दोहा छंद (13-11 मात्राएँ)
Classical Couplet (दोहा)

जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना॥

Je na mitra dukh hohin dukhari. Tinhahi bilokat paatak bhaari. Nij dukh giri sam raj kari jaana. Mitrak dukh raj meru samana.

← सभी दोहे देखें
📖

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या)

हिंदी सरल व्याख्या (Hindi Vyakhya):

तुलसीदास जी सच्चे मित्र की परिभाषा देते हुए कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने मित्र के दुःख को देखकर स्वयं दुःखी नहीं होता, उसे देखने मात्र से भी बड़ा पाप लगता है। श्रेष्ठ मित्र वह है जो अपने पहाड़ जैसे बड़े दुःख को धूल के कण के समान छोटा समझे, और मित्र के धूल के कण जैसे छोटे कष्ट को सुमेरु पर्वत समान मानकर उसकी सहायता करे।

English Translation & Meaning:

Tulsidas declares that one who remains indifferent to a friend’s sorrow incurs severe spiritual demerit. A noble friend trivializes his own mountain of suffering as a tiny speck of dust, while treating his friend’s minor distress as vast as Mount Sumeru, rushing whole-heartedly to support him.

📜

Literary Context & Source (साहित्यिक संदर्भ व स्रोत)

मूल ग्रंथ / संकलन: रामचरितमानस (किष्किन्धाकाण्ड)
काव्य विधा: दोहा (मात्रिक छंद)

गोस्वामी तुलसीदास का यह दोहा 16वीं शताब्दी (भक्तिकाल - सगुण रामाश्रयी शाखा) की अमर साहित्यिक धरोहर है। यह दोहा मध्यकालीन भक्ति एवं नीति काव्य परंपरा का अत्यंत प्रामाणिक अंश है जो जीवन के व्यावहारिक सत्य, सदाचार और मानवीय चेतना को जागृत करता है।

❓

faq.title

"जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥" दोहे के रचयिता कौन हैं?▼

यह प्रसिद्ध एवं प्रामाणिक दोहा गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित है। यह दोहा 'रामचरितमानस (किष्किन्धाकाण्ड)' में संकलित है।

"जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥" दोहे का सरल हिंदी भावार्थ (व्याख्या) क्या है?▼

तुलसीदास जी सच्चे मित्र की परिभाषा देते हुए कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने मित्र के दुःख को देखकर स्वयं दुःखी नहीं होता, उसे देखने मात्र से भी बड़ा पाप लगता है। श्रेष्ठ मित्र वह है जो अपने पहाड़ जैसे बड़े दुःख को धूल के कण के समान छोटा समझे, और मित्र के धूल के कण जैसे छोटे कष्ट को सुमेरु पर्वत समान मानकर उसकी सहायता करे।

What is the English meaning of the doha "जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥"?▼

Tulsidas declares that one who remains indifferent to a friend’s sorrow incurs severe spiritual demerit. A noble friend trivializes his own mountain of suffering as a tiny speck of dust, while treating his friend’s minor distress as vast as Mount Sumeru, rushing whole-heartedly to support him.

यह दोहा किस विषय और जीवन-मूल्य पर आधारित है?▼

यह दोहा मुख्य रूप से 'सत्संगति एवं मित्रता' (Good Company & Friendship) विषय पर आधारित है, जो मानव जीवन में सदाचार, विवेक और आत्म-सुधार की प्रेरणा देता है।

🪶

संबंधित अन्य नीतिपरक दोहे

Tulsidas के और दोहे →
🌸गोस्वामी तुलसीदास🤝सत्संगति एवं मित्रता🎓 Class 9-10

बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥

सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई॥

Binu satsang bibek na hoi. Ram kripa binu sulabh na soi. / Sath sudharahin satsangati paai. Paras paras kudhaat suhaai.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

तुलसीदास जी सत्संगति की अपार महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि श्रेष्ठ संगति के बिना मनुष्य में कभी सद्विवेक उत्पन्न नहीं हो सकता, और सत्संग की प्राप्ति भी ईश्वर की विशेष कृपा के बिना सुलभ नहीं होती। दुष्ट और दुर्जन व्यक्ति भी सत्संग पाकर ऐसे सुधर जाते हैं, जैसे पारस के स्पर्श से निकृष्ट लोहा भी कंचन बन जाता है।

English: Tulsidas extols the transformational grace of noble company (satsang): without enlightened companionship, true discernment cannot awaken, nor can such company be attained without Divine Grace. Even the most hardened individuals are redeemed through holy company, just as base iron turns to pure gold upon touching the philosopher’s stone.

बिनु सतसंग बिबेक न होई • सत्संग महिमापूरी व्याख्या व संदर्भ→
🌸गोस्वामी तुलसीदास🤝सत्संगति एवं मित्रता🎓 Class 6-8

तुलसी संगति साधु की, करै न कबहुँ अकाज।

पारस परस कुधात सब, कंचन होइ समाज॥

Tulsi sangati saadhu ki, karai na kabahun akaaj. / Paras paras kudhaat sab, kanchan hoi samaaj.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

तुलसीदास जी कहते हैं कि संतों और सज्जनों की संगति कभी किसी का अहित या विनाश नहीं करती। जिस प्रकार पारस पत्थर के संपर्क में आने पर निकृष्ट और अपवित्र धातु भी शुद्ध स्वर्ण में रूपांतरित हो जाती है, उसी प्रकार सत्संगति व्यक्ति के संपूर्ण स्वभाव को दिव्य बना देती है।

English: Tulsidas declares that the association of holy and virtuous persons never causes harm or degradation. Just as the touch of the touchstone transforms coarse base metals into radiant gold, noble fellowship transmutes an ordinary mind into spiritual excellence.

संगति साधु की • सत्संग का प्रभावपूरी व्याख्या व संदर्भ→
🌸गोस्वामी तुलसीदास⚖️सत्य एवं धर्म🎓 Class 9-10

धरम न दूसर सत्य समाना। आगम निगम पुरान बखाना॥

बिप्र धेनु सुर संत हित, लीन्ह मनुज अवतार॥

Dharama na doosar satya samana. Aagam nigam puran bakhana. / Bipra dhenu sur sant hit, leenh manuj avatar.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि सत्य के समान संसार में कोई दूसरा महान धर्म अथवा कर्तव्य नहीं है; चारों वेद, शास्त्र और पुराण भी इसी परम सत्य का गुणगान करते हैं। सत्य और धर्म की रक्षा हेतु ही प्रभु ने साधु-संतों, गौ और देवताओं के कल्याणार्थ मनुष्य रूप में अवतार धारण किया।

English: Goswami Tulsidas proclaims that there is no virtue or duty greater than truth in this universe, as celebrated by all Vedic scriptures and Puranas. It is solely to uphold truth and protect the righteous, the gentle, and the seekers that the Divine incarnates in human form.

धरम न दूसर सत्य समाना • सत्य की महिमापूरी व्याख्या व संदर्भ→
🌸गोस्वामी तुलसीदास⚙️कर्म एवं पुरुषार्थ🎓 Class 9-10

तुलसी काया खेत है, मनसा भयौ किसान।

पाप पुन्य दोउ बीज हैं, बुवै सो लुनै निदान॥

Tulsi kaaya khet hai, mansa bhayau kisaan. / Paap punya dou beej hain, buvai so lunai nidaan.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

तुलसीदास जी रूपक के माध्यम से समझाते हैं कि यह मानव शरीर एक उपजाऊ खेत के समान है और मनुष्य का चंचल मन उस खेत का किसान है। पाप और पुण्य कर्म ही दो प्रकार के बीज हैं; मनुष्य जैसा बीज अपने इस जीवन रूपी खेत में बोता है, अंततः उसे वैसा ही कर्मफल काटना पड़ता है।

English: Tulsidas draws a profound agricultural metaphor: this mortal body is a fertile field, and the conscious mind is the farmer. Sin and virtue are the two kinds of seeds sown; whatever actions one sows in this lifetime, exactly that harvest of destiny must one reap in the end.

काया खेत है • कर्म का फलपूरी व्याख्या व संदर्भ→