (Simile)
जहाँ किसी वस्तु या प्राणी के गुण, रूप, स्वभाव या सौंदर्य की समानता किसी अन्य प्रसिद्ध वस्तु या प्राणी से की जाती है, वहाँ "उपमा अलंकार" होता है। उपमा के चार अनिवार्य अंग होते हैं: 1. उपमेय (जिसकी तुलना हो), 2. उपमान (जिससे तुलना की जाए), 3. साधारण धर्म (समान गुण), और 4. वाचक शब्द (सा, सी, से, सम, सरिस, सदृश, जैसा)।
"पीपर पात सरिस मन डोला।"
यहाँ मानव मन की चंचलता की तुलना पीपल के हिलते हुए पत्ते से की गई है। उपमेय: "मन", उपमान: "पीपर पात", साधारण धर्म: "डोला (हिलना/चंचल होना)", और वाचक शब्द: "सरिस"। चारों अंग उपस्थित होने से यह पूर्णोपमा अलंकार है।
रूपक अलंकार
Rupaka (Metaphor)
जहाँ गुण की अत्यधिक समानता के कारण उपमेय में उपमान का अभेद आरोप (दोनों को एक ही मान लेना) कर दिया जाता है और कोई वाचक शब्द (सा, सी) नहीं होता, वहाँ "रूपक अलंकार" होता है। इसमें तुलना न करके उपमेय को ही उपमान का रूप दे दिया जाता है।
"चरन कमल बंदौ हरिराई।"
यहाँ भगवान के चरणों (उपमेय) में कमल (उपमान) का अभेद आरोप किया गया है। यह नहीं कहा गया कि "चरण कमल जैसे हैं", बल्कि चरणों को ही सीधे "कमल" कह दिया गया है।
उत्प्रेक्षा अलंकार
Utpreksha (Poetic Fancy / Conceit)
जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना या कल्पना की जाए, वहाँ "उत्प्रेक्षा अलंकार" होता है। इसमें किसी वस्तु को देखकर ऐसा लगता है मानो वह कोई दूसरी सुंदर वस्तु हो। इसके प्रमुख वाचक शब्द हैं: जनु, मनु, जानो, मानो, जनहुँ, मनहुँ, निश्चय, इव।
"सोहत ओढ़ै पीत पट स्याम सलोने गात। मनहुँ नीलमनि सैल पर आतप पर्यो प्रभात॥"
श्रीकृष्ण के सांवले शरीर पर पीले वस्त्र देखकर ऐसी संभावना की गई है "मानो" नीलमणि पर्वत पर प्रातःकालीन सुनहरी धूप पड़ रही हो। "मनहुँ" वाचक शब्द से उत्प्रेक्षा स्पष्ट है।