Prateep (Inverted Simile) — लक्षण, परिभाषा व उदाहरणप्रतीप अलंकार
उच्चारण व लिपि: Prateep Alankar
"प्रतीप" का शाब्दिक अर्थ होता है — "उलटा" या "विपरीत"। यह उपमा अलंकार का ठीक उलटा होता है। जहाँ प्रसिद्ध उपमान को उपमेय से हीन (तुच्छ) बता दिया जाए या उपमान को ही उपमेय की समानता करते हुए लज्जित दिखाया जाए, वहाँ "प्रतीप अलंकार" होता है।
उपमान (चंद्रमा, कमल आदि) को तुच्छ, लज्जित या उपमेय के समान बनने का असफल प्रयास करते दिखाया जाना।
Tip in English: The traditional standard (e.g. moon, lotus) is depicted as inferior or envious of the human subject.
"सीय मुख समता पाव किमि चंदु बापुरो रंक।"
काव्यशास्त्रीय विश्लेषण (Literary Explanation):
सीता जी के मुख (उपमेय) की सुंदरता इतनी अद्वितीय है कि प्रसिद्ध उपमान चंद्रमा को उसके सामने "बेचारा रंक (कंगाल)" कहकर उपमान का तिरस्कार किया गया है। अतः यह प्रतीप अलंकार है।
Analysis in English: Sita's face is exalted so supremely that the moon (standard of beauty) is humbled as a "wretched pauper" incapable of matching her.
अन्य प्रसिद्ध काव्य दोहे एवं उदाहरण
"उसी तपस्वी-से लंबे थे, देवदारु दो-चार खड़े।"
यहाँ देवदारु के विशाल वृक्षों (उपमान) को तपस्वी (उपमेय) के समान लंबा बताकर उपमा को उलटा किया गया है।
Mighty deodar trees are compared to the tall ascetic, inverting the customary direction of simile.
समान श्रेणी के अन्य प्रमुख अलंकार (अर्थालंकार)
सभी अर्थालंकार देखें →उपमा अलंकार
Upama (Simile)
जहाँ किसी वस्तु या प्राणी के गुण, रूप, स्वभाव या सौंदर्य की समानता किसी अन्य प्रसिद्ध वस्तु या प्राणी से की जाती है, वहाँ "उपमा अलंकार" होता है। उपमा के चार अनिवार्य अंग होते हैं: 1. उपमेय (जिसकी तुलना हो), 2. उपमान (जिससे तुलना की जाए), 3. साधारण धर्म (समान गुण), और 4. वाचक शब्द (सा, सी, से, सम, सरिस, सदृश, जैसा)।
"पीपर पात सरिस मन डोला।"
यहाँ मानव मन की चंचलता की तुलना पीपल के हिलते हुए पत्ते से की गई है। उपमेय: "मन", उपमान: "पीपर पात", साधारण धर्म: "डोला (हिलना/चंचल होना)", और वाचक शब्द: "सरिस"। चारों अंग उपस्थित होने से यह पूर्णोपमा अलंकार है।
रूपक अलंकार
Rupaka (Metaphor)
जहाँ गुण की अत्यधिक समानता के कारण उपमेय में उपमान का अभेद आरोप (दोनों को एक ही मान लेना) कर दिया जाता है और कोई वाचक शब्द (सा, सी) नहीं होता, वहाँ "रूपक अलंकार" होता है। इसमें तुलना न करके उपमेय को ही उपमान का रूप दे दिया जाता है।
"चरन कमल बंदौ हरिराई।"
यहाँ भगवान के चरणों (उपमेय) में कमल (उपमान) का अभेद आरोप किया गया है। यह नहीं कहा गया कि "चरण कमल जैसे हैं", बल्कि चरणों को ही सीधे "कमल" कह दिया गया है।
उत्प्रेक्षा अलंकार
Utpreksha (Poetic Fancy / Conceit)
जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना या कल्पना की जाए, वहाँ "उत्प्रेक्षा अलंकार" होता है। इसमें किसी वस्तु को देखकर ऐसा लगता है मानो वह कोई दूसरी सुंदर वस्तु हो। इसके प्रमुख वाचक शब्द हैं: जनु, मनु, जानो, मानो, जनहुँ, मनहुँ, निश्चय, इव।
"सोहत ओढ़ै पीत पट स्याम सलोने गात। मनहुँ नीलमनि सैल पर आतप पर्यो प्रभात॥"
श्रीकृष्ण के सांवले शरीर पर पीले वस्त्र देखकर ऐसी संभावना की गई है "मानो" नीलमणि पर्वत पर प्रातःकालीन सुनहरी धूप पड़ रही हो। "मनहुँ" वाचक शब्द से उत्प्रेक्षा स्पष्ट है।