Sandeh (Poetic Dilemma / Uncertainty) — लक्षण, परिभाषा व उदाहरणसंदेह अलंकार
उच्चारण व लिपि: Sandeh Alankar
जहाँ रूप, रंग या गुण की अत्यधिक समानता के कारण उपमेय में उपमान का ऐसा संशय उत्पन्न हो जाए कि अंत तक निश्चित न हो सके कि वास्तव में वस्तु क्या है (निर्णय न हो पाना), वहाँ "संदेह अलंकार" होता है। इसके वाचक शब्द हैं: कि, कैधौं, या, अथवा।
पंक्ति में "कि", "या", "कैधौं", "अथवा" आए और मन में अनिश्चय (Doubt) अंत तक बना रहे।
Tip in English: Watch for disjunctive markers like "ki", "kaidhaun", "ya", leaving the identity unresolved.
"सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है। कि सारी ही की नारी है कि नारी ही की सारी है॥"
काव्यशास्त्रीय विश्लेषण (Literary Explanation):
चीरहरण के समय द्रौपदी की अंतहीन साड़ी को देखकर दुःशासन और सभासद निर्णय नहीं कर पाते कि साड़ी के बीच में स्त्री है या स्त्री के बीच में साड़ी, अथवा साड़ी की ही स्त्री बनी है या स्त्री की ही साड़ी बनी है। संशय अंत तक बना रहता है।
Analysis in English: Beholding the endless stream of Draupadi's sari, onlookers remain perpetually undecided whether the woman is in the sari or the sari is in the woman.
अन्य प्रसिद्ध काव्य दोहे एवं उदाहरण
"यह काया है या शेष उसी की छाया, क्षण भर उनकी कुछ नहीं समझ में आया।"
तपस्या से दुर्बल शरीर को देखकर यह संशय बना रहता है कि यह वास्तविक शरीर है या केवल उसकी परछाईं मात्र।
Looking upon an emaciated ascetic, the observer remains doubtful whether it is the physical body or just its lingering shadow.
समान श्रेणी के अन्य प्रमुख अलंकार (अर्थालंकार)
सभी अर्थालंकार देखें →उपमा अलंकार
Upama (Simile)
जहाँ किसी वस्तु या प्राणी के गुण, रूप, स्वभाव या सौंदर्य की समानता किसी अन्य प्रसिद्ध वस्तु या प्राणी से की जाती है, वहाँ "उपमा अलंकार" होता है। उपमा के चार अनिवार्य अंग होते हैं: 1. उपमेय (जिसकी तुलना हो), 2. उपमान (जिससे तुलना की जाए), 3. साधारण धर्म (समान गुण), और 4. वाचक शब्द (सा, सी, से, सम, सरिस, सदृश, जैसा)।
"पीपर पात सरिस मन डोला।"
यहाँ मानव मन की चंचलता की तुलना पीपल के हिलते हुए पत्ते से की गई है। उपमेय: "मन", उपमान: "पीपर पात", साधारण धर्म: "डोला (हिलना/चंचल होना)", और वाचक शब्द: "सरिस"। चारों अंग उपस्थित होने से यह पूर्णोपमा अलंकार है।
रूपक अलंकार
Rupaka (Metaphor)
जहाँ गुण की अत्यधिक समानता के कारण उपमेय में उपमान का अभेद आरोप (दोनों को एक ही मान लेना) कर दिया जाता है और कोई वाचक शब्द (सा, सी) नहीं होता, वहाँ "रूपक अलंकार" होता है। इसमें तुलना न करके उपमेय को ही उपमान का रूप दे दिया जाता है।
"चरन कमल बंदौ हरिराई।"
यहाँ भगवान के चरणों (उपमेय) में कमल (उपमान) का अभेद आरोप किया गया है। यह नहीं कहा गया कि "चरण कमल जैसे हैं", बल्कि चरणों को ही सीधे "कमल" कह दिया गया है।
उत्प्रेक्षा अलंकार
Utpreksha (Poetic Fancy / Conceit)
जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना या कल्पना की जाए, वहाँ "उत्प्रेक्षा अलंकार" होता है। इसमें किसी वस्तु को देखकर ऐसा लगता है मानो वह कोई दूसरी सुंदर वस्तु हो। इसके प्रमुख वाचक शब्द हैं: जनु, मनु, जानो, मानो, जनहुँ, मनहुँ, निश्चय, इव।
"सोहत ओढ़ै पीत पट स्याम सलोने गात। मनहुँ नीलमनि सैल पर आतप पर्यो प्रभात॥"
श्रीकृष्ण के सांवले शरीर पर पीले वस्त्र देखकर ऐसी संभावना की गई है "मानो" नीलमणि पर्वत पर प्रातःकालीन सुनहरी धूप पड़ रही हो। "मनहुँ" वाचक शब्द से उत्प्रेक्षा स्पष्ट है।