वात्सल्य रस
स्थायी भाव: वत्सलता (स्नेह / वात्सल्य रति)Vatsalya Ras (Parental Affection / Tender Parental Love) • Vatsalata (Parental Tender Love / Affection for Offspring)
काव्य में जब माता-पिता अथवा बड़ों का अपने छोटे बच्चों, शिशुओं, पुत्र-पुत्री अथवा अनुज के प्रति निश्छल, निष्काम और अगाध दुलार एवं प्रेम उमड़ता है, तब "वात्सल्य रस" की निष्पत्ति होती है। इसका स्थायी भाव "वत्सलता" (संतान-विषयक रति / स्नेह) है। महाकवि सूरदास को वात्सल्य रस का सम्राट (वात्सल्य का कोना-कोना झाँकने वाला) माना जाता है। आचार्य विश्वनाथ ने इसे 10वें रस के रूप में मान्यता दी।
"किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत। मनिमय कनक नंद कैं आँगन, बिंब पकरिबै धावत॥"
महाकवि सूरदास द्वारा बालक कृष्ण की बाल-सुलभ चेष्टाओं का मनोहारी चित्र खींचा गया है। नन्हे कान्हा नंद बाबा के स्वर्ण और मणियों से जड़े आँगन में घुटनों के बल किलकारी मारते हुए चलते हैं और मणियों में अपनी ही परछाईं देखकर उसे पकड़ने के लिए दौड़ते हैं। इस बाल-लीला को देखकर माता-पिता और पाठक का हृदय वात्सल्य और ममता से परिपूर्ण हो जाता है।