Bhrantiman (Delusion / False Perception) — लक्षण, परिभाषा व उदाहरणभ्रांतिमान अलंकार
उच्चारण व लिपि: Bhrantiman Alankar
जहाँ सादृश्य (समानता) के कारण उपमेय को भूलवश वास्तविक रूप से उपमान मान लिया जाए और उसी भ्रम के वशीभूत होकर कार्य भी कर डाला जाए, वहाँ "भ्रांतिमान अलंकार" होता है। (नोट: संदेह में अंत तक अनिश्चय रहता है, जबकि भ्रांतिमान में भ्रमवश निश्चय हो जाता है)।
भ्रम, जानि, समझि, भ्रांति जैसे शब्द आएं और पात्र भ्रम को सच मानकर कोई चेष्टा करे।
Tip in English: Look for words like "bhram", "jaani", "samajhi", where a character acts upon an erroneous perception.
"नाक का मोती अधर की कांति से, बीज दाड़िम का समझ कर भ्रांति से। देखकर सहसा हुआ शुक मौन है, सोचता है अन्य शुक यह कौन है॥"
काव्यशास्त्रीय विश्लेषण (Literary Explanation):
नायिका की नाक के मोती को होंठों की लालिमा के कारण तोता अनार का बीज (दाड़िम-बीज) समझ लेता है, और उसकी नाक को दूसरा तोता समझकर मौन होकर विचार करने लगता है। यहाँ भ्रम पक्का हो चुका है।
Analysis in English: A parrot mistakes the nose-pearl reflecting red lips for a pomegranate seed, and firmly mistakes the shapely nose for a rival parrot.
अन्य प्रसिद्ध काव्य दोहे एवं उदाहरण
"पाँय महावर देन कौ नाइन बैठी आय। फिरि-फिरि जानि महावरी, एड़ी मीड़ति जाय॥"
नायिका की एड़ियों की स्वाभाविक रक्तिम सुंदरता को देखकर नाइन (नाई की पत्नी) उसे पहले से लगी महावर समझकर बार-बार एड़ी को मलती रहती है।
The maid mistakes the naturally rosy heels of the maiden for red lacquer (mahavar) and rubs them repeatedly.
समान श्रेणी के अन्य प्रमुख अलंकार (अर्थालंकार)
सभी अर्थालंकार देखें →उपमा अलंकार
Upama (Simile)
जहाँ किसी वस्तु या प्राणी के गुण, रूप, स्वभाव या सौंदर्य की समानता किसी अन्य प्रसिद्ध वस्तु या प्राणी से की जाती है, वहाँ "उपमा अलंकार" होता है। उपमा के चार अनिवार्य अंग होते हैं: 1. उपमेय (जिसकी तुलना हो), 2. उपमान (जिससे तुलना की जाए), 3. साधारण धर्म (समान गुण), और 4. वाचक शब्द (सा, सी, से, सम, सरिस, सदृश, जैसा)।
"पीपर पात सरिस मन डोला।"
यहाँ मानव मन की चंचलता की तुलना पीपल के हिलते हुए पत्ते से की गई है। उपमेय: "मन", उपमान: "पीपर पात", साधारण धर्म: "डोला (हिलना/चंचल होना)", और वाचक शब्द: "सरिस"। चारों अंग उपस्थित होने से यह पूर्णोपमा अलंकार है।
रूपक अलंकार
Rupaka (Metaphor)
जहाँ गुण की अत्यधिक समानता के कारण उपमेय में उपमान का अभेद आरोप (दोनों को एक ही मान लेना) कर दिया जाता है और कोई वाचक शब्द (सा, सी) नहीं होता, वहाँ "रूपक अलंकार" होता है। इसमें तुलना न करके उपमेय को ही उपमान का रूप दे दिया जाता है।
"चरन कमल बंदौ हरिराई।"
यहाँ भगवान के चरणों (उपमेय) में कमल (उपमान) का अभेद आरोप किया गया है। यह नहीं कहा गया कि "चरण कमल जैसे हैं", बल्कि चरणों को ही सीधे "कमल" कह दिया गया है।
उत्प्रेक्षा अलंकार
Utpreksha (Poetic Fancy / Conceit)
जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना या कल्पना की जाए, वहाँ "उत्प्रेक्षा अलंकार" होता है। इसमें किसी वस्तु को देखकर ऐसा लगता है मानो वह कोई दूसरी सुंदर वस्तु हो। इसके प्रमुख वाचक शब्द हैं: जनु, मनु, जानो, मानो, जनहुँ, मनहुँ, निश्चय, इव।
"सोहत ओढ़ै पीत पट स्याम सलोने गात। मनहुँ नीलमनि सैल पर आतप पर्यो प्रभात॥"
श्रीकृष्ण के सांवले शरीर पर पीले वस्त्र देखकर ऐसी संभावना की गई है "मानो" नीलमणि पर्वत पर प्रातःकालीन सुनहरी धूप पड़ रही हो। "मनहुँ" वाचक शब्द से उत्प्रेक्षा स्पष्ट है।