दोहा छंद (13-11 मात्राएँ)
Classical Couplet (दोहा)

कबीर संगति साधु की, कदे न निरफल होय।चंदन होसी बावना, नींब न कहसी कोय॥

Kabir sangati saadhu ki, kade na nirphal hoy. Chandan hosi baawana, neemb na kahsi koy.

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Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या)

हिंदी सरल व्याख्या (Hindi Vyakhya):

कबीरदास जी सत्संगति की महिमा बताते हुए कहते हैं कि सज्जनों और संतों की संगति कभी भी व्यर्थ या निष्फल नहीं होती। जिस प्रकार चंदन के समीप रहने वाला साधारण बावना पेड़ भी चंदन की सुवास से महक उठता है और कोई उसे नीम या कड़वा नहीं कहता, उसी प्रकार सत्पुरुषों के संपर्क में आने से दुर्जन व्यक्ति भी सुधरकर श्रेष्ठ बन जाता है।

English Translation & Meaning:

Companionship with righteous souls never goes in vain. Just as an ordinary dwarf shrub growing beside a sandalwood tree absorbs its heavenly perfume and none calls it bitter neem, noble company uplifts and transforms human character.

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Literary Context & Source (साहित्यिक संदर्भ व स्रोत)

मूल ग्रंथ / संकलन: कबीर साखी (साधु संगति को अंग)
काव्य विधा: दोहा (मात्रिक छंद)

संत कबीरदास का यह दोहा 15वीं शताब्दी (भक्तिकाल - निर्गुण ज्ञानाश्रयी शाखा) की अमर साहित्यिक धरोहर है। यह दोहा मध्यकालीन भक्ति एवं नीति काव्य परंपरा का अत्यंत प्रामाणिक अंश है जो जीवन के व्यावहारिक सत्य, सदाचार और मानवीय चेतना को जागृत करता है।

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"कबीर संगति साधु की, कदे न निरफल होय।" दोहे के रचयिता कौन हैं?▼

यह प्रसिद्ध एवं प्रामाणिक दोहा संत कबीरदास द्वारा रचित है। यह दोहा 'कबीर साखी (साधु संगति को अंग)' में संकलित है।

"कबीर संगति साधु की, कदे न निरफल होय।" दोहे का सरल हिंदी भावार्थ (व्याख्या) क्या है?▼

कबीरदास जी सत्संगति की महिमा बताते हुए कहते हैं कि सज्जनों और संतों की संगति कभी भी व्यर्थ या निष्फल नहीं होती। जिस प्रकार चंदन के समीप रहने वाला साधारण बावना पेड़ भी चंदन की सुवास से महक उठता है और कोई उसे नीम या कड़वा नहीं कहता, उसी प्रकार सत्पुरुषों के संपर्क में आने से दुर्जन व्यक्ति भी सुधरकर श्रेष्ठ बन जाता है।

What is the English meaning of the doha "कबीर संगति साधु की, कदे न निरफल होय।"?▼

Companionship with righteous souls never goes in vain. Just as an ordinary dwarf shrub growing beside a sandalwood tree absorbs its heavenly perfume and none calls it bitter neem, noble company uplifts and transforms human character.

यह दोहा किस विषय और जीवन-मूल्य पर आधारित है?▼

यह दोहा मुख्य रूप से 'सत्संगति एवं मित्रता' (Good Company & Friendship) विषय पर आधारित है, जो मानव जीवन में सदाचार, विवेक और आत्म-सुधार की प्रेरणा देता है।

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कबीर संगति साधु की, बेगि करीजै जाय।

दुरमति दूरि गँवाइ सी, देसी सुमति बताय॥

Kabir sangati saadhu ki, begi kareejai jaay. / Durmati doori ganvaai si, desi sumati batay.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

कबीरदास जी कहते हैं कि जैसे ही अवसर मिले, अविलंब जाकर सज्जनों और संतों की संगति कर लेनी चाहिए। संत पुरुषों का सान्निध्य मनुष्य के भीतर की समस्त दुर्बुद्धि, कुविचारों और दुर्गुणों को दूर भगा देता है और उसे श्रेष्ठ बुद्धि (सुमति), विवेक और सत्य मार्ग का दर्शन करा देता है। सत्संगति जीवन की दिशा बदल देती है।

English: Make haste without delay to seek the company of the wise and noble, advises Kabir. For virtuous companionship expels all wicked thoughts and ignorance from the mind, instilling righteous discernment and luminous wisdom.

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बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥

Bura jo dekhan main chala, bura na miliya koy. / Jo dil khoja aapna, mujhse bura na koy.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

कबीरदास जी कहते हैं कि जब मैं संसार में दूसरों की बुराइयाँ और दोष ढूँढ़ने निकला, तो मुझे कोई भी वास्तव में बुरा नहीं मिला। परंतु जब मैंने अंतर्मुखी होकर अपने ही मन और हृदय की गहराइयों में झाँका, तो मुझे ज्ञात हुआ कि संसार में मुझसे अधिक अवगुणों से भरा कोई दूसरा नहीं है। यह दोहा आत्म-समीक्षा और निरहंकारिता का सर्वोच्च संदेश देता है।

English: When I set out to search for evil and fault in the world, I could find no truly wicked person. But when I probed deep into my own heart and mind, I realized that none was more flawed than myself. True transformation begins with honest self-introspection rather than judging others.

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पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥

Pothi padhi padhi jag mua, pandit bhaya na koy. / Dhai aakhar prem ka, padhe so pandit hoy.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

कबीरदास जी कहते हैं कि संसार भर के लोग मोटे-मोटे धार्मिक ग्रंथ और शास्त्र पढ़-पढ़कर मृत्यु को प्राप्त हो गए, किंतु केवल किताबी ज्ञान से कोई भी सच्चा ज्ञानी अथवा पंडित नहीं बन सका। वास्तव में जो व्यक्ति प्रेम के केवल ढाई अक्षर का मर्म समझ लेता है और प्राणिमात्र से निष्कपट ईश्वरीय प्रेम करता है, वही सच्चा ज्ञानी और तत्ववेत्ता है।

English: Countless generations passed away perusing heavy treatises and scriptures, yet none attained true wisdom through mere bookish knowledge. He who truly comprehends and lives the two and a half letters of unconditional divine love is the truly enlightened sage.

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गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।

बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय॥

Guru govind do-u khade, kaake laagun paay. / Balihari guru aapno, govind diyo batay.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

कबीरदास जी कहते हैं कि मेरे समक्ष मेरे गुरु और साक्षात् ईश्वर (गोविंद) दोनों एक साथ खड़े हैं। मेरे मन में यह धर्मसंकट उत्पन्न हो गया कि मैं पहले किसके चरण स्पर्श करूँ। अंततः मैं अपने गुरु के चरणों पर ही बलिहारी जाता हूँ, जिन्होंने मुझे ईश्वर का साक्षात्कार कराया और प्रभु तक पहुँचने का मार्ग दिखाया। गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊँचा है।

English: Both my spiritual Guru and the Supreme Lord Govinda stand before me; to whose lotus feet should I bow first? I offer my total surrender and homage to the Guru first, for it was the Guru whose gracious light revealed the presence and path of the Divine.

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