Asangati (Discordance / Dislocated Causality) — लक्षण, परिभाषा व उदाहरणअसंगति अलंकार
उच्चारण व लिपि: Asangati Alankar
काव्य में सामान्यतः कारण और कार्य एक ही स्थान पर होते हैं (जहाँ चोट लगेगी, दर्द वहीं होगा)। किंतु जहाँ कारण किसी एक स्थान पर हो और उसका कार्य (असर) किसी दूसरे स्थान पर दिखाई दे, वहाँ "असंगति अलंकार" होता है।
कारण एक पात्र या स्थान पर हो और उसका प्रभाव/दर्द किसी दूसरे पात्र या स्थान पर वर्णित हो।
Tip in English: A wound or action situated in one entity while the resulting sensation or reaction is felt by another.
"हृदय घाव मेरे पीर रघुवीरै।"
काव्यशास्त्रीय विश्लेषण (Literary Explanation):
लक्ष्मण जी कहते हैं कि शक्ति बाण का घाव तो मेरे हृदय में लगा है (कारण यहाँ है), किंतु उसकी असह्य पीड़ा भगवान श्रीराम के हृदय में हो रही है (कार्य अन्यत्र है)। स्थान की इस असंगति से प्रेम की पराकाष्ठा व्यंजित होती है।
Analysis in English: Lakshmana states: the spear wound is on my chest (cause here), but the excruciating pain is felt in Rama's heart (effect elsewhere).
अन्य प्रसिद्ध काव्य दोहे एवं उदाहरण
"दृग उरझत टूटत कुटुंब, जुरत चतुर चित प्रीति। परति गाँठि दुर्जन हिये, दई नई यह रीति॥"
उलझते हैं नेत्र, टूटता है परिवार, जुड़ता है प्रेमियों का चित्त, और ईर्ष्या की गांठ पड़ती है दुर्जनों के हृदय में! कारण और कार्य की सर्वथा असंगति है।
Eyes entangle, yet families shatter; hearts unite, yet knots of envy tie the hearts of ill-wishers.
समान श्रेणी के अन्य प्रमुख अलंकार (अर्थालंकार)
सभी अर्थालंकार देखें →उपमा अलंकार
Upama (Simile)
जहाँ किसी वस्तु या प्राणी के गुण, रूप, स्वभाव या सौंदर्य की समानता किसी अन्य प्रसिद्ध वस्तु या प्राणी से की जाती है, वहाँ "उपमा अलंकार" होता है। उपमा के चार अनिवार्य अंग होते हैं: 1. उपमेय (जिसकी तुलना हो), 2. उपमान (जिससे तुलना की जाए), 3. साधारण धर्म (समान गुण), और 4. वाचक शब्द (सा, सी, से, सम, सरिस, सदृश, जैसा)।
"पीपर पात सरिस मन डोला।"
यहाँ मानव मन की चंचलता की तुलना पीपल के हिलते हुए पत्ते से की गई है। उपमेय: "मन", उपमान: "पीपर पात", साधारण धर्म: "डोला (हिलना/चंचल होना)", और वाचक शब्द: "सरिस"। चारों अंग उपस्थित होने से यह पूर्णोपमा अलंकार है।
रूपक अलंकार
Rupaka (Metaphor)
जहाँ गुण की अत्यधिक समानता के कारण उपमेय में उपमान का अभेद आरोप (दोनों को एक ही मान लेना) कर दिया जाता है और कोई वाचक शब्द (सा, सी) नहीं होता, वहाँ "रूपक अलंकार" होता है। इसमें तुलना न करके उपमेय को ही उपमान का रूप दे दिया जाता है।
"चरन कमल बंदौ हरिराई।"
यहाँ भगवान के चरणों (उपमेय) में कमल (उपमान) का अभेद आरोप किया गया है। यह नहीं कहा गया कि "चरण कमल जैसे हैं", बल्कि चरणों को ही सीधे "कमल" कह दिया गया है।
उत्प्रेक्षा अलंकार
Utpreksha (Poetic Fancy / Conceit)
जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना या कल्पना की जाए, वहाँ "उत्प्रेक्षा अलंकार" होता है। इसमें किसी वस्तु को देखकर ऐसा लगता है मानो वह कोई दूसरी सुंदर वस्तु हो। इसके प्रमुख वाचक शब्द हैं: जनु, मनु, जानो, मानो, जनहुँ, मनहुँ, निश्चय, इव।
"सोहत ओढ़ै पीत पट स्याम सलोने गात। मनहुँ नीलमनि सैल पर आतप पर्यो प्रभात॥"
श्रीकृष्ण के सांवले शरीर पर पीले वस्त्र देखकर ऐसी संभावना की गई है "मानो" नीलमणि पर्वत पर प्रातःकालीन सुनहरी धूप पड़ रही हो। "मनहुँ" वाचक शब्द से उत्प्रेक्षा स्पष्ट है।