Grammar Rule & Principle (व्याकरण नियम व सूत्र): विसर्ग के बाद "र" वर्ण आने पर विसर्ग का लोप हो जाता है तथा पूर्ववर्ती ह्रस्व स्वर "इ" दीर्घ "ई" ( ी ) में बदल जाता है।
"नियमित योगाभ्यास और संतुलित सात्विक आहार शरीर को स्वस्थ और नीरोग बनाए रखता है।"
दो मूल सार्थक पद
Yashaichchha (Yashah + Ichchha)
विसर्ग से पूर्व "अ" होने तथा बाद में "इ" स्वर आने पर केवल विसर्ग का लोप होता है, अन्य कोई स्वर संधि नहीं होती।
Visarga drops cleanly when preceded by "a" and followed by "i", without gun vowel contraction.
"निष्काम कर्मयोगी किसी सांसारिक यशइच्छा के बिना ही समाज की निस्वार्थ सेवा में लीन रहता है।"
"A selfless karma-yogi remains immersed in service without any craving for personal fame (Yashaichchha)."
"यशइच्छा" का शुद्ध एवं प्रामाणिक संधि विच्छेद "यशः + इच्छा" है।
"यशइच्छा" में मुख्य रूप से "विसर्ग संधि" (विशिष्ट उपभेद: विसर्ग का लोप एवं पूर्व स्वर का दीर्घ होना) है।
विसर्ग से पूर्व "अ" होने तथा बाद में "इ" स्वर आने पर केवल विसर्ग का लोप होता है, अन्य कोई स्वर संधि नहीं होती। (ध्वनि सूत्र: अः + इ = अइ (केवल विसर्ग लोप))
English Translation: "A selfless karma-yogi remains immersed in service without any craving for personal fame (Yashaichchha)." | Sentence in Hindi: "निष्काम कर्मयोगी किसी सांसारिक यशइच्छा के बिना ही समाज की निस्वार्थ सेवा में लीन रहता है।"
Grammar Rule & Principle (व्याकरण नियम व सूत्र): विसर्ग के बाद "र" वर्ण आने पर विसर्ग का लोप हो जाता है तथा पूर्ववर्ती ह्रस्व स्वर "इ" दीर्घ "ई" ( ी ) में बदल जाता है।
"नियमित योगाभ्यास और संतुलित सात्विक आहार शरीर को स्वस्थ और नीरोग बनाए रखता है।"
Grammar Rule & Principle (व्याकरण नियम व सूत्र): विसर्ग के बाद "र" आने से विसर्ग लुप्त हो जाता है और पूर्ववर्ती ह्रस्व "इ" दीर्घ होकर "नी" बन जाता है।
"कला और साहित्य से विहीन मनुष्य का जीवन सर्वथा नीरस और प्रेरणाहीन हो जाता है।"
Grammar Rule & Principle (व्याकरण नियम व सूत्र): विसर्ग के बाद "र" आने पर विसर्ग का लोप होता है और "नि" का ह्रस्व "इ" दीर्घ "ई" में परिवर्तित होता है।
"मध्यरात्रि के समय संपूर्ण गाँव में एक गहरा और नीरव सन्नाटा छाया हुआ था।"
Grammar Rule & Principle (व्याकरण नियम व सूत्र): विसर्ग के बाद "र" आने पर विसर्ग का लोप होकर पूर्ववर्ती स्वर "इ" दीर्घ "ई" में बदल जाता है।
"रोग (रुज) से रहित नीरुज काया ही मनुष्य के समस्त सांसारिक सुखों का पहला साधन है।"