Ullekha (Multiple Descriptions) — लक्षण, परिभाषा व उदाहरणउल्लेख अलंकार
उच्चारण व लिपि: Ullekha Alankar
जहाँ एक ही वस्तु, व्यक्ति या सत्ता का विभिन्न द्रष्टाओं द्वारा अपनी-अपनी रुचि, भावना या दृष्टि के अनुसार अलग-अलग रूपों में उल्लेख (वर्णन) किया जाए, वहाँ "उल्लेख अलंकार" होता है।
एक ही व्यक्ति या वस्तु के लिए विभिन्न लोगों द्वारा अलग-अलग संज्ञाएं या विशेषण प्रयुक्त होना।
Tip in English: Multiple observers perceiving a single entity under multifaceted personas matching their own dispositions.
"जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।"
काव्यशास्त्रीय विश्लेषण (Literary Explanation):
जनकपुर की रंगभूमि में भगवान श्रीराम एक ही हैं, किंतु धनुष यज्ञ में उपस्थित वीरों ने उन्हें वज्र के समान, माताओं ने पुत्र रूप में, तथा भक्तों ने साक्षात् परब्रह्म के रूप में देखा।
Analysis in English: Lord Rama is one single person, yet seen by warriors as lightning-like power, by mothers as a child, and by saints as the Supreme Divine.
अन्य प्रसिद्ध काव्य दोहे एवं उदाहरण
"तू रूप है किरण में, सौंदर्य है सुमन में, तू प्राण है पवन में, विस्तार है गगन में।"
यहाँ एक ही परमात्मा की सर्वव्यापक सत्ता का उल्लेख विभिन्न प्राकृतिक उपादानों में भिन्न-भिन्न रूपों में किया गया है।
The single Supreme Creator is celebrated as radiant light in the ray, beauty in the blossom, and vitality in the breeze.
समान श्रेणी के अन्य प्रमुख अलंकार (अर्थालंकार)
सभी अर्थालंकार देखें →उपमा अलंकार
Upama (Simile)
जहाँ किसी वस्तु या प्राणी के गुण, रूप, स्वभाव या सौंदर्य की समानता किसी अन्य प्रसिद्ध वस्तु या प्राणी से की जाती है, वहाँ "उपमा अलंकार" होता है। उपमा के चार अनिवार्य अंग होते हैं: 1. उपमेय (जिसकी तुलना हो), 2. उपमान (जिससे तुलना की जाए), 3. साधारण धर्म (समान गुण), और 4. वाचक शब्द (सा, सी, से, सम, सरिस, सदृश, जैसा)।
"पीपर पात सरिस मन डोला।"
यहाँ मानव मन की चंचलता की तुलना पीपल के हिलते हुए पत्ते से की गई है। उपमेय: "मन", उपमान: "पीपर पात", साधारण धर्म: "डोला (हिलना/चंचल होना)", और वाचक शब्द: "सरिस"। चारों अंग उपस्थित होने से यह पूर्णोपमा अलंकार है।
रूपक अलंकार
Rupaka (Metaphor)
जहाँ गुण की अत्यधिक समानता के कारण उपमेय में उपमान का अभेद आरोप (दोनों को एक ही मान लेना) कर दिया जाता है और कोई वाचक शब्द (सा, सी) नहीं होता, वहाँ "रूपक अलंकार" होता है। इसमें तुलना न करके उपमेय को ही उपमान का रूप दे दिया जाता है।
"चरन कमल बंदौ हरिराई।"
यहाँ भगवान के चरणों (उपमेय) में कमल (उपमान) का अभेद आरोप किया गया है। यह नहीं कहा गया कि "चरण कमल जैसे हैं", बल्कि चरणों को ही सीधे "कमल" कह दिया गया है।
उत्प्रेक्षा अलंकार
Utpreksha (Poetic Fancy / Conceit)
जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना या कल्पना की जाए, वहाँ "उत्प्रेक्षा अलंकार" होता है। इसमें किसी वस्तु को देखकर ऐसा लगता है मानो वह कोई दूसरी सुंदर वस्तु हो। इसके प्रमुख वाचक शब्द हैं: जनु, मनु, जानो, मानो, जनहुँ, मनहुँ, निश्चय, इव।
"सोहत ओढ़ै पीत पट स्याम सलोने गात। मनहुँ नीलमनि सैल पर आतप पर्यो प्रभात॥"
श्रीकृष्ण के सांवले शरीर पर पीले वस्त्र देखकर ऐसी संभावना की गई है "मानो" नीलमणि पर्वत पर प्रातःकालीन सुनहरी धूप पड़ रही हो। "मनहुँ" वाचक शब्द से उत्प्रेक्षा स्पष्ट है।