Grammar Rule & Principle (व्याकरण नियम व सूत्र): प्रथम पद के अंत में दीर्घ "आ" तथा द्वितीय पद के प्रारंभ में दीर्घ "आ" के मेल से दीर्घ "आ" स्वर बन जाता है।
"हमारे नगर का केंद्रीय विद्यालय अनुशासन और श्रेष्ठ परीक्षा परिणामों के लिए विख्यात है।"
दो मूल सार्थक पद
Pitrin (Pitri + Rin)
प्रथम पद के अंत में "ऋ" और द्वितीय पद के आदि में "ऋ" के मेल से दीर्घ ऋ रूप बनता है (हिंदी वर्तनी में ऋ रूप ही प्रयुक्त होता है)।
Short vowel "ri" meeting another "ri" combines into homogeneous "ri".
"माता-पिता की निस्वार्थ सेवा और आज्ञापालन करके ही मनुष्य पितृण से उऋण हो सकता है।"
"Only through selfless service and obedience towards parents can one be liberated from filial debt (Pitrin)."
"पितृण" का शुद्ध एवं प्रामाणिक संधि विच्छेद "पितृ + ऋण" है।
"पितृण" में मुख्य रूप से "स्वर संधि" (विशिष्ट उपभेद: दीर्घ स्वर संधि) है।
प्रथम पद के अंत में "ऋ" और द्वितीय पद के आदि में "ऋ" के मेल से दीर्घ ऋ रूप बनता है (हिंदी वर्तनी में ऋ रूप ही प्रयुक्त होता है)। (ध्वनि सूत्र: ऋ + ऋ = ऋ)
English Translation: "Only through selfless service and obedience towards parents can one be liberated from filial debt (Pitrin)." | Sentence in Hindi: "माता-पिता की निस्वार्थ सेवा और आज्ञापालन करके ही मनुष्य पितृण से उऋण हो सकता है।"
Grammar Rule & Principle (व्याकरण नियम व सूत्र): प्रथम पद के अंत में दीर्घ "आ" तथा द्वितीय पद के प्रारंभ में दीर्घ "आ" के मेल से दीर्घ "आ" स्वर बन जाता है।
"हमारे नगर का केंद्रीय विद्यालय अनुशासन और श्रेष्ठ परीक्षा परिणामों के लिए विख्यात है।"
Grammar Rule & Principle (व्याकरण नियम व सूत्र): प्रथम पद के अंत में ह्रस्व "अ" और द्वितीय पद के आदि में दीर्घ "आ" के मिलने से दीर्घ "आ" स्वर बन जाता है।
"प्रातःकाल देवालय में घंटा-ध्वनि और शंखनाद से वातावरण अत्यंत पावन हो जाता है।"
Grammar Rule & Principle (व्याकरण नियम व सूत्र): प्रथम पद के अंत में ह्रस्व "अ" तथा द्वितीय पद के आदि में ह्रस्व "अ" के परस्पर मिलने से दीर्घ "आ" बन जाता है।
"राजा ने अपनी प्रजा के कल्याण हेतु धर्मार्थ चिकित्सालय और अन्नक्षेत्र की स्थापना की।"
Grammar Rule & Principle (व्याकरण नियम व सूत्र): ह्रस्व "अ" के बाद पुनः ह्रस्व "अ" आने पर दोनों के स्थान पर दीर्घ "आ" की मात्रा हो जाती है।
"संत कबीर के अनुसार जो व्यक्ति परमार्थ के कार्यों में जीवन बिताता है, उसका जीवन सार्थक है।"